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ये पत्नियाँ आर.के.भंवर
'मिलिये
ये है मेरी धर्म पत्नी'
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एक समारोह में ऊपर से नीचे तक भद्रता के आवरण
ये पत्नियाँ बड़ी विचित्र होती हं। इनके दिल और दिमाग दोनों में एक ही समय में भयंकर विरोधी कार्यविधियों का तूफान उठा करते है। एक समय में वे क्रूर है तो दूसरे ही क्षण घोर दयालु भी। प्रलोभी हैं तो त्यागी भी। आक्रमक हैं तो रक्षात्मक भी। संचयी है तो खर्चीली भी। प्रेरणा है तो संहारक भी। इन सबमें एक सर्वाधिक विषेष गुण यह है कि ये शक्की मिजाज़ की जरूर होती हैं। शंका साहित्य में दसवाँ रस है। अपवाद यह कि शक रस सिर्फ पत्नियों में ही पाया जाता है। वे शंका की दरियाव होती हैं और उसी में रहना, मचलना, उत्पात उत्पन्न करना अपनी नियति बना लेती है।
ये पत्नियाँ बड़े काम की भी होती है। घरेलू बंदोबस्त में ए से जेड तक वही ही हैं। वे अगर श्रमजीवी है तो भी अपना गृह कार्य किसी दूसरे के सहारे नही छोड़तीं। पति बाहर की दुनिया में रहता है तो ये अंदर-बाहर सभी जगह रमती हैं। घरेलू प्रजाति होने के बावजूद ये अनुमान से ही बाहर की बात को पकड़ लेती हैं। अपनी जवान हो रही बेटियों से भी फैशन से अपने समय के फैशन को लेकर कभी-कभीर् ईष्यालु हो जाती है। पड़ोस में बढ़ने वाली संसारी सम्पदाओं पर उसकी खुफ़िया नज़र और रात्रि के दूसरे पहर में पतियों को उनसे मिलने वाली उलाहना जैसी बातें पतियों को कहाँ पहुँचा देती है, यह किसी से नहीं छिपा। फिर पतियों की यात्रा कहाँ से और किस जुनून से प्रारंभ होती है, यह भी किसी से नही छिपा है। इन मामलों में ये पतियों की उत्प्रेरक होती हैं। पर आज तक इनके चंगुल में इसी भावभूमि पर फँसा पति कभी भी बाल्मीकि नही बन पाया। उसकी वज़ह साफ है तब के वाल्मीकि के घरवालों ने बड़ी सफाई से कह दिया था कि तुम जो कर रहे हो उसमें हमसे क्या लेना देना ? पर आज के समय में इतना साफ-साफ कहाँ चलता है। चढ़ जा सूली पे बच्चा भली करेंगे राम और राम ने मानो भली करने का कोई ठेका ले रखा हो।
पत्नियाँ गरीबी की प्रबल विरोधी है, गरीब की नही। इसके विपरीत ये अमीरी से प्रेम करती हैं और उसके स्थायित्व के लिए सदैव अगरबत्तियाँ सुलगाती है। कुल मिलाकर दुनिया में भारतीय पत्नियों का जलवा बढ़ रहा है। वे विदेशों की किसी पत्नी से उन्नीस नही है। पति भले कितना ही पढ़ा लिखा हो, पर वास्तविक डिग्री पत्नी को ही मिलती है। जैसे : पाँच साल में डाक्टरी पास करने वाले की बीबी मात्र सात फेरे में ही डक्टराईन हो जाती है। ऐसे ही वह मस्टराईन, अफसराईन, कलेक्टराइन न जाने क्या-क्या हो जाती है।
दिन भर खटर खटर करते रहना इनकी आदत होती है। इस कारण से तथा शंकाओं में जीने से कभी-कभी तनाव में रहती हैं। संसद में एक विधेयक लाया गया था कि इन्हें सप्ताह में एक दिन का अवकाश दिया जाए। बड़ी गहरी सोच इस विधेयक में थी, पर ये पारित नही हुआ। पास भी कैसे होता, ये यदि एक दिन अवकाश पर चली भी जाती तो पतियों को बारह बजे दिन में भी तारे नज़र आते।
एक शुभचिंतक ने पति-पत्नी के मध्य उपजने वाले विवाद को सुलटाने के वास्ते बताया - जब भी कोई पति अपने दफ्तर से घर की ओर प्रस्थान करें तो अपने घर में गेट से जैसे ही घुसे वैसे ही अपनी कल्पना से गेट पर एक खूँटी बना ले, और लम्बी साँस भर कर जब उसे छोड़े तो कल्पना करें कि उसका (पति का) दिमाग बाहर निकल कर कल्पना से बनायी गयी खूँटी पर टंग गया और अब बचा सिर्फ दिल। इस बचे दिल को लेकर आप घर के अंदर दाखिल होईए। घर के अंदर दिमाग सिर्फ़ एक ही का चलेगा, वह भी आपकी पत्नी का। अब आप अपने घर में दिलदार पति है और आपका दिमाग गेट की खूँटी पर टँगा हुआ है। अब पत्नी कहे कि सूरज पश्चिम से निकलता है तो ठीक निकलता है, पश्चिम से। आखिर उसे निकलना तो है ही । अब पूरब से निकले या पश्चिम से। क्या फर्क पड़ता है। अब वह बोले कि निरा मूर्ख हो अपनी चङ्ढी-बनियान नही खोज पा रहे हो, तो दिलदार पति का यह कहना कि ठीक फरमाया मेरे बाप भी यही कहते थे कि मै वाकई मूर्ख हूँ । अब आप बताईए कि क्या आप की सेहत पर इससे कुछ फर्क पड़ेगा। नहीं न। पत्नी यह कहे कि खाना बनाना सीख लो मर जायेगे तो कौन खिलायेगा, तो दिलदार पति यह कहे कि तुम्हारे साथ मै भी सता हो जाऊँगा, साथ ही ऊपर चलेंगे। दो टकी की जबान हिलाने में कुछ घिस जाता है, आपका। पर जब आप घर से अपने दफ्तर के लिए निकले तो खूँटी पर टँगे दिमाग को लम्बी साँस से यथास्थान धारण करिये और दिल को, बाहर छोड़ने वाली लंबी साँस के सहारे उसी खूँटी पर टाँग दीजिए। बाहर की दुनिया में दिमाग रखिए, पर घर की चौखट पर उसे खूँटी पर ही टाँग दे। अब आप बताईए इसमें कोई बुराई है, भला।
ये पत्नियाँ जितना जैसा भी दिमाग रखती है, वह आपके हिस्से व आपके हित के वास्ते ही रखती है। भले ही वह आपकी सोच के मुताबिक न हो। पर आपके वास्ते रखती तो है। वह आपकी शुभचिंतक हैं। घर-मंदिर की देवी हैं। भावना(दिल) के फूलों से उसकी आराधना करिए और दिमाग रूपी रावण को बाहर की लंका में विचरण करने दीजिए। ये सहनशील और सह्दय होती है और सहनशीलता और सह्दयता की अगरबत्ती भाव भावना से ही सुलगती है। इसलिए घरों में दिल का काम होता है, दिमाग का उतना नही। इसीलिए बाबा कबीर का कहना है कि शीष उतारै भुइं धरै, तो पैठे घर मांहि। (पढ़िए लेखक की दूसरी रचना - ये सीड़ियाँ)
सूर्य सदन सी-501/सी, इंदिरा नगर, लखनऊ (उ0प्र0)-226016 ◙◙◙
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