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धारावाहिक-1 आधे चाँद की रात एस. अहमद
एस. अहमद शिक्षा:स्नातक, फोटोग्राफी में डिग्री, पत्रकारिता में डिग्री। जन्मतिथि:14 दिसम्बर, 1945 (इटावा) उ.प्र.। अनुभव:विगत 30 वर्षों से जनसंपर्क विभाग के फोटो डिवीजन में फोटोग्राफी का कार्य। मुख्य छायाचित्रकार के पद से सेवानिवृत। पुरस्कार:करीब एक दर्जन राष्ट्रीय फोटो प्रदर्शनियों में पुरस्कृत। प्रकाशन:100 फोटो फ़ीचर देश की नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, जनसत्ता, हिन्दुस्तान टाइम्स, संडे मेल, फ्री-प्रेस जनरल, भास्कर, नयी दुनिया, सृजनगाथा आदि। दो दर्जन कहानियाँ प्रकाशित, चर्चित, साक्षात्कार, हंस, वर्तमान साहित्य, कहानियाँ, मासिक चयन, वसुधा, दुनिया इन दिनों, वागर्थ इत्यादि। कृतियाँ-कहानियों की तीन किताबें प्रकाशित- इज्ज़त, बर्फ होती लड़की, बन्द दरवाज़े। जो किताबों में नहीं (प्रेस में) । सम्मानः इज्ज़त कहानी पर वर्तमान साहित्य का दूसरा पुरस्कार (1993) एक दर्जन एकल फोटोग्राफी की प्रदर्शनियाँ कानपुर, नागपुर, लखनऊ, भोपाल, बालाघाट, सिवनी, रायपुर आदि। विशेषः कई कहानियों का मराठी और तेलुगु में अनुवाद ।फोटोग्राफी के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए महाकौशल अलंकरण से सम्मानित। पिछले बीस वर्षों से आदिवासियों के बीच रहकर उनकी जीववन-पध्दति, कला-संस्कृति, का अध्ययन। संप्रति:फोटो पत्रकारिता, एवं स्वतंत्र लेखन।
सीधे अंतरजाल पर प्रकाशित होने वाला हिंदी का पहला उपन्यास
पेशे से वकील, नाम से शरीफ़, पूरा नाम सैय्यद शरीफ़ुल हसन, शहर इटावा के वीशिंदे हैं। पीढ़ियाँ गुजर गई रहते-रहते इस शहर में उन्हें तो याद नहीं कि उनके पुरखे कब आए थे यहाँ, हाँ इतना ज़रूर मालूम है कि वे अरब से ईरान होते हुए आए थे, वह भी इसलिए मालूम है कि षिज़रा जो रखा हुआ हैं घर में।
सैय्यद शरीफ़ुल हसन की दिनचर्या बिल्कुल निश्चित थी। उनकी आँख सुबह की नमाज़ की अज़ान के साथ खुलती थी। नमाज़ से फ़ारिग होकर वे टहलने निकल जाते वहाँ से लौटते तो सीधे नाश्ते की टेबिल पर बैठते, फिर अपने घर के ऑफिस में आ जाते तब तक उनके जूनियर और मुंशी आ चुके होते थे। उस दिन लगने वाले मुकदमों की फाइलों का एक बार अध्ययन करते, अपने जूनियरों को दिन-भर का काम समझाते, साथ-साथ आने वाले मुवक्किलों से बातचीत करते, तब तक कचहरी जाने का वक्त हो जाता और वे अपने पूरे अमले के साथ काली पैकार्ड क़ार में कचहरी जाने के लिए निकल पड़ते।
इस बीच वे कई बार, घर के अंदर जाते और अपने बेग़म को घरेलू हिदायतें देते नौकर जुम्मन को गाँव से आने वाले कारिंदों की देखभाल की जिम्मेदारी समझाते, खाद, बीज, कितना देना है, हर बात को किस तरह से करना है, बताना नहीं भूलते। यह रोज का क्रम है, कई बार तो ऐसा होता कि उसी-उसी बात को वे लगातार दोहराते रहते, जब बेग़म या बच्चियाँ खीज जाती तो वे हँसते हुए कहने लगते- ''क्या करूं बेग़म बूढ़ा हो चला हूँ।'' और बेग़म भी बोल उठती- ''नोज बूढ़े हों आपके दुश्मन...'' कहती और झेंप जाती, जवान होती बच्चियाँ शरमा कर वहाँ से हट जाती। ''नहीं बेग़म मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ, अब लगता है इक़बाल अपनी पढ़ाई पूरी कर जल्दी से घर आ जाए तो सब कुछ उसे सौप दूँ और खुद हुजरे में बैठ कर अल्लाह-अल्लाह करूं।'' उन्होंने ठंडी साँस लेते हुए कहा और ख़यालों में डूब गए। ''लेकिन वह वकालत कहाँ करना चाहता है। वह तो इंजीनियर या प्रोफेसर बनना चाहता है।'' बेग़म ने उन्हें सपने से घसीट लिया। ''हाँ बेग़म, उसका रूझान तो उसी तरफ है, लेकिन मैं उसे समझाऊँगा, जमी-जमाई प्रेक्टिस हैं, उसे कुछ भी नहीं करना पड़ेगा, बस काम को समझना भर है, वह नहीं करेगा तो पता नहीं क्या होगा....'', उन्होंने बात को अधूरा छोड़ दिया। ''आप भी कहाँ की बातें ले के बैठे, क्या आज कचहरी जाना नहीं है।'' बेग़म ने टोक दिया। ''अरे मैं भी कितना भूल्लकड़ हूँ अच्छा मैं चलता हूँ,'' कहते हुए सैय्यद साहब ऑफिस में लौट जाते। सैय्यद शरीफ़ुल हसन मुहल्ला सैय्यद-बाड़ा के निवासी हैं। बाप-दादाओं की बनवाई हवेली में रहते हैं। बड़ी शान है हवेली की, अभी भी पुरानी ख़ायतों पर क़ायम है, बिरादरी में भी बहुत रूतबा है वकील साहब का। पूरा मुहल्ला उन्हीं के खानदान के लोगों से भरा हुआ है। मुहल्ले की मुहाने पर ही मस्जिद है, वे तो बस जुमे की नमाज़ जमात के साथ मस्जिद में पढ़ते है वरना फज्र और ईंशां की नमाज़ें तो घर पर ही पढ़ते अगर मुक़दमे की सुनवाई में कज़ा हो जाती और अगर वक्त मिल गया तो कचहरी में बनी पुरानी मस्जिद में पढ़ लेते।
वकील साहब का भरा-पूरा घर है, चार बच्चों के पिता हैं वे, लड़का एक ही है, वह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा है। उसके बाद तीन लड़कियाँ हैं, कौसर, शाहिदा, और किश्वर। कौसर और शाहिदा की स्कूली पढाई हो चुकी है। किश्वर अभी स्कूल में है। लड़कियाँ तो आगे भी पढ़ना चाहती हैं, लेकिन खानदानी विरोध को ध्यान में रखकर लड़कियों को आगे नहीं पढ़ाया।
सैय्यद साहब की वकालत खूब चलती है, खराब से खराब केस जीत जाते हैं। दुनिया को समझते हैं, बदलते वक्त पर भी उनकी नज़र है। अँग्रेज़ अफ़सरों के मिजाज और उनकी पसंद का भी खूब ख़याल रखते हैं। अँग्रेज़ जजों और उनके करीबी अहलकारों को समय-समय पर तोहफे भी भिजवाते रहते हैं वकील साहब। क्लब और पार्टियों में भी चले जाते हैं। उनकी समझदारी का असर उनकी वकालत पर दिखाई देता है। यह और बात है कि तोहफों का भार मुवक्किल की जेब पर पड़ता है।
इक़बाल को वकालत पसंद नहीं है, उसको लगता है कि आमतौर पर वकील झूठ का सहारा लेकर मुकदमों को जीतते हैं, और मुवक्किलों को इस तरह चूसते हैं कि जैसे जोंक खून चूसती है। वकील इतने खुदगर्ज़ होते हैं कि अमीर और गरीब मुवक्किल में फर्क तक नहीं करते। मजबूरी का नाजायज़ फायदा उठाते हैं। लेकिन उसका यह ख़याल अपने अब्बू के बारे में नहीं था। अपने होश संभालने से लेकर अब तक तो उसे अपने अब्बू दूसरे वकीलों से अलग लगे, लेकिन इन सबके बावजूद वह अपने आपको काले कोट में कसा हुआ देखना नहीं चाहता था, उसकी दिली इच्छा प्रोफेसर बनने की थी वह पढ़ाना चाहता था लेकिन उसे मालूम था कि उसके अब्बू तो मानने से रहे। इतने बड़े वकील का बेटा और मास्टर उनकी नज़र में क्या स्कूल, क्या कॉलेज सब बराबर पढ़ाने वाला मास्टर ही तो कहलागा। लेकिन उसने सोच रखा है कि वह वही कार्य करेगा जिसको उसका दिल गवाही देगा। वकील तो कभी नहीं बनेगा।
सैय्यद साहब घर और बाहर दो व्यक्तियों की तरह जीते थे। घर में इस्लाम और उसकी शिक्षा के अनुरूप ही सारा कार्य होता था, लेकिन जिस पल वह काला कोट पहन लेते थे तो पूरे व्यवहारिक बन जाते ज़िंदगी के जीने का अंदाज बदल जाता, कोर्ट में केस जीतने के लिए जो भी जोड़-तोड़ करना पड़े उससे हिचकते नहीं थे। ज़िंदगी को ज़िंदगी की तरह जीना उन्हें आता था। v
पिछले कुछ दिनों से वे परेशान चल रहे थे। परेशानियाँ एक साथ तेजी से चलकर नहीं आई थीं। धीरे-धीरे दबे पाँव आईं थी। पहले-पहल जब बाररूम में अंग्रेज़ों के मुल्क छोड़ने का तज़करा सुना तो उन्हें यकीन नहीं आया कि अंग्रेज़ इतनी जल्दी मुल्क छोड़ने पर राज़ी हो जाएंगे। ऐसा नहीं था कि वह मुल्क में चल रही तहरीक़ों से बेखबर थे। लेकिन उनका दिल कहता था कि अँग्रेज़ इतनी आसानी से मानने वाले नहीं है, दूसरे जिन्नाह का मुसलमानों के लिए ''होमलैण्ड'' की माँग ने मामले को उलझा दिया हैं, कांग्रेस क्यों कर राजी होगी मुल्क को टुकड़ों में बँटा हुआ लेकर...।
जिन्नाह के ''होमलैण्ड'' की माँग को वे पसंद नहीं करते थे। वे सियासतदाँ तो नहीं हैं कि हर मसले का हल सियासत की नज़र से देखते, उनको लगता था कि मुसलमान तो पूरे मुल्क में है। किसी एक हिस्से में तो है नहीं कि उस हिस्से को अलग कर दो, लो भई यह तुम्हारा घर है, यहाँ तुम रहो। पूरे मुल्क में फैले हुए मुसलमान किस तरह एक जगह इकट्ठे हो सकते हैं। अगर कुछ मुट्ठी भर लोग एक जगह इकट्ठे हो भी गए तो बाकियों का क्या होगा ? इस तरह के अनेकों सवाल उनके ज़हन में लगातार उठते रहते, और फिर सोचते कि उनको भी यह ज़मीन छोड़नी पडेग़ी? जहाँ मुल्क छोड़ने का ख़याल आया नहीं कि उन पर एक अजीब तरह की वहशत छा जाता, वे तो ख्वाबों में भी मुल्क छोड़ने की बात सोच ही नहीं सकते थे। कानून की बेजान किताबों के बरहम अलफ़ाजों के बीच ही उनकी पूरी ज़िंदगी बीती है। लेकिन उनके जज़बात अभी भी जिंदा और साँस ले रहे हैं, इस बात की उन्हें तसल्ली थी। कभी-कभी वे सोचते थे कि क्या ज़मीन पर लकीर खींचने भर से क़ौम दो फांकों में बँट जाएगी। सैकड़ों बरसों के भाईचारे के रिश्तों को आंधी का बगोला आकर उड़ा ले जाएगा, ओह रविश...।
लेकिन उनके रविश कहने भर से कुछ न हुआ, मुल्क में मुस्लिम लीगी और काँग्रेस की तहरीकें ज़ोर पकड़ती गई, अंग्रेज़ों पर दबाव बढ़ता गया, यह वही वक्त था जब हिटलर हार गया था जर्मनी को दो हिस्सों में बाँट लिया गया था। जापान बर्बाद हो गया था, और यूरोप टूटा-फूटा, बिखरा आर्थिक मंदी से बुरी तरह जूझ रह था, बेरोज़गारी चारों तरफ फैली हुई थी। दुनिया के नक़्शे पर खून से लकीरें खींचकर नई हदबंदियाँ बना दी गई थी। कहने को दोस्त मुल्क दूसरे विश्व युद्ध को जीत चुके थे। लेकिन अमेरिका को छोड़कर सारे मुल्क बुरी तरह पिट चुके थे। सबसे खराब हालत अंग्रेज़ों की थी, हिटलर के हमलों की वजह से पूरा यूरोप ध्वस्त हो चुका था। पुर्ननिर्माण, बेरोज़गारी की समस्याओं का भूत उनके सामने मुँह बांये खड़ा था। ऐसे ही समय में उन्होंने हिन्दुस्तान छोड़ने की तारीख मुर्क़रर कर दी- ''हम 1946 में हिन्दुस्तान की सत्ता उसी हालत में उन्हीं लोगों के हाथों में सौंप देंगे जिनसे हमने ली थी''। अंग्रेज़ों के इस बयान से काँग्रेसी खेमों में खलबली मच गई, इस तरह से पूरा मुल्क रियासती ढाँचे में बँट जाएगा, उनके संधीय गणराज्य के सपने को कहाँ पूरी कर पाएगा। राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हो गई, मुस्लिम लीग ने भी अपने पासे फेंक दिये सियासत की बिसात पर।
वकील साहब को जब पता चला कि अंग्रेज़ अब थोड़े दिनों के ही मेहमान हैं मुल्क में, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ, उस दिन उन्हें कई मुकदमों की पैरवी करनी थी, इसलिए घर से जल्दी ही निकल आए थे कोर्ट के लिए, अखबार भी नहीं देख पाये थे। पैरवी करने के बाद कॉफी पीने के इरादे से बार रूम में आकर बैठे ही थे कि मधुकर पांडे जो फौजदारी का माना हुआ वकील होने के साथ-साथ काँग्रेसी भी थे कहने लगे- ''हसन साहब अब तो हिन्दुस्तान में काँग्रेसी राज आने वाला है, ह्यूम तो अब कुछ ही दिनों के मेहमान हैं इस देश में, तब आपके मुक़दमों का क्या होगा''? ''क्या मतलब हैं तुम्हारा''? हसन साहब की त्यौरियाँ चढ़ गई थी, उन्हें मालूम था कि लोगों का ख्याल है कि जज ह्यूम से उनके अच्छे ताल्लुकात ही उनके मुक़दमों को जिताते हैं। ''मतलब साफ हैं, मैं घुमा-फिरा कर बात नहीं कर रहा हूँ आपके सिर से छाता हट रहा हैं।'' अपनी बात पूरी कर मधूकर पांडे ज़ोर से हँस पड़ा। उसने हसन साहब के जवाब का इंतजार नहीं किया और चल पड़ा अपनी टेबिल की तरफ। उन्हें गुस्सा आ गया था, एक अजीब तरह की बेचैनी ने उन्हें घेर लिया। उनसे कॉफी नहीं पी गई। उसे वैसे ही बिना पिये छोड़ वे बार रूम से बाहर आ गये थे।
उनका दिमाग़ काम नहीं कर रहा था अभी तो मुल्क आजाद नहीं हुआ हैं, तब यह हाल है अगर हो गया तब....? उनको एक झटका सा लगा। वह अपने बस्ते पर लौट आये, मुवक्किलों की भीड़ उनका इन्तज़ार कर रही थी, | |||||||||