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सृजनगाथा

 

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वर्ष-3, अंक-28, सितम्बर, 2008

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।। भाषांतर ।।

 

 पंजाबी उपन्यास(धारावाहिक-10)

रेत


हरजीत अटवाल

अनुवादः सुभाष नीरव

 

आपने अब तक पढ़ा - भाग एक / भाग दो / तीन / चार/पाँच/छः/सात/आठ/नौ ) अब आगे पढ़िए-संपादक

 

वेरे नींद तो खुल जाती, पर उठना मुश्किल हो जाता। सारा शरीर दर्द कर रहा होता। सिर ऐसे होता जैसे हथौड़े बज रहे हों। हालांकि शराब खून में रच चुकी थी लेकिन, हिसाब से ज्यादा पी लेता तो ऐसी ही तकलीफ़ होती। अगर कभी शराब एक से अधिक किस्म की पी लेता, तब तो तकलीफ़ और बढ़ जाती। अगर कभी शराब का असर खत्म होने से पहले सो कर उठना पड़ता तो और भी मुश्किल होती। बल्कि उठा ही न जाता।

उन दिनों तो बात यहाँ तक पहुँच गयी कि सवेरे सोकर उठने पर यह सोचना पड़ता कि मैं था कहाँ। मेरे साथ कौन लेटा था ?  किरन या बीटर्स ?  बीटर्स किरन से पतली थी। दो बच्चे होने के कारण शरीर भी झड़ चुका था और वह नाइटी भी न पहनती। आँखें खोलने से पहले निशानदेही करनी पड़ती कि कहाँ पड़ा था। किरन और बीटर्स के जगाने के तरीके भी अलग-अलग थे। बीटर्स सिर के बालों में हाथ फेरती हुई जगाया करती। किरन कंधा हिला कर। ये बातें अकेले बैठकर सोचता तो मुझे अपने आप पर गुस्सा आता और सारा दोष कंवल के सिर मढ़ने लगता। कंवल के साथ सोते हुए मुझे कभी ऐसी परेशानी नहीं होती थी। असल में तो कंवल ने मुझे सोये हुए शायद ही कभी देखा हो। मैं उससे बाद में सोता और उससे पहले उठ जाता।

उस दिन, किरन मुझे कंधे से पकड़कर हिला रही थी। मैं नींद की दलदल में से निकल नहीं पा रहा था। किरन की आवाज़ मानो बहुत दूर से आ रही हो। उसकी आवाज़ में आम तौर से कुछ ज्यादा ही गुस्सा था। ज़रूर कहीं कुछ गलत था। मैंने हिम्मत कर आँखें खोलीं। यह तो बीटर्स का बैड था। बीटर्स का घर। मैंने देखा कि किरन मेरी ओर क़हर भरी नज़रों से देख रही थी। मैंने सिर झटका। होश में आने की कोशिश की। दीवार पर टंगा क्लॉक एक बजा रहा था। किरन मुझे कमीज पकड़ाते हुए बोली, शर्म करो, शर्म... तुमने तो सारी शर्म-हया उतारकर रख दी है, अब भी कहो कि इस चुड़ैल से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं। कपड़े पहनकर बाहर आओ ज़रा, दो हाथ करूँ तुम्हारे साथ, तुमने तो हद ही कर दी।

यह कहकर वह बाहर चली गयी और सीढ़ियाँ उतर गयी। गहरी नींद में से निकला था। मैं उठकर बैठ गया, पर खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। मैं हैरान था कि किरन यहाँ कैसे पहुँच गयी। यहाँ का पता किसने दिया और आयी कैसे।

मैं शर्मिन्दगी से भरा हँसने लगा। बीटर्स पहले तो चोरों की तरह खड़ी थी। मुझे हँसता देखकर वह भी हँसने लगी। फिर, वह चिंतित होकर पूछने लगी, अब क्या होगा ?

अब क्या होना है। बस, हँसती चल, कल अस्पताल में मेरी ख़बर लेने आ जाना।

मैं हँसते हुए सीढ़ियाँ उतर आया। किरन बाहर सड़क पर जाकर खड़ी हो गयी थी। बाहर आया तो तरसेम की पत्नी जीती और उसका लड़का चन्ना भी खड़े थे। सारी कहानी मेरी समझ में आ गयी। जीती के पास कैथी का पता था। उसने तो तरसेम का पीछा एक किस्म से छोड़ रखा था, पर जब किरन को पता चला होगा तो रह नहीं सकी होगी। जीती बाहर सड़क पर खड़ी होकर उसको गालियाँ बक रही थी, बास्टर्ड, माँ की बगल में छिपा बैठा है, बाहर निकल ज़रा, तुझे बताऊँ, अब रह इस कंजरी के पास, घर में घुसा तो तेरी टांगें तोड़ दूँगी।

फिर वह सुआहली भाषा में कुछ कहने लगी। वे कीन्या से आये थे, इसलिए यह बोली जानते थे। किरन ब्याह कर इधर आयी तो वे हमारे घर एक-दो बार आये थे और हम भी खाने पर उनके घर गये थे। जब उन्होंने पर्दे में काई बात करनी होती थी, तो सुआहली में किया करते। अब भी वह कैथी के घर की ओर बाँह उठा-उठाकर कुछ कहे जा रही थी। उसका बेटा चन्ना कह रहा था, मम्मी, चुप हो जा तू।

कैथी और तरसेम अन्दर दुबके बैठे थे। बीटर्स खिड़की में से देखते हुए अभी भी हँसे जा रही थी। उसे देखकर मुझे फिर हँसी आ जाती। चन्ने के ज्यादा कहने पर जीती कार में जा बैठी। किरन ने मुझे भी धक्का-सा देकर कार में बिठा लिया। मेरा नशा तो उतर चुका था, पर मैं शराबी होने की एक्टिंग कर रहा था। मैंने कहा, मैडम, तुझे यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी, अक्ल है कि नहीं ?

मुझे कहाँ अक्ल है, तुम्हारी अक्ल से ही काम चलाना है।

यह बहुत रफ एरिया है।

तुम इस रफ एरिये में क्या करने आते हो ?

और फिर हमारा लड़का हमारे साथ था, हमारे लिए कैसा रफ। जीती ने कहा। फिर, अपनी बात जारी रखते हुए जीती बोली, भाजी, तरसेम ने सारी उम्र ऐसे ही निकाल ली, किसी बात की वरी नहीं की, हमारी लाइफ हैल बनाकर रखी, पर तुम क्यों ऐसी सोसायटी में पड़ते हो।

भैण जी, मैं कब आता हूँ, तरसेम नहीं माना।

हाँ-हाँ, तुम तो बहुत पाक-साफ हो, भाजी को क्यों दोष दिये जा रहे हो, चैन तुम्हारे अन्दर नहीं, आग तुम्हें लगी है।

मैडम, तू मुझे गलत समझती है, मैं तो बिजनेस डिस्कस करने आया था कि अधिक पी लेने के कारण यहीं पड़ गया।

कपड़े उतार कर कौन-सा बिजनेस डिस्कस कर रहे थे।

मैंने चन्ने की ओर देखा, जो अपने ध्यान में कार चला रहा था, लेकिन हल्के-हल्के मुस्करा भी रहा था। मैंने किरन से कहा, कुछ शरम कर, साथ में बैठा लड़का क्या सोचेगा ?

जीती कहने लगी, जब लड़के के बड़े-बुजुर्ग उल्टे काम करेंगे, तो लड़का क्या करेगा और क्या सोचेगा!

मैंने चन्ने से कहा, यंग मैन, मुझे तो ईलिंग मेरे दफ्तर उतार देना। मैं रात वहीं काट लूँगा। तेरी अंटी तो मेरे पर यकीन ही नहीं करती।

चन्ने, तू घर ही चल, अब सेवा से न डरो, मैं तुम पर बहुत यकीन करती हूँ।

चन्ने ने कार हमारे घर के सामने ला खड़ी की। किरन फुर्ती से दरवाजा खोलकर अन्दर जा घुसी। शायद, सो रही सोनम को देखने गयी हो। मैंने जीती और चन्ने को अन्दर आने के लिए कहा, पर वे रुके नहीं, चले गये। रात बहुत हो चुकी थी। मैं अन्दर घुसा तो किरन बिफरी खड़ी थी और मेरी ओर देख रही थी। बोली, अब भी कहो कि उसके साथ तुम्हारा कोई वास्ता नहीं। इतने दिन हो गये तुम्हारी तरफ देखते, मैंने सोचा, सुधर जाओगे, पर तुम कब सुधरने वाले हो। मैं तो थक गयी, तुम्हें टोलरेट कर-करके, अब नहीं कर सकती, जाओ, बेशक जाओ, उस गोरी के पास या जहाँ तुम्हारा मन करे।

मैडम, तू तो मेरी जान है, मैं गोरी से ज्यादा काली को ही पसन्द करता हूँ। अब मैं तुझे सॉरी कहूंगा तो तू मेरी बात नहीं सुनेगी।

मैंने अल्मारी में से बोतल निकाल बड़ा-सा पैग बनाकर पिया और उससे कहा, देख, मैं जा रहा हूँ सोने, मुझे इस वक्त नशा इतना है कि तेरी कोई बात सुनाई नहीं देती। दूसरी बात, अगर तूने मुझे पीटना है तो ज़रा धीरे मारना, आखिर मैं तेरी माँ का जवाई हूँ! मुँह पर न मारना, चूतड़ पर बेशक मार लेना।

मैंने सोने का बहाना कर लिया। वह कुछ न कुछ बोलती रही। शोर सुनकर सोनू उठ गयी। किरन चुप हो गयी। इसके बाद मुझे कुछ नहीं पता, मैं सो गया था।

सवेरे मैंने सौगंध खाकर, सॉरी कहकर किरन को खुश कर लिया। जब बीटर्स के बेटे हमारे घर आते या बीटर्स मिलती, तो किरन की शक की निगाह काम करने लगती। मुझसे कई सवाल पूछती।

लेकिन, मैंने कभी पैरों पर पानी नहीं पड़ने दिया था। किरन से वायदा करते हुए अब मैं सच्चे मन से सोच रहा था कि आज के बाद बीटर्स के घर नहीं जाना। किरन इतनी खफा हो रही थी कि डर था कि कहीं कुछ कर ही न बैठे।

किरन का गुस्सा कुछ कम हुआ तो कहने लगी, जाओ, पहले नहाकर आओ, गन्दी औरत, गन्दा घर, गन्दगी... छी छी छी...।

मैं नहाकर नाश्ते के लिए बैठा तो किरन अभी भी मेरी ओर क़हर भरी नज़रों से देख रही थी। वह कुछ पकाने के लिए तैयार ही नहीं थी। मैंने कहा कि रात से कुछ नहीं खाया, तब भी वह न पिघली। सोनू के बहाने भी खुशामद की। कुछ देर बाद उसके मन में दया आई, तो कुकर चढ़ाकर आटा गूंधने लगी। मैं खुश हो गया कि अब परांठे मिलेंगे।

टेलीविजन चल रहा था। बिल्लियों के खाने का विज्ञापन आया तो स्क्रीन पर एक सुन्दर-सी बिल्ली चलती दिखाई दी। सोनम बोल उठी, डैडी, बिल्ली लेनी है।

बेटा, बिल्ली तो तेरे डैडी के पास है, एक बार माँ को मना ले।

किरन ने हाथ वाला आटा वहीं फेंक दिया। कुकर बन्द करके फिर से सैटी पर आ बैठी और बड़बड़ाने लगी।

सवेरे नींद तो खुल जाती, पर उठना मुश्किल हो जाता। सारा शरीर दर्द कर रहा होता। सिर ऐसे होता जैसे हथौड़े बज रहे हों। हालांकि शराब खून में रच चुकी थी लेकिन, हिसाब से ज्यादा पी लेता तो ऐसी ही तकलीफ़ होती। अगर कभी शराब एक से अधिक किस्म की पी लेता, तब तो तकलीफ़ और बढ़ जाती। अगर कभी शराब का असर खत्म होने से पहले सो कर उठना पड़ता तो और भी मुश्किल होती। बल्कि उठा ही न जाता।

उन दिनों तो बात यहाँ तक पहुँच गयी कि सवेरे सोकर उठने पर यह सोचना पड़ता कि मैं था कहाँ। मेरे साथ कौन लेटा था ?  किरन या बीटर्स ?  बीटर्स किरन से पतली थी। दो बच्चे होने के कारण शरीर भी झड़ चुका था और वह नाइटी भी न पहनती। आँखें खोलने से पहले निशानदेही करनी पड़ती कि कहाँ पड़ा था। किरन और बीटर्स के जगाने के तरीके भी अलग-अलग थे। बीटर्स सिर के बालों में हाथ फेरती हुई जगाया करती। किरन कंधा हिला कर। ये बातें अकेले बैठकर सोचता तो मुझे अपने आप पर गुस्सा आता और सारा दोष कंवल के सिर मढ़ने लगता। कंवल के साथ सोते हुए मुझे कभी ऐसी परेशानी नहीं होती थी। असल में तो कंवल ने मुझे सोये हुए शायद ही कभी देखा हो। मैं उससे बाद में सोता और उससे पहले उठ जाता।

उस दिन, किरन मुझे कंधे से पकड़कर हिला रही थी। मैं नींद की दलदल में से निकल नहीं पा रहा था। किरन की आवाज़ मानो बहुत दूर से आ रही हो। उसकी आवाज़ में आम तौर से कुछ ज्यादा ही गुस्सा था। ज़रूर कहीं कुछ गलत था। मैंने हिम्मत कर आँखें खोलीं। यह तो बीटर्स का बैड था। बीटर्स का घर। मैंने देखा कि किरन मेरी ओर क़हर भरी नज़रों से देख रही थी। मैंने सिर झटका। होश में आने की कोशिश की। दीवार पर टंगा क्लॉक एक बजा रहा था। किरन मुझे कमीज पकड़ाते हुए बोली, शर्म करो, शर्म... तुमने तो सारी शर्म-हया उतारकर रख दी है, अब भी कहो कि इस चुड़ैल से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं। कपड़े पहनकर बाहर आओ ज़रा, दो हाथ करूँ तुम्हारे साथ, तुमने तो हद ही कर दी।

यह कहकर वह बाहर चली गयी और सीढ़ियाँ उतर गयी। गहरी नींद में से निकला था। मैं उठकर बैठ गया, पर खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। मैं हैरान था कि किरन यहाँ कैसे पहुँच गयी। यहाँ का पता किसने दिया और आयी कैसे।

मैं शर्मिन्दगी से भरा हँसने लगा। बीटर्स पहले तो चोरों की तरह खड़ी थी। मुझे हँसता देखकर वह भी हँसने लगी। फिर, वह चिंतित होकर पूछने लगी, अब क्या होगा ?

अब क्या होना है। बस, हँसती चल, कल अस्पताल में मेरी ख़बर लेने आ जाना।

मैं हँसते हुए सीढ़ियाँ उतर आया। किरन बाहर सड़क पर जाकर खड़ी हो गयी थी। बाहर आया तो तरसेम की पत्नी जीती और उसका लड़का चन्ना भी खड़े थे। सारी कहानी मेरी समझ में आ गयी। जीती के पास कैथी का पता था। उसने तो तरसेम का पीछा एक किस्म से छोड़ रखा था, पर जब किरन को पता चला होगा तो रह नहीं सकी होगी। जीती बाहर सड़क पर खड़ी होकर उसको गालियाँ बक रही थी, बास्टर्ड, माँ की बगल में छिपा बैठा है, बाहर निकल ज़रा, तुझे बताऊँ, अब रह इस कंजरी के पास, घर में घुसा तो तेरी टांगें तोड़ दूँगी।

फिर वह सुआहली भाषा में कुछ कहने लगी। वे कीन्या से आये थे, इसलिए यह बोली जानते थे। किरन ब्याह कर इधर आयी तो वे हमारे घर एक-दो बार आये थे और हम भी खाने पर उनके घर गये थे। जब उन्होंने पर्दे में काई बात करनी होती थी, तो सुआहली में किया करते। अब भी वह कैथी के घर की ओर बाँह उठा-उठाकर कुछ कहे जा रही थी। उसका बेटा चन्ना कह रहा था, मम्मी, चुप हो जा तू।

कैथी और तरसेम अन्दर दुबके बैठे थे। बीटर्स खिड़की में से देखते हुए अभी भी हँसे जा रही थी। उसे देखकर मुझे फिर हँसी आ जाती। चन्ने के ज्यादा कहने पर जीती कार में जा बैठी। किरन ने मुझे भी धक्का-सा देकर कार में बिठा लिया। मेरा नशा तो उतर चुका था, पर मैं शराबी होने की एक्टिंग कर रहा था। मैंने कहा, मैडम, तुझे यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी, अक्ल है कि नहीं ?

मुझे कहाँ अक्ल है, तुम्हारी अक्ल से ही काम चलाना है।

यह बहुत रफ एरिया है।

तुम इस रफ एरिये में क्या करने आते हो ?

और फिर हमारा लड़का हमारे साथ था, हमारे लिए कैसा रफ। जीती ने कहा। फिर, अपनी बात जारी रखते हुए जीती बोली, भाजी, तरसेम ने सारी उम्र ऐसे ही निकाल ली, किसी बात की वरी नहीं की, हमारी लाइफ हैल बनाकर रखी, पर तुम क्यों ऐसी सोसायटी में पड़ते हो।

भैण जी, मैं कब आता हूँ, तरसेम नहीं माना।

हाँ-हाँ, तुम तो बहुत पाक-साफ हो, भाजी को क्यों दोष दिये जा रहे हो, चैन तुम्हारे अन्दर नहीं, आग तुम्हें लगी है।

मैडम, तू मुझे गलत समझती है, मैं तो बिजनेस डिस्कस करने आया था कि अधिक पी लेने के कारण यहीं पड़ गया।

कपड़े उतार कर कौन-सा बिजनेस डिस्कस कर रहे थे।

मैंने चन्ने की ओर देखा, जो अपने ध्यान में कार चला रहा था, लेकिन हल्के-हल्के मुस्करा भी रहा था। मैंने किरन से कहा, कुछ शरम कर, साथ में बैठा लड़का क्या सोचेगा ?

जीती कहने लगी, जब लड़के के बड़े-बुजुर्ग उल्टे काम करेंगे, तो लड़का क्या करेगा और क्या सोचेगा!

मैंने चन्ने से कहा, यंग मैन, मुझे तो ईलिंग मेरे दफ्तर उतार देना। मैं रात वहीं काट लूँगा। तेरी अंटी तो मेरे पर यकीन ही नहीं करती।

चन्ने, तू घर ही चल, अब सेवा से न डरो, मैं तुम पर बहुत यकीन करती हूँ।

चन्ने ने कार हमारे घर के सामने ला खड़ी की। किरन फुर्ती से दरवाजा खोलकर अन्दर जा घुसी। शायद, सो रही सोनम को दे&#