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इराक में ईरानी हस्तक्षेप का औचित्य तनवीर जाफ़री
इराक दरअसल आंतरिक रूप से इस समय दो मुख्य मकसद को लेकर बुरी तरह उलझा हुआ है। एक तो यह कि इराकी जनता जिसमें कि सभी वर्ग एवं समुदाय के लोग शामिल हैं, किसी भी क़ीमत पर अमेरिकी गठबंधन सेनाओं को इराक की धरती पर अब और अधिक दिनों तक बर्दाशत नहीं करना चाहते। दूसरी जद्दोजहद इराकी जनता के समक्ष इस बात को लेकर है कि इराक अब सद्दाम हुसैन के शासनकाल की तरह एक सुन्नी अरब राष्ट्र के रूप में जाना जाए या इराक में बहुमत में रहने वाले शिया समुदाय के हाथों में इसकी बागडोर चली जाए और इराक शिया शासित राष्ट्र कहा जाने लगे। इसी उधेड़बुन में इस समय न सिर्फ़ इराक की जनता उलझी हुई है बल्कि पड़ोसी देश ईरान भी इस विषय में पूरी दिलचस्पी ले रहा है।
इराक की नूरी अल मालिकी सरकार कहने को तो एक लोकतांत्रिक सरकार है परन्तु इसे अमेरिका की पिट्ठू सरकार माना जा रहा है। इस सरकार के प्रति इस बात की पूरी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी तरह से इराक के सभी वर्गों विशेषकर शिया, सुन्नी एवं कुर्द समुदाय के लोगों को साथ लेकर चलते हुए इराक में कानून व्यवस्था की स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयत्न करे। दूसरी ओर इसी मालिकी सरकार पर सुन्नी इराकी समुदाय का यह आरोप है कि यह सरकार शिया हितों का ध्यान रखते हुए सुन्नी समुदाय के हितों को निशाना बना रही है। अपने इसी विरोध के तहत अभी कुछ दिन पूर्व मालिकी सरकार के सभी सुन्नी मंत्रियों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया था। इससे पहले ऐसा ही कदम इराक में सक्रिय शिया नेता मुक्तदा अल सद्र के समर्थकों ने उठाया था। इन शिया सदस्यों ने सरकार पर दबाव डालने हेतु त्यागपत्र दे डाला था। उधर अमेरिका का आरोप है कि इराक में शिया समुदाय की ओर से संचालित की जाने वाली हिंसक व आतंकवादी गतिविधियों में ईरान का पूरा हाथ है, खासतौर पर शिया नेता मुक्तदा अल सद्र की समस्त गतिविधियाँ ईरान के इशारे पर ही संचालित की जा रही हैं। अमेरिका ने तो यहाँ तक आरोप लगाया है कि जब-जब मुक्तदा अल सद्र पर अमेरिकी सैन्य शिकंजा कसता है, उसी समय सद्र इराक छोड़कर ईरान चले जाते हैं।
इराक में कानून व्यवस्था को लेकर चिंतित अमेरिका इराक में शांति स्थापित करने हेतु वैसे तो अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है परन्तु साथ-साथ वह ईरान को भी चेतावनी देता आ रहा है कि वह इराक में हस्तक्षेप करना फौरन बंद कर दे। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने पुन: ईरान पर यह इल्ज़ाम लगाया कि ईरान, इराक में चरमपंथियों को हथियार व प्रशिक्षण मुहैया करा रहा है। बुश ने ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड पर भी इल्ज़ाम लगाया है कि वे इराक में विद्रोहियों को धन और हथियार उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने ईरान से तत्काल इन गतिविधियों को रोक देने को कहा है। अमेरिका ने अपने इस आरोप को प्रमाणित करते हुए बगदाद में 7 ईरानी नागरिकों को गिरफ़्तार किया है जिनके बारे में अमेरिका को संदेह है कि वे ईरान द्वारा इराक में संचालित की जा रही संदेहपूर्ण गतिविधियों में संलिप्त थे। हालाँकि ईरान ने इस बात का खंडन करते हुए कहा है कि गिरफ़्तार ईरानी इराक विद्युत केंद्र के पुनर्निर्माण में सहायता कर रहे थे।
दूसरी ओर इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी ने इराक में शांति स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा क़दम उठाते हुए इराक के तीनों प्रमुख समुदाय शिया, सुन्नी व कुर्द नेताओं को एक मंच पर लाने का सफल प्रयास किया है। गत् दिनों इन तीनों समुदायों के कुछ प्रमुख नेता इराकी टेलीविज़न पर एक साथ दिखाई दिए। अमेरिका की पहल पर प्रधानमंत्री मालिकी द्वारा उठाए गए इस क़दम से नि:संदेह वर्गवाद से जूझ रही इराकी जनता को इराक में शांति स्थापित करने में सहायता मिलेगी तथा इराक में चल रही राजनैतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। इराक में शांति स्थापित करने की दिशा में एक और शुभ समाचार मुक्तदा अल सद्र की मेहदी आर्मी की ओर से भी सुनाई दे रहा है। काफ़ी विरोधाभासों के बीच यह ख़बर है कि सद्र की मेहदी आर्मी ने अगले छ: महीनों के लिए इराक में हिंसक गतिविधियाँ बंद कर देने की घोषणा की है। यदि यह समाचार सही है तो यह इराकी अवाम के लिए सुखद समाचार ही कहा जाएगा। हालाँकि इस समाचार को लेकर कई तरह के मतभेद पाए जा रहे हैं। मेहदी आर्मी के ही कुछ लोगों का कहना है कि यह ख़बर बिल्कुल ही निराधार है जबकि एक वर्ग का मानना है कि सद्र द्वारा यह घोषणा तो ज़रूर की गई है परन्तु इसका मक़सद बिखरी पड़ी मेहदी आर्मी को पुर्नगठित करना तथा इसे नए सिरे से पूरी मज़बूती प्रदान करना है। ज्ञातव्य है कि मेहदी आर्मी में लगभग साठ हजार सशस्त्र सदस्य हैं जो सद्र के इशारे पर कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते हैं।
बहरहाल, चाहे प्रधानमंत्री मालिकी द्वारा इराक के प्रमुख वर्गों को एकजुट करने की कोशिश हो या फिर सद्र द्वारा छ: माह के लिए अपनी निजी मेहदी सेना की हिंसात्मक गतिविधियों पर रोक लगाना। इन दोनों ही प्रयासों में शांति की झलक ज़रूर नज़र आती है। परन्तु इन सबसे अलग एक बात और साफ नज़र आती है कि इराक में वर्तमान अमेरिकी सैन्य वर्चस्व के पश्चात अमेरिका द्वारा खाली किए गए स्थान को आखिर कौन भरेगा। क्या बिना किसी बड़े गतिरोध के इराकी जनता स्वयं यह फैसला कर पाने में सक्षम होगी कि वह अमेरिकी दिशा निर्देश के बिना अथवा किसी पड़ोसी देश विशेषकर ईरान या किसी अन्य सुन्नी अरब राष्ट्र के सहयोग के बिना केवल इराकी अवाम द्वारा संचालित सरकार का गठन कर सके? दूसरी ओर ईरान इस बात के लिए लालायित है कि किसी प्रकार अमेरिका, इराक की धरती से अपने आप को समेटे तथा उसके द्वारा रिक्त किए गए स्थान को ईरान भरे। ऐसी ही मंशा इराक में रहने वाले एक बड़े शिया वर्ग की भी है जोकि ईरान के साथ तालमेल बनाकर इराक को शिया राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है।
प्रश्न यह है कि इराकवासियों के लिए इस समय सबसे अधिक ज़रूरी क्या है। इराक में शांति स्थापित करना, इराक का पुर्ननिर्माण करना, वहाँ फैली अराजकता को समाप्त करना, इराक को आत्मनिर्भर बनाना, रोजी-रोटी एवं रोजगार से जूझ रहे आम इराकियों को काम मुहैया कराना, स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली व पानी जैसे बुनियादी चीज़ों का प्रबन्ध करना या फिर इस बात के लिए संघर्षरत रहना कि इराक भविष्य में शिया राष्ट्र बनेगा या सुन्नी राष्ट्र? शिया व सुन्नी इराक से अधिक ज़रूरी प्रश्न है इराक के अपने प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व एवं उसके अस्तित्व का। जब इराक रहेगा तभी यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य में वह शिया देश होगा, सुन्नी देश अथवा दुनिया के सामने शिया-सुन्नी एकता की मिसाल पेश करने वाला भविष्य का एक सांझी विरासत का देश। परन्तु इस समय दो बड़े मोर्चों पर इराकी अवाम का जूझना किसी भी क़ीमत पर इराकवासियों के हित में नहीं माना जा सकता।
नि:सन्देह अमेरिका इस समय इराक रूपी दो धारी तलवार पर खड़ा है। दुनिया के तमाम देशों, यहाँ तक कि तमाम अमेरिकी व ब्रिटिश नेताओं की ओर से इराक मुद्दे को लेकर आलोचना का सामना कर रहा अमेरिका स्वयं इराक से निकलने के उपाय तलाशने लगा है परन्तु अमेरिका के इराक छोड़ने से पहले यह ज़रूरी है कि इराकी अवाम एकजुट हों। इराक में ईरान सहित सभी पड़ोसी देशों के हस्तक्षेप बंद हों। जातीय स्तर पर इराकियों में एकजुटता पैदा हो। ऐसा न हो कि अमेरिका के इराक छोड़ते ही यह देश गृहयुद्ध जैसी विडम्बना का शिकार हो जाए। इराकी जनता के साथ-साथ ईरान को भी वहाँ शांति स्थापित करने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखानी चाहिए बजाए इसके कि वह इराक में अपना हस्तक्षेप केवल इसलिए जारी रखे कि इराक भविष्य का शिया राष्ट्र बन सके।
(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी) 22402, नाहन हाऊस अम्बाला शहर, हरियाणा ◙◙◙
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