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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 बेताल-कथा

 

रहने का ठिकाना


गिरीश पंकज

 

 बेतल को कँधे पर लादकर राजा विक्रमार्क बाहर की ओर चल पड़ा। धीरज, धरम, मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी जैसी चौपाई को आत्मसात करने वाले राजो को देखकर बेताल कुटिल मुसकान फेंक रहा था। उसकी मुसकान उस नेता की तरह थी जो अपने विरोधी को पराजित या दंडित करना कर खुश हो जाता है। विक्रमार्क को हमसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था । वह चुपचाप चलता जा रहा था।

 

बेताल जैसे बकर करने के लिए हो जन्मा था । वह विपक्षी नेता की तरह कुछ न कुछ  बोलने में माहिर था। कुछ ही दूर चलने के बाद बेताल ने कहना शुरु किया - हे राजन, अब फिर एक कहानी सुनाने का मूड बन रहा है । मौन होकर यात्रा नहीं होती। कुछ न कुछ बोलते-सुनते रहें तो सफ़र बोर नहीं लगता । तो राजन शुरु करूँ कोई कहानी ?

 

बेताल ने इतना बोला ही था कि विक्रमार्क ने देखा, सामने एक साँप आकर खड़ा हो गया है। ऐसा लगा कि वह रास्ता रोक रहा है। विक्रमार्क ने तलवार निकाली और आगे बढ़ा दी । तलवार की चमक देखकर ही साँप समय गया कि भी अब खैर नहीं । वह तेजी के साथ झाड़ियों में जा छिपा।

 

बेताल यह देखकर हँस पड़ा और बोला राजन, इस साँप की हरकत देखकर मुझे एक कहानी सूझ रही है। । तुम कहो तो शुरु कर दूँ । नहीं कहोगे तो भी मैं तो शुरु हो रहा हूँ । इतनी देर से मुँह बंद करके चलना भारी पड़ रहा है। तो राजन, एक समय की बात है। एक साँप था। जंगल में रहता था। इधर-उधर घूमता रहता। कभी किसी राहगीर को डसता तो कभी किसी जानवर को। फिर अपने बिल में घुस जाता । यही उसकी दिनचर्या थी । अपनी इस दिनचर्या से वह बोर हो चुका था।

 

एक दिन साँप ने सोचा-इस जाल से बाहर निकलूँ । कहते हैं दुनिया तरक्की कर रही है। पास ही ईंट-पत्थरों का कोई जंगल है, जहाँ बहुत से मानव रहते हैं। उनके पास तरह तरह के वाहन हैं। सुख-सुविधाएँ है। पिछली बार एक साँप शहर से लौट कर आया था। उसने शहर का जो वर्णन किया था, वह साँप के जहर से भी ज्यादा खतरनाक था। तब से साँप डर गया था। शहर जाने से बचना चाहता था। लेकिन जंगल की बोरियत ने उसे हिम्मती बना दिया और उसने संकल्प लिया कि वह शहर जाएगा । ठीक है, आदमी से बचकर रहेगा । देखें तो सही, शहर में क्या चल रहा है ।

 

हे राजन, साँप शहर की ओर चल पड़ा । रास्ते में अनेक भारी-भरकम वाहनों की चपेट में आते-आते बचा । सड़क के किनारे चलने में ही समझदारी थी । वाहनों से बचते-बचाते साँप शहर पहुँच गया । वहाँ बड़े-बड़े मकान देखकर वह चकरा गया । बाप रे ! इतने विशाल घर , इसमें मैं भी रहूँगा । लेकिन कहाँ रहूँ, वह सोच में पड़ गया । कहीं एक नेता का घर है, कहीं एक अभिनेता का, पास में एक पुलिस थाना भी नज़र आया, जहाँ बचाओ, हाय-हाय जैसी आवाज़ें आ रही थी । कहीं बाल आश्रम तो कहीं विधवा आश्रम । कहीं दूकानें नज़र आ रही थी, तो कहीं कोई कार्यालय । साँप घूम-घूमकर अपने रहने का ठिकाना ढूँढ़ रहा था । उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि आखिर वह किस घर को अपना ठिकाना बनाए ।

 

इतना बोलकर बेताल चुप हो गया । बेताल को चुप देखकर विक्रमार्क चकराया । कहानी में रोचकता थी । आगे क्या हुआ, पर सुनने की उत्सुकता थी । लेकिन अब बेताल के मुँह क्या लगता यह सोचकर विक्रमार्क चलता रहा । तभी बेताल बोला, राजन, मेरी कहानी सुनकर मजा आ रहा था, इसीलिए मैंने बीच में ही छोड़ दी । अब इस कहानी को तुम पूरा करो । बताओ कि साँप ने आखिर किस घर को अपना निवास बनाया और क्यों ? मेरे प्रश्न का बिलकुल सही ज़बाब देना । माता-पिता की आँखों में धूल झोंकने वाले छात्र की तरह धुप्पल मत मारना । वरना तुम तो जानते ही हो मेरी शक्ति ।

 

विक्रमार्क साँप की कहानी के बारे में कुछ देर सोचता रहा, फिर मुसकराते हुए बोला, तुम्हारी कहानी का अंत बिलकुल साफ है । वह साँप पहले नेता के घर गया । उसे देखा कि नेता और उसके चरित्र में कुछ समानता है । साँप केंचुल बदलता है, नेता भी दिल बदलता है । नेता के घर की शातिर गतिविधियाँ देखर साँप का मन हुआ कि यही बस जाए फिर उसने सोचा कि एक बार उस जगह को भी देख आए जहाँ पीले कपड़े पहने लोग डंडे चला रहे थे । जहाँ से बचाओ-बचाओ, हाय-हाय, मर गया की आवाजें आ रही थीं। साँप पुलिस थाने पहुँच गया। वहाँ का माहौल उसे रास आ गया । उसका चेहरा खिल गया। उसे अपने रहने का ठिकाना मिला गया।

 

विक्रमार्क ने कहानी का बिल्कुल सटीक अंत किया था। उसका मौन भी भंग हो चुका था।  बस, बेताल को और क्या चाहिए था। वह विक्रमार्क की पकड़ से मुक्त होकर फिर श्मशान घाट की ओर उड़ गया ।

गिरीश पंकज

जी, 31, न्यू पंचशील नगर

रायपुर, छत्तीसगढ

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