|
|
|
|||||||
|
|
||||||||
|
|
|||||||||
|
द्वितीय किश्त
हिंदी लघुकथा का विकास डॉ. अंजलि शर्मा
(लघुकथा हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही कमलेश्वर , राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर लघुपत्रिकाओं के संपादकों का ।
हमने अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है । पिछले अंक से आगे पढ़िए - संपादक )
अध्याय एकःकथा विकास कथा विकास की उद्भावना का मूल व्यक्ति की संवदेना रही है। जब संवेदना परिवेश में हो रही घटना, दुर्घटना, वस्तुगत सौंदर्य के बिंबाधात से उद्वेलित होकर भावमूर्तता ग्रहण कर लेती है, तब यही भाव-ऊर्जा मनुष्य के द्वारा सम्पूर्ण रुप से उपयुक्त नहीं हो पाने के कारण बर्हिगमन का रास्ता तलाश करती है, बर्हिगमन का जो प्रारुप होता है, कला कहलाता है। जब हृदय की भावना ऊर्जा अपने अभिव्यक्ति-करण के लिये शब्दों को माध्यम बनाता है। रचनाकार के अंदर जब कोई विचार प्रस्फुटित होता है तो वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये प्रभावी ढंग से सोचता है। तत्पश्चात भाषा के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को कहानी, उपन्यास, निबंध या लघुकथा के रुप में साकार रुप देता है।
‘हिंदी लघुकथा, का विकास’ शीर्षक में लघु के साथ कथा शब्द मुख्य रुप से प्रभावित करती है । चाहे वह कहानी हो या लघुकथा दोनों में कथातत्व का होना आवश्यक है । कहानी जीवन के स्थूल रुपों को, उनकी समस्याओं और चरित्रों को विस्तार देकर कथा के रुप में लिखता है, जबकि लघुकथा जीवन में समस्याओं के प्रमुख खण्ड या अंश का चित्रण करती है, लघुकथाकार का ध्यान विसंगतियों, विद्रुपताओं और विषमताओं के केंद्र में निहित होती है । लधुकथा की कथावस्तु संक्षिप्त, सूक्ष्म, तीव्र गूढ़, वैयक्तिक, स्पष्ट और गहन होने के कारण लघुकथा में शीघ्र समुचित प्रभाव डालने का अतिरिक्त सामर्थ्य के कारण लघुकथा का आधार फलक लघु होने के बावजूद उसकी प्रभावोत्पादकता कहानी से कहीं अधिक होती है ।
कहानी में मुख्य कथानक के अतिरिक्त सहयोगी सूत्रों, प्रासंगिक कथाओं, उपकथाओं, अंर्तकथाओं आदि उपकरणों से कहानी का कैनवास विस्तृत बनाया जाता है। जबकि लघुकथा आधिकारिक कथा अपने गहन सूत्रों की वजह से लघुकथा की ग्राह्मता और लोकप्रियता कहानी से अधिक है । संवादों की सहायता से विश्व स्तर की कहानियों की रचना करने में कथाकारों ने सफलता हासिल की है, जबकि शैली का चुनाव लघुकथाकार के समक्ष और रूझान पर निर्भर करता है, जिससे वह अपनी अभिव्यक्ति सहज, सरल रुप में कर सके । कहानी में लेखक अपनी तरफ से टिप्पणियां दे सकता है, लघुकथा में लेखक अपनी तरफ से कोई टिप्पणियां देकर पात्रों की ही बात को सामने रख देता है । लघुकथा चूंकि थोड़े में अधिक की मांग करता है, इसलिये लघुकथा कहानी की अपेक्षा अतिरिक्त कुशलता, रचनात्मक धैर्य, संयम, सजगता, व्यापक छानबीन की मांग करती है ।
कथ्-कथ्यते धातू से बना है जिसका अर्थ है ‘कहना’ । कथा शब्द संस्कृत के ‘कथा’ का सामान्य अर्थ ‘कथन’ है। मनुष्य में अपने अनुभवों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देने की सहज प्रवृत्ति होती है। साथ ही वह दूसरों के अनुभवों और आकांक्षाओं से परिचित होने के लिए उत्सुक रहता है, अतः जिज्ञासा और आत्माभिव्यक्ति की ये प्रवृत्तियां उसे कुछ कहने और कुछ सुनने के लिये प्रेरित करती हैं, परंतु जब इस कहने के ढंग को और अधिक रोचक और आकर्षक बनाने के लिये मनुष्य प्रयत्न करता है, तब वह एक साहित्यिक विधा का रुप ले लेता है, यह कथा के जन्म का मूल उत्स है।
वस्तुतः अच्छी कहानी के सभी लक्षणों की परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि कहानी जीवन के किसी एक पक्ष का ऐसा संवेदनात्मक चित्रण है, जिसकी विशेषताओं और प्रभावान्वितिकी अनुभूति ही की जा सकती है, उसे शब्दों में अभिव्यक्ति देना संभव नहीं सो सकता इसीलिये श्री चेटवोव लिखते हैं- ‘कहानी का कोई आदि मध्य और अंत नहीं होता, कहानी केवल कहानी होती है और मैं इसे इतनी सहजता से लिखता हूं, जैसे चिड़िया चहकती है, फूल खिलते हैं।’
मनुष्य मूलतः जिज्ञासु है। जिज्ञासा की प्रवृत्ति उसे नये नये प्रकार के अनुभव प्राप्त करने के लिये प्रेरित करती है। सृष्टि की विराटता उसके मन के कौतुहल का संचार करती है। शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएं उसे नूतन रहस्यों का उद्घाटन करने के लिये बाध्य करती है। नूतन रहस्यों के उद्घाटन के प्रयत्नों के द्वारा मनुष्य अनुभवों की अभिव्यक्ति के लिये भाषा की आवश्यकता होती है्। भाषा मनुष्य के अंतः बाह्म आवश्यकताओं को अभिव्यक्ति देती है। अभिव्यक्ति को अधिक से अधिक रोचक आकर्षक और मनोरंजन बनाने के लिये मनुष्य अनेक रुप विधानों की योजना करता है। इन रूप विधानों की आवश्यकता भी इसलिये पड़ती है, क्योंकि मनुष्य अपने वर्तमान के साथ अपने अतीत और भविष्य में भी जीवित रहना चाहता है। अतीत और भविष्य में जीने के लिये वह कल्पना का आश्रय ग्रहण करता है, और यहीं कहानी का जन्म होता है, इसीलिये कहानी का जन्म उतनी ही प्राचीन मानी जा सकती है, जितना मनुष्य।
(अ) प्राचीन रुप आख्यायिकाओं के रुप में वेदों और उपनिषदों में भी कहानी के बीज निहित हैं। पंचतंत्र का रचना काल पांचवी शताब्दी में माना गया है। संस्कृत साहित्य को कथा साहित्य का आगार ही कहा जा सकता है, परंतु हिंदी साहित्य में कहानी विधा परंपरागत रुप से संस्कृत साहित्य से संबंधित न होकर अंग्रेजी साहित्य से जुड़ी है, इसीलिये यह माना जा सकता है कि हिंदी कहानी ने भी अपनी यात्रा वहीं से आरंभ की जहां से अंग्रेजी कहानी की यात्रा प्रारंभ हुई थी। साहित्यिक कहानियों का प्रादुर्भाव अंग्रेजी साहित्य में 19 वीं शताब्दी में हो गया था। स्टीबेंशन और कीपलिंग की कहानियों का रचनाकाल 1800 ई. से ही प्रारंभ हो जाता है। अंग्रेजी साहित्य में भी कहानी परंपरा का श्री गणेश योरोप के इतर भाषाओं की साहित्य की तुलना में बहुत बाद में हुआ परंतु योरोपिय साहित्य का परिचय हमें अंग्रेजी साहित्य के माध्यम से ही प्राप्त हुआ, इसीलिये हिंदी कहानी पर अंग्रेजी साहित्य का ही अधिक प्रभाव पड़ा। रूपयार्ड, किपलिंग के पूर्व ही ओ. हेनरी, मोपांसा और चेरवोव ने कहानी के विकास को चरम सीमा तक पहुंचा दिया था। चेखव की मृत्यु 1908 में हो गई थी, उन दिनों हिंदी में मौलिक कहानियां लिखी जाने लगी थी।
हिन्दी कहानी का बीज राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की राजा भोज का सपना में दिखाई देती है। 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब हिंदी कहानी का जन्म हो रहा था, भारत वर्ष में सुधारवादी प्रवृत्ति बलशाली हो रही थी, यह हिंदी साहित्य के इतिहास का भारतेन्दु युग था, इस काल में कहानी के विकास की पृष्ठ भूमि का निर्माण हुआ। इस विषय में डॉ.लक्ष्मी नारायण लाल लिखते हैं - हिंदी कहानी का सभ्यक शैली की ओर प्रेरित करने का श्रेय भारतेन्दु युग को है। यह युग पत्रकारिता के आरंभ का युग था, तत्कालीन समाज को इस ओर आकर्षित करने के लिये इस युग ने मुख्यतः मनोरंजक शैलियों को अपनाया, जिसके क्रोड़ में कहानी कला के बीज निश्चित रुप से आए एवं सुधारवादी दृष्टिकोण की प्रमुखता रहने के कारण इस काल की कहानियों में आदर्शोन्मुख प्रवृत्ति विशेष रुप से पायी जाती हैं।’
हिंदी कहानी का विकास बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में माना जाता है। इस प्रकार हिंदी कहानी का इतिहास कुल सत्तर वर्ष का है सुविधा के लिये हिंदी कहानी के विकास का अध्ययन पांच उत्थानों में विभाजित किया जा सकता है।
(1) प्रथम उत्थानः- (1900 से 1925 तक) सन् 1900 से 1925 तक की अवधि में हिंदी कहानी को उच्च कोटि के कहानीकार प्राप्त हो चुके थे। किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ 1903 में, रामचंद्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष’, बंगमहिला की ‘दुलाई वाली’1907, में और जयशंकर प्रसाद की ‘ग्राम’ कहानी प्रकाशित हुई। हिंदी साहित्य की प्रथम कहानी के रुप में अभी तक ‘इंदुमती’ को ही माना जाता रहा है, परंतु कहानी के तत्वों की दृष्टि से आधुनिक कहानीकार और कथा समीक्षक इसे पूर्ण रुपेण मौलिक नहीं मानते । श्री राजेंद्र यादव इन प्रारंभिक कहानियों के विषयों में लिखते हैं - किशोरी गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ 1901 पर टेम्पेस्ट की छाप है, रामचंद्र शुक्ल की ‘ग्यारह वर्ष का समय’ 1903 और बंग महिला की ‘दुलाई वाली’1907 अपनी मौलिकता के बावजूद कहानी होने की मांग पूरी नहीं करती । मैं समझता हूं, हिंदी की प्रथम मौलिक और कलापूर्ण कहानी चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ 1916 है, और उससे ही आधुनिक कहानी का प्रारंभ मानना चाहिए।
श्री देवी प्रसाद वर्मा माधवराव सप्रे की- ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की प्रथम कहानी मानते हैं। यह कहानी 1901 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित हुई थी।
हिंदी की इन प्रारंभिक कहानियों के विकास में सरस्वती का योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा। 1909 में वाराणसी में ‘इंदु’ का प्रकाशन प्रारंभ हो गया। सरस्वती के माध्यम से गुलेरीजी और ‘इंदु’ के माध्यम से श्री जयशंकर प्रसाद ये दो कहानीकार हिंदी साहित्यकार को उपलब्ध हुए। प्रसाद की प्रथम कहानी ‘ग्राम’ इंदु की दूसरे वर्ष की द्वितीय किरण में प्रकाशित हुई।
अगस्त 1918 में श्रीमती कौशल्या देवी के प्रयत्नों से काशी में हिंदी गल्पमाला में प्रकाशन की नींव पड़ी। इसी के सितम्बर 1918 के अंक में श्री जी.पी. श्रीवास्तव की ‘मैं न बोलूंगी’ प्रथम कहानी प्रकाशित हुई । श्री इलाचंद जोशी की ‘सजनवां’ नामक कहानी का भी प्रकाशन 8 मार्च 1920 के अंक हिंदी गल्पमाला के अंतर्गत हुआ। इसके अतिरिक्त श्री चतुरसेन शास्त्री, हृदयेश, सुदर्शन, भगवती प्रसाद बाजपेयी, वाचस्पती पाठक, विश्वम्भर नाथ कौशिक, राजा रमण प्रसाद सिंह आदि का भी अभ्युदय हिंदी साहित्य जगत में इसे काल में हुआ।
हिंदी कहानी के प्रथम उत्थान के कहानीकारों में श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी का नाम अग्रिम पंक्ति में है। श्री राजेंद्र यादव तो उन्हीं को हिंदी का प्रथम मौलिक कहानीकार मानने हैं। वे लिखते हैं - ‘हिंदी का पहली मौलिक और कलापूर्ण कहानी चंद्रधर शर्मा गुलेरी’ का ‘उसने कहा था’ 1916 है, और उससे ही यहां की आधुनियां कहानी का प्रारंभ मानना चाहिए ।
इस कहानी के अतिरिक्त गुलेरी जी की दो अन्य कहानियां महत्वपूर्ण हैं – ‘सुखमय जीवन’ और ‘बुद्धू का कांटा’ । गुलेरी जी ने बहुत कम लिखा इस कारण उन्हें इस कला का प्रवर्तक कहानीकार नहीं माना जा सकता ।
कहानी के क्षेत्र में युग प्रवर्तक की दृष्टि से दो नाम महत्वपूर्ण हैं, श्री जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद । प्रसाद जी की कहानी काल सन् 1911 से प्रारंभ होता है । सन् 1911 से 1922 तक उनके दो कहानी संग्रह प्रकाशित हो गये थे- ‘छाया’ और ‘प्रति ध्वनि’ । इन कहानियों का रुप ऐतिहासिक है, और ये प्रेम सौंदर्य और रहस्य भावना को लिये हुए हैं। प्रेमचंद जी ने सन 1907 ई. से कहानी लिखना प्रारंभ किया । 1916 में उनका प्रथम कहानी संग्रह ‘सप्त सरोज’ प्रकाशित हुआ। प्रेमचंद जी की कहानियों का रुप सामाजिक था। उनकी कहानियों में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति हुई है । यह राष्ट्रीय चेतना के बाद का काल था । सन 1912 ई. में लार्ड हेस्टिंग्ज पर बम फेंका गया। सन 1918 में जलियांवाला बाग का हत्याकांड हुआ । सन् 1920 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। एक ओर देश में राष्ट्रीय चेतना की लहर बलवती हो रही थी। दूसरी ओर समाज में आर्य समाज और ब्रम्ह समाज आदि सुधारवादी प्रवृत्तियां क्रियाशील थी। प्रेमचंद राष्ट्रीय चेतना और समाज सुधारवादी आंदोलन दोनों से ही प्रभावित हुए । वे लिखते हैं- ‘प्रेमचंद अपनी बलवती लेखनी के माध्यम से किसी दयानंद किसी गांधी और किसी राजा राममोहनराय से कम नहीं थे।’
प्रेमचंद की कहानियों में आर्य समाजी आदर्शवाद का स्पष्ट प्रभाव है। उन्होंने सामाजिक विकृत्तियों का उद्घाटन करके पंरपरागत सांस्कृतिक मूल्यों की पुर्नस्थापना की चेष्टा की है। सामाजिक दृष्टिकोण से लिखने वालों कहानीकारों में प्रेमचंद प्रथम सफल कहानीकार माने जाते हैं। प्रेमचंद जी की कहानियों की समीक्षा करते हुए श्री राजेंद्र यादव लिखते हैं - ‘मूल सुधार और हृदय परिवर्तन ही उनकी अधिकांश कहानियों का यंत्र है, और विषय है....राष्ट्रीय भावना, समाज सुधार, पारिवारिक आदर्श, व्यक्ति की ऊंचाई वाले परंपरागत आदर्श की स्थापना कहानियों मे भी तत्कालीन समाज की गरीबी, निरीहता और शोषण का चित्रण हुआ है, परंतु सामाजिक परंपराओं एवं भावनाओं के प्रति पूर्ण आदर्शवादी है, इस कारम उनकी कहानियों में शास्त्रीय तत्व हमें उतने ही प्राप्त नहीं होते जितने प्रेमचंद में। प्रेमचंद की दृष्टि सामाजिक संरचना के प्रति यथार्थवादी है, जबकि प्रसाद जी की आदर्शोन्मुखी ।’ (क्रमशः अगले अंक में....)
सहायकशासकीय स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य महा' जरहाभाटा, बिलासपुर, छत्तीसगढ ◙◙◙
|
|||||||||
| |||||||||