|
|
|
|||||||
|
|
||||||||
|
|
|||||||||
|
मीडिया, बाजार और प्रतिबद्धता डॉ. उर्मिला शुक्ला
आज जब हम मीडिया की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य जनसंचार के दो प्रमुख माध्यमों से होता है प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया । परतंत्र भारत में प्रिंट मीडिया की शुरुआत एक मिशन के तहत हुई । उस समय अखबार आज़ादी की अलख जगाने के साधन थे । लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी जैसे लोगों ने समाचार पत्रों का संपादन किया और अपने विचार जनता में संप्रेषित किये ।
उन्होंने विज्ञापनों से दूरी बनायी । उनका उद्देश्य आज़ादी था, मुक्त व्यापार नहीं था । किसी भी प्रकार का दबाव उनके मिशन में अवरोध उत्पन्न करता इसीलिए उन्होंने सीमित साधनों से अपने मुख्य उद्देश्य की पूर्ति की । उस समय के अधिकांश पत्र और पत्रिकायें स्वायत्तता के पक्षधर थे । पूँजीपतियों का प्रभाव नहीं के बराबर था ।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्रकारिता का स्वरुप बदला । समाचार पत्रों में पूँजी का समावेश हुआ क्योंकि तब समाचार पत्र वृहद पैमाने पर छपने लगे थे । इसलीए लागत और आय के लिए विज्ञापनों को शामिल किया गया । समाचार पत्रों की बिक्री से उन्हें छापना मुश्किल था । इसलिए प्रेस कमीशन में समाचार और विज्ञापनों का अनुपात 60-40 रखा । ताकि समाचार पत्रों को आर्थिक संकट का सामन न करना पड़े । इस प्रकार विज्ञापन प्रिंट मीडिया में शामिल हुए और धीरे-धीरे रक्तवाहिनी की भूमिका अख्तियार की ।
मगर समाचार पत्रों का मूल उद्देश्य समाज और देश की बुराईयों को दूर करने में मदद करना, अच्छाईयों को उभारना और समाज में प्रेरणा उत्पन्न करना था । शुद्ध व्यावसायिकता समाचार पत्रों का लक्ष्य नहीं था । बल्कि आर्थिक लाभ से इतर सामाजिक हित, देश-हित उनका मूल लक्ष्य था । समाचार पत्र पूँजीवादी धारणा से मुक्त रहे । किंतु धीरे-धीरे पूँजी के साथ पूँजीपति, फिर पूँजीवादी धारणा ने प्रिंट मीडिया में प्रवेश किया और प्रमुख अखबारों और पत्रिकाओं में बड़े-बड़े उद्योगिपतियों का स्वामित्व हुआ । पहले पत्र-पत्रिकायें उनके लिये साइड बिजनेस रहे मगर धीरे-धीरे वे मुख्य व्यवसाय हो गये और उन्होंने इसे अपने उत्पाद बेचने का माध्यम बना लिये । साथ ही समाचार भी ऐसे चुने जो अखबार की पत्रिकाओं की बिक्री का आधार बन सकें । देश हित, समाज हित की बातें पीछे छूट गयीं ।
अब प्रिंट मीडिया पूरी तरह से पूँजीपतियों के कब्जे में है। पूँजीपतियों द्वारा पूँजी लगाने के कारण पत्रकारों की स्वायत्ता कम हुई । पूरे समाज में आए नैतिक पतन का प्रभाव पत्रकारिता पर पड़ा, पत्रकारिता मिशन न होकर रातोंरात ख्यात होने, धनी होने का साधन बन गयी। पीत-पत्रकारिता की शुरूआत यहीं से हुई जो आज बड़े पैमाने पर नज़र आने लगी है। परिणाम अब समाचार गौण, विज्ञापन प्रमुख हो गये । आज स्थिति यह है कि विज्ञापनों से अगर जगह बच जाये तो समाचार छापे जाते हैं और समाचार भी वे जो चटपटे हों, अखबार की बिक्री बढा़यें। नैतिकता, प्रतिबद्धता, सामाजिक सरोकार, देश-हित सब बीते ज़माने के साथ छोड़ दिया। आज तो आलम यह है कि अखबार के प्रथम पृष्ठ पर विज्ञापन छापे जाते हैं। विज्ञापन भी ऐसे कि स्तर की बात करना ही व्यर्थ है। आज अच्छा संवाददाता वही है जो अधिक से अधिक विज्ञापन दिलायें। पहले अखबारों को संवाददाता की ज़रूरत होती थी, आज मार्केटिंग एजेंट, मैनेजर की। परिणाम स्थानीय से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों का ज़खीरा तो अखबार में मौजूद मिलता है मगर अच्छे समाचार ढूँढने पर नहीं मिलते।
ये तो हुई प्रिंट मीडिया की बात अब इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करें । पहले आकाशवाणी, फिर दूरदर्शन और फिर केबल क्रांति आज चौबीसों घंटे इन चैनलों के हवाले हैं। दूरदर्शन सरकार के अधीन था इसलिए कुछ सीमायें थी । सरकार की जनता के प्रति कुछ जबावदारी तो थी । इसके कार्यक्रमों का भी स्तर था और विज्ञापनों की सीमा भी। मगर जब से प्राइवेट चैनल आये इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा ने मीडिया बाजार में ही परिवर्तित कर दिया। इनका कोई मिशन नहीं । सिर्फ पैसा कमाना ही इनका लक्ष्य है। अधिक से अधिक विज्ञापन दिखाते इन चैनलों से प्रसारित कार्यक्रम भी बाजारवाद को पुख्ता करते हैं। इन पर प्रसारित धारावाहिकों के पात्रों की बात तो करनी ही बेकार है। बस बाजार ही प्रमुख है। ये धारावाहिकता पता नहीं किस समाज का चित्रण करते हैं जहाँ औरतें भी पूरी ज़िंदगी साज़िशों में ही बीता देती है।
समाज और बाजार के प्रति मीडिया की मध्यस्थता होती है। मीडिया के माध्यम से बाजार और समाज एक दूसरे से जुड़ते हैं। किसी भी उत्पाद के प्रति विश्वसनीयता मीडिया में प्रसारित विज्ञापनों से उत्पन्न होती है। अतएव मीडिया की जिम्मेदारी दोहरी है। किंतु आज मीडिया पूरी तरह से पूँजीवादी हो चुका है। उसका एकमात्र लक्ष्य देशी और विदेशी पूँजीपतियों के उत्पाद बेचने का उपक्रम है। देश और समाज के, यहाँ तक मानव जीवन को होने वाले नुकसान के विषय में सोचने की ज़रूरत भी महसूस नहीं करता और मीडिया से जुड़े तमाम लोग, एजेंसियाँ, मॉ़डल, हमारे फिल्म अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, क्रिकेटर यानी हमारे अपने ही लोग इसमें संलग्न है। परिणाम मनुष्य के लिये हानिकारक वस्तुओं का भी आकर्षक विज्ञापन दिखाया जाता है और लोग उससे प्रभावित होकर उसका इस्तेमाल करते हैं। सिगरेट, शराब, शीतल पेय, इनके हानिकारक तत्वों की जानकारी दी ही नहीं जाती । बैगपाइपर शराब की कंपनी है, वह दिखाने के लिये सोड़ा भी बनाने लगी जिसका विज्ञापन अजय देवगन करते हैं, इससे सोड़ा इतने धीरे बोला गया है कि सुनाई ही नहीं देता।
अब सोचिये कि यह विज्ञापन सोडा का है या शराब का, निश्चित रुप से शराब का, पेप्सी आदि शीतल पेय में निश्चित मात्रा से अधिक कीटनाशक प्रमाणित हो चुका है फिर भी हमारे मॉडल, अभिनेता और क्रिकेटर उनका विज्ञापन करते हैं । हमारे लोगों को ही हमारी चिंता नहीं है । समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी नहीं है तो विदेशी कंपनियों से क्या आशा की जाय कि वे हमारी चिंता करेंगी। भारत और ऐसे ही अन्य विकासशील देशों के लोग हानिकारक पदार्थों का सेवन करने को विवश हैं। कभी कोई विरोध उठाता भी है तो उसे हमारे अपने लोग विज्ञापन के जरिये ग़लत ठहरा देते हैं। चाहे कैटवरीज चॉकलेट में कीड़ों की बात हो या वर्ड़ फ्लू जैसी घातक बीमारी की हमारे अभिनेता सदैव तैयार हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सौंदर्य प्रतियोगिताएँ करवाती हैं विश्व और ब्रम्हांड सुंदरियाँ चुनती है। क्रिकेट प्रायोजित करती हैं। माडलों, अभिनेताओं, क्रिकेटरों को ब्रांड ऐम्बेसडर बनाती हैं, परिणाम जनता उन पर विश्वास करती है। अमिताभ बच्चन कहते हैं - कैडबरीज में कीड़े नहीं है, वे बच्ची को उसकी माँ से ज़्यादा विश्वासनीय लगते हैं, परिणाम जनता उन पर विश्वास कर लेती है।
सलमान खान, आमिर खान जिन व्यवसायियों के पक्ष में वर्ड फ्लू का ऐसे विरोध करते हैं, जैसे उन्होंने स्वयं परीक्षण किया हो। उन्हें तो पैसा मिलता है, उम्मीद से ज़्यादा। कुछ खाने-पीने की भी ज़रूरत नहीं, केवल दिखाया जाता है। पिसते तो आम लोग हैं, जो उन पर और उस उत्पाद पर विश्वास करते हैं।
आज प्रत्येक व्यक्ति बाजारवादी अर्थव्यवस्था के शिकंजे में हैं। वह गले-गले तक कर्ज में डूबा है। उसके इर्द-गर्द फैला मीडिया का जाल उससे उसकी सोचने की शक्ति छीन चुका है। वह तो सिर्फ पटाने की तरकीबें ढूँढता है उसे आज मकान लोन, कार लोन, बच्चों की उच्च शिक्षा के लिये लोन, फिर उन्हें सैटिल करने, उन्हें अमेरिका भेजने की ख़्वाहिश कुछ सोचने ही नहीं देती । ज्ञातव्य है कि अधिकांश राष्ट्रीय कंपनियाँ अमेरिका से नाभि नाल आबद्ध हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ छिपे हुए दलालों की भूमिका में है। हमारे सारे उत्पाद पर ई-चौपाल के द्वारा कब्जा चाहती है। बीजों, दवाइयों, पौधों, वृक्षों का पेटेंट कराने के पीछे आर्थिक रूप से गुलाम बना लेने की साज़िश ही है।
मीडिया और समाज को प्रभावित करने वाले लोग हमारी सरकारें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों की कठपुतली बनी हुई है। वे जैसा चाहते हैं हम सब वहीं करते हैं। यूँ तो आने वाली आर्थिक गुलामी के लिए प्रत्येक व्यक्ति जिम्मेदार होगा किंतु मीडिया और उससे जुड़े लोग, समाज को दिशा देने वाले, उसे प्रभावित करने वाले लोगों का दोष कई गुना अधिक होगा क्योंकि उनकी जिम्मेदारी आम व्यक्ति से अधिक है और जानबूझकर किया गया अपराध कभी क्षम्य नहीं होता। एक बात और, हमारी संस्कृति और हमारा देश तो हमारी पहचान है। इनके बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह बात उनपर भी लागू होती है जो आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का साथ अपने के लिये दे रहे हैं।
तो आज ज़रूरत है मीडिया अपनी भूमिका का मूल्याँकन करें । आज उसकी भूमिका भी संदिग्ध है। उस पर ब्लैकमेल का आरोप लगता है, मामला चाहे स्टिंग ऑपरेशन का हो, दाऊद की पार्टी में अभिनेताओं के शामिल होने का हो या चाकलेट में कीडों का हो, उसकी भूमिका संदिग्ध ही रही है। उसे अपनी भूमिका निर्धारित करने की पुनः ज़रूरत है। मीडिया हमारी समाज व्यवस्था का अंग है अतएव उनकी भूमिका दोहरी है। समाज के प्रति उनका दायित्व है, नींद से जगाने की जिम्मेदारी मीडिया की है न कि उस बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ।
प्राध्यापक, छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर, छत्तीसगढ़ ◙◙◙
|
|||||||||
|
|
|||||||||
|
|||||||||