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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 संगीत रूपक

 

प्रवीणराय


 डॉ. श्यामसुंदर दुबे

 

प्रवीणराय-  महाराज । दासी का प्रणाम स्वीकार कीजिये।

इंद्रजीत-  आओ...आओ..........प्रवीण बैठो।

प्रवीणराय- आपकी तबियत तो ठीक है।

इंद्रजीत-  हाँ हाँ हमारी तबियत का क्या पूछती हो ?

प्रवीणराय-  कल से ही आप कुछ-कुछ उदास लग रहे हैं। दासी से कोई गुस्ताखी तो नहीं हो गयी ।

इंद्रजीत-  (नकली हँसी हँसते हुए) तुमसे और गुस्ताखी। नहीं...यों ही..मन पर कुछ बोझ-सा लदा है...पता नहीं क्यों  ऐसा लग रहा है कि तुम अब मेरे पास नहीं रह पाओगी। प्रवीण।

प्रवीणराय-  महाराज । ऐसा न सोचिये...कनीज़ आपकी है और आपकी ही रहेगी। मेरे प्राणों की सौगंध। आप ऐसा न सोचें महाराज । महाराज । मुझसे अगर भूल हुई हो तो मुझे माफ कर दें। .....मुझे माफ...कर दें।

इंद्रजीत-  चलो भाई माफ किया - पगली। कहीं ऐसे रोया जाता है। मेरी प्राण बल्लभा तेरी आँखों में आँसू मैं नहीं देख सकता । ला मैं हाथों से पोंछ दूँ..इनको।

प्रवीणराय-  मरे मन में आशंका उत्पन्न हो गयी है। महाराज मुझे धीरज दो.......।

इंद्रजीत-  ये सब छोड़ो। बस तुम एक बार नाचौं मेरे सामने प्रवीणराय । मैं आज सचमुच बहुत उदास हूँ। चलो            तैयार हो जाओ। नाचौ..नाचौ..नाचौ..प्रवीणराय।

            (घुँघरूओं की आवाज़ उभरती है...स्वर उठता है....)

-नृत्य गीत-

रूठे सैयाँ को मनाऊँ

रिझाऊँ रूठे सैयाँ को

मनाऊँ रूठे सैयाँ को.....रूठे सैयाँ को मनाऊँ।

 

बोले न बरजे री

रसिया न परचै री

मान को हराऊँ।

रूठे सैयाँ को मनाऊँ....।         

पलक न उठाये                      

नैना कौन से लगाये                                 दुखड़ा कौन को सुनाऊँ

रूठे सैयाँ को मनाऊँ।

भयो भुनसारो

फीको चंदा उजियारो।

रस फूलन कुम्हलाऊँ

रूठे सैयाँ को मनाऊँ।

रिझाऊँ सैयाँ को...रूठे सैयाँ को मनाऊँ।

             

इंद्रजीत-बहुत-बहुत खूब.... (ठंडी श्वास लेते हुए) तुम्हारे ये स्वर....तुम्हारे ये ताल बंध,...तुम्हारी

ये अदाकारी मेरे लिए एक याद बन जायेगे - प्रवीणराय। याद बन जायेंगे।

प्रवीणराय-आप ये कैसी बातें कर रहे हैं महराज ।

इंदजीत-हाँ, प्रवीण मैं ठीक कह रहा हूँ । शहंशाह अकबर ने तुम्हें बुलौवा भेजा है । तुम्हारी नृत्य कला की आगरा में धूम है । अकबर तुम्हें अपने रत्नों में शामिल करना चाहते हैं । कल ही एक धावन आया है शाही पत्र लेकर । लिखा है प्रवीणराय को भेजो । अन्यथा अंज़ाम भुगतने के लिए तैयार रहो । ज़ुर्माना तो होगी ही । चढ़ाई भी हो सकती है।

प्रवीणराय- तो यह है आपकी उदासी का कारण, मेरे तो प्राण ही सूख गये थे।   राजा ....मेरे राजा....मेरे सर्वस्व। मैं कहीं नहीं आऊँगी...आपकी छत्र-छाया को छोड़कर मैं कहीं नहीं जाऊँगी । उस बूढ़े अकबर की आज्ञा से हम नहीं डरते । आप लिख भेजिये - प्रवीणराय कोई ऐसी बैसी पातुरा नहीं है जो राज दरवारों को कपड़ों के समान बदलती फिरे। आप लिख दीजिये... प्रवीणराय महाराज इंद्रजीत की है। आप लिख दीजिये संसार में ऐसा कोई राजा नहीं है जो महाराज इंद्रजीत सिंह से प्रवीणराय को छीन सके। हाँ हाँ ...लिख दीजिये।

इंद्रजीत- अपनी-अपनी लगाये रखोगी कि मुझे भी कुछ कहने दोगी। तुम नहीं समझोगी। अकबर जब किसी कलावंत पर रीझता है - तब वह उसे किसी भी क़ीमत पर प्राप्त करने से नहीं चूकता। तुम्हे अकबर के दरवार में जाना ही होगा प्रवीण।

प्रवीणराय- मैं नहीं जाऊँगी महाराज। मुझे आपके चरणों में प्राण देना कुबूल है-लेकिन अकबर के दरबार में जाना मंजूर नहीं।

इंद्रजीत- प्रवीण । तुम समझने की कोशिश करो। मैं तुम्हारे लिए काल से भी लड़ सकता हूँ। फिर अकबर कहाँ ठहरता है। बस एक बात पर विचार कर लो। अकबर का कोप हमारी निरीह प्रजा को झेलना पडे़गा ।

प्रवीणराय-(लगभग रोते हुए) नहीं जाऊँगी...नहीं जाऊँगी ...आप कुछ भी कहें । मैं नहीं जाऊँगी । चाँदनी भला चंद्रमा को छोड़कर कहीं जाती हैं क्या मछली बिना जल के रह सकती है। नहीं नाथ...नहीं नाथ....।

इंद्रजीत-प्रवीण बुद्धि से काम लो। मैंने कहाकवि केशब से परामर्श किया था। उन्होंने जो बात रहीं वह मुझे अच्छी लगी। उस पर अमल किया जा सकता है।

प्रवीणराय- क्या बात कही आचार्य जी ने।

इंद्रजीत-   यही कि प्रवीणराय विदुषी है। समय मौका के अनुकूल उसमें निर्णय लेने की क्षमता है। वह एक ऐसी धूप है, जो अकबर के दरबार में भी नहीं कुम्हलायेगी।

प्रवीणराय-   अच्छा उन्होंने ऐसा कहा।

इंद्रजीत-    हाँ ऐसा ही ....और भी उन्होंने कहा है-

प्रवीणराय-    (उत्सुकता से) क्या कहा ?

इंद्रजीत-     उन्होंने कहा कि प्रवीणराय की सभाचतुरता अद्वितीय है। उसे अकबर के दरबार में जाने दीजिये। अकबर इस प्रज्ज्वलित दीपक को अपने पास नहीं रख सकता...इसका तेज...सहन करना आसान नहीं है।

प्रवीणराय-   आचार्य जी का इतना विश्वास है मेरे ऊपर....।

इंद्रजीत-   गुरु ही शिष्य को अच्छी तरह जानता है। उसकी अच्छाइयाँ और उसकी कमजोरियाँ.....आचार्य के मित्र बीरबल हैं। जो अकबर के बहुत करीब हैं। अगर ऐसी-वैसी कोई बात होगी तो वे निपटा लेंगे। मैं सोचता हूँ तुम अकबर के दरबार में अवश्य जाओ। कलाकार के ऊपर किसी का अधिकार नहीं होता। तुम्हारी कला को विस्तार मिलेगा।...प्रवीण यह मेरी आज्ञा है तुम्हारे इंद्रजीत की।

प्रवीणराय-  आपकी आज्ञा ……. । अपमान हुआ तो यह छाती कटार...मेरे सीने के आर-पार होगी।

इंद्रजीत-   तुम्हारा पथ कल्याणकारी  हो...शुभास्ते पन्थानः ।

 

 

-दृश्य  परिवर्तन-

 

अकबर-      (मिलीजुली..हँसी) यह बीरबल...वाह बीरबल तुम्हारी सानी नहीं लाजवाब...लाजवाब....और मियां तानसेन...तुम्हारी ..राग मल्हार की वह गायकी....क्या कहने ...वाह भाई....वाह....मेरे नवरलों की जितनी तारीफ़ की जाये कम है।

दूत-  शहंशाह अकबर की जय हो...जय हो...जय हो।

अकबर-  क्या खबर है - ओरछा के इन्द्रजीत सिंह की।

दूत- आलमपनाह। प्रवीणराय आपकी खिदमत में पेश होगी। ओरछा के राजा ने आपके हुक्मनामे को मंजूर कर लिया है।

अकबर- हम खुश हुए ...बुंदेला अक्लमंद है - वह हमारी मंशा को जानता है। हमारे दरबार में एक ऐसी शम्मा आ रही है जिसके पुरनूर से चाँद भी शरमा जायेगा। मेरी एक ख्वाहिश पूरी हुई। फनकार परवीन राय...मेरे दरबार ....का दसवां रत्न होगी।

दूत-  आलमपनाह प्रवीणराय पधार रही हैं।

अकबर- दरबार से दरख्वास्त है कि परवीन राय के हाजिर होते ही उन्हें बाइज्जत हमारे करीब लाया जाए, हम उन्हें गौर से देखना चाहते हैं। हिन्दू के नूर को हम अपने करीब आसन देगें।

समवेत स्वर-   जय हो...जय हो शहंशाह अकबर की जय हो। (घुँघरूओं की झंकार नारी की मस्त चाल को व्यक्त करती हुई, धीरे-धीरे करीब आता स्वर)

अकबर- आओ, आओ धरती की मेनका आओ, शहंशाह अकबर तुम्हारा स्वागत करता है।(घुँघरूओं का स्वर हो जाता है)

प्रवीणराय- शंहशाह अकबर को प्रवीणराय बाअदब अर्ज बजाती है।

अकबर-  आओ बाजू से आओ एकदम करीब।(घुँघरूओं की आवाज़ जो एकदम थम जाती है।)

अकबर-  हाँ.....हाँ...... क्यों नहीं तुम्हें सुनने के लिए तो हम कब से बेताब हैं।

प्रवीणराय- अर्ज है....

              विप्र बैध नाई नृपनि, स्वान सौत मंजार,

              जुगल जुरै इक ठौर पर होय विरोध अपार।

              स्वेत रंग सबसे भलौ स्वेत भले न केस

              रमनी रमत न रिपु बदत सुनो सुजान नरेश।

              बिनती राय प्रवीन की सुनिये शाह सुजान।

              जुठी पातर भखत हैं बारी बायर स्वान।

              (दरबार में सन्नाटा और अंतिम दोहे की प्रतिध्वनि की बार-बार अनुगूंज भरती है।)

अकबर-  (एक लम्हें के बाद) मशहूर शायर केशव की शागिर्दी में राय प्रवीन ने शायरी में भी महारत हाशिल कर ली है। बहुत खूब...(हँसी)  बहुत खूब...कुछ पूछना चाहते हैं.....हम.......।

प्रवीणराय-  आदेश करें शहंशाह...।

अकबर-    युवन चलन तिय देह, चरक चलत केहि हेत...।

प्रवीण राय- मन्मथ करि मशाल को, सेंत तिहारे लेत।

अकबर- ऊँचे ह्वै सुरबस किये, सम ह्वै नर बस कीन्ह।

प्रवीण राय-  अब पाताल बस करनि कौं, ढरकि पयानो कीन्ह ।

अकबर- बहुत होशियार हो परबीन राय...तुम्हारी शायरी बड़ी तीखी है - लेकिन मुझे नागवार नहीं गुजरी । मैंने तुम्हें रक्काशा की तरह याद नहीं फरमाया था - तुम्हें एक फ़नकार की तरह अपने दरबार की रौनक बढ़ाने के लिए तकलीफ़ दी थी। तुम अपने ज़मीर और अपने ईमान में पक्की हो परबीन राय,  हम खुश हुए । तुम्हें दरबार-ए-खास में बुलाकर हमने तुम्हारा जी दुखाया, इसके लिए परबीन राय अकबर को माफ़ कर देना । अकबर फ़नकारों की इज्जत करना जानता है। तुम आज़ाद हो परबीन राय...तुम आजाद हो...।(लौटने की पदचाप घुंघरूओं के स्वरों का उभरता और धीरे-धीरे मंद हो जाना ।)

मन नाहीं लागै रे

रसिया बुलावे तो ही

मन नाहिं लागै रे.....

(गीत की पंक्तियाँ उभरतीं हैं।) 

 

डॉ. श्यामसुन्दर दुबे

  डॉ. श्यामसुंदर दुबे

प्राचार्य, राघवेंद्र सिंह हजारी

शा. स्नातक महाविद्यालय

हटा, जिला-धार, मध्यप्रदेश

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