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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 यात्रा-संस्मरण

 

समुंदर के किनारे शतरंज


मोहन राणा

 

28 जुलाई 2007।

 चैस के साथ मोहन राणास्काए द्वीप से सुबह नौ चालीस पर चला पानी का जहाज, समुंदर शांत था  इंजन की घरघराहट और हवा के ठंडे थपेड़ों में सागर की गहराई और विस्तार पर कुछ सोचते सोचते, जहाज ग्यारह बीस पर लुइस द्वीप पहुँच गया। रास्ते में स्ट्रोनवे में भोजन करने के बाद द्वीप के पश्चिम में उइग इलाके में जो 33 मील की दूरी पर है, चार बजे तक हम अपने गंतव्य आर्डऑयल पहुँच गए सुना है यहाँ के तट बहुत सुदंर हैं, सामान उतार कर घर में रखा जो हमने हफ्ते भर के लिए किराए पर लिया है, और घूमने के लिए निकल पड़ा।

 पिछले हिमयुग ने इस भूगोल का तराशा है। चारों ओर हरी ढलानें, नीला आकाश  और बादल का एक हल्का सा जैसे ब्रश स्ट्रोक फीका होता हुआ आकाश की नीलिमा में, कुछ पत्थर जहाँ तहाँ उभरते हरियाली के बीच जैसे कहते, हम भी हैं यहाँ ये पहाड़ घास के नहीं पत्थर के बने हैं!

 

सुदंर बुग्याल को निहारते नीले आकाश को एक साँस में खींचते भला किसे अच्छा ना लगेगा, समुद्र कहीं पास ही लगता लहरों की आवाज़ हरी ढलानों को लाघ कर जैसे पहुँचती मानो बताती अपनी दिशा। पगंडडी के एक खेत से दूसरे खेत से गुजरती कि नज़र एक लकड़ी मूर्ति पर पड़ी, इस सुनसान में यह क्या? सोचकर में उसकी ओर बढ़ा नजदीक पहुँचते धीरे-धीरे उसकी पहचान स्पष्ट होने लगी, अरे यह तो सुप्रसिद्ध ‌"चेसमैन" है। बलूत की लकड़ी का आठ फुट ऊँचा मोहरा (राजा) गंभीर विचार मुद्रा में  उसकी गोद में तलवार है बड़ी-बड़ी घूरती हुई आँखें अलंकृत वेशभूषा.... मूरत तारों के बाड़े में है, पर कोई गेट नहीं है बस आप सीधे ही उसके पास जाकर अपनी नगण्यता को अनुभव कर सकते हैं इस वीराने में, मूर्ति के पास लगे सूचना पट्ट के अनुसार - काष्ठशिल्प को स्टीफन हेवर्ड ने तराशा है 2006 में उइग सामुदायिक परिषद की ओर से इसे बनाया गया और आर्डऑयल चरवाई समिति के सहयोग से इसे स्थापित किया गया। 

 

मखाह में चारों ओर फूल खिले थे समुद्री हवा के झौंकों में उँची घास झूम रही थी, चारों ओर लाल तिपतिया, ऑर्किड, झाड़ीदार पौधे (हैदर) के जामुनी रंग के फूल धूप में चमक रहे थे। कुछ भेड़े आराम छोड़ कर मुझे देखने लगीं मखाह एक विशेष प्रकार का चारागाह है जो इस द्वीप की में एक भौगोलिक विशेषता है सारी दुनिया में मखाह घासभूमि कुल 25,000 हैक्टेयर है, इसमें 17,500 हैक्टेयर  स्काटलैंड में है बाकी पश्चिमी आयरलैंड में है। मखाह के कोमलता के विपरीत घिसे परीले कठोर शिखर भी हैं इस भूगोल में, यहाँ दूर-दूर तक फैले पहाड़ों पर हल्की नीली रंगतें उनके खुरदरे आकारों से स्फुट होतीं। जैसे उन्होंने आकाश की युगीन नीलिमा को सोख रखा हो या बारिश ने उन पर छिड़का हो।

 

पूरब दिशा में कुछ जानवर चरते दिखाई दिए, पहचान हुई "हाइलैंड कैटल" हैं इनके बड़े सींग होते हैं आमतौर पर भूरे रंग के इन जानवरों के लंबे बाल होते हैं इन कठोर और ठंडे प्रदेशों में लायक ये यहाँ के मूल जानवर हैं, माँस और चमड़े के लिए इनको परंपरागत रूप से पाला जाता रहा है, बाद में पता चला किसी अवकाश प्राप्त डॉक्टर ने उन्हें शौकिया पाल रखा है।

 

तो अब इन शतरंज के मोहरों की बात-

विश्वप्रसिद्ध शतरंज के मोहरे इसी उइग के मखाह में 1831 में पाए गए, ये नोर्स  कला के श्रेष्ठ नमूने हैं। वालरस के गजदंत (खांग) और व्हेल के दांतों से बने 93 मोहरों को विशेषक्षों के अनुमान के 450 साल तक चले लुइस द्वीप पर नोर्स शासन के दौरान अनुसार 1150-1200 के दौरान बनाया गया था, उपलब्ध प्रमाणों और शोध के अनुसार ये संभवतः नार्वे की मघ्यकालीन राजधानी ट्रोनधिनम में बनाए गए थे, इनका काल निर्धारण इन मोहरों के डिजानों की कलात्मक शैली के आधार पर किया गया है, वाइकिंग काल में बने ये अद्वितीय सुदर मोहरे उस काल के विशिष्ट प्रतिनिधि है इनके  सुंदर, बारीक व कलात्मक अलंकरण शिल्पकार की तक्षकला में दक्षता और अनुभव को परिलक्षित करते हैं।  कुछ देर तक देखें इन्हें तो वे जैसे जीवंत हो जाते हैं, ये केवल मोहरे ही नहीं हैं अपने समय के गवाह भी हैं। हर मोहरे का अपना चरित्र है जो उनके हावभाव से प्रकट होता है, दुखी रानी, विचारग्रस्त राजा, हिंस्र प्यादे, शांत बिशप, घुड़सवार सूरमा, सभी चरित्रों के आँखें बड़ी और घूरने वाली हैं।  इस खजाने के 67 मोहरे और 14 गोटियाँ ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में हैं और 11 मोहरे राष्ट्रीय संग्रहालय एडिनबरा स्काटलैंड में संग्रहित हैं।

 

लुइस में ये शतंरज के मोहरों का यह अनूठा खजाना कैसे पाया गया इसको लेकर कई किस्से हैं। इस बात पर आम सहमति है कि ये रेत के टीले में 1831 में दबे पाए गए पर वे वहाँ किसने छुपाए थे और क्यों इस बारे में? कई कहानियाँ पढ़ने सुनने को मिलती हैं। कहते हैं इस खोज के स्रोत को जान बूझ कर तोड़ा मरोड़ा भी गया फिर भी

 

एक कहानी कुछ इस तरह से कही जा सकती है - यह घटना सन 1600 के ठीक बाद हुई बताई जाती है, उस समय भारत में अकबर का शासन समाप्त होने वाला था और इंग्लैंड में रानी एलिजाबेथ प्रथम का शासन समाप्त होने को था इसी बरस 31 दिसंबर 1600 में लंदन में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को चार्टर दिया गया यह कंपनी दुनिया की पहली बहुराष्ट्रीय कंपनी थी यह कहना अतिशयोक्ति न होगी। पर इन बड़ी और ऐतिहासिक घटनाओं से दूर स्काटलैंड के उत्तर पश्चिम में लुइस द्वीप में एक गड़रिया जिसका नाम रेड गिली था अपने काम में लगा था कि एक नज़ारा उसने देखा, एक जहाज हैमनअवे खाड़ी में लंगर डाले था, उस जहाज से एक छोटी नाव में एक युवा नाविक को उसने भागते देखा, जब वह नाव किनारे पर लगी तो गड़रिये ने उस नाविक पूछताछ की, उसने बताया कि उसके पास पैसे नहीं थे इसलिए उसने "नाविकों का खेल" बेचने के लिए चुरा लिया, गड़रिये ने लालच में उस नाविक की हत्या कर दी और उसके शव तथा शतरंज के खजाने को छुपा दिया, बाद में जब उसने उस बक्से को खोला तो मोहरे देख कर उसे कुछ सूझा नहीं कि वो उनका क्या करे, उसने उन्हें वहीं छुपा दिया।

 

इस घटना के बाद रेड गिली का व्यवहार बिगड़ता गया और कुछ साल बाद  महिलाओँ के प्रति दुराचार के अपराध में उसे गिरफ्तार कर लिया गया और स्ट्रोनवे( लुइस द्वीप की राजधानी) में उसे फासी दे दी गई, कहते हैं फासी के तख्ते पर उसने शंतरज के मोहरे चुराने और नाविक की हत्या करने का अपराध कबूल किया पर इस पर शायद ही किसी ने गौर किया।

 

और समय बीतता गया, कई मौसम आए गए, बरस बीते।

उस सुदूर इलाके में जहाँ सड़कें भी ना थी नावों से लोग द्वीप के इस सिरे से दूसरे तक जाते थे, लोग पत्थर के बने घरों रहते जिनके छतें फूस की बनी होती थी इन्हें आजकल "ब्लैक हाउस" कहा जाता है इनकी बची खुची दीवारें अभी भी कहीं-कहीं दिखाई देती हैं, एक संग्रहालय भी इन मकानों के बारे में है। इन घरों में चिमनी नहीं होती थी धुँआ छत से निकलता था, एक मकान के अंदर एक हिस्से में लोग रहते थे दूसरे में उनके जानवर। समाज जमींदारों और चर्च के दबदबे में था। घास और पत्थरों के बीच खेती के लिए उपजाऊ जगहें कम ही थीं जीवन और जीविका कठिन थी। फिर भी लोग यहाँ रहते थे अपनी स्मृतियों के साथ।

 

दो सौ बरस से पहले हुई यह घटना किंवदंती में बदल गई, जब तब बड़े बूढ़े उइग के इलाके में उसे सुनाते पर धीरे-धीरे बीतती पीढ़ियों के साथ यह कहानी भी  विरल होती गई हर थपेड़े में थोड़ी और रेत उड़ती-बहती ढलानों पर बावली विचरती हवा के साथ, कहानी के अंश द्वीप के कठोर जीवन की स्मृतियों में टूटने लगे थे कि एक घटना घटी - 1831 के साल शुरू हो रहा था लुइस द्वीप कई दिनों से बुरे मौसम की चपेट में था, तेज हवा और बारिश और उफनता समुंदर।  कई दिनों बाद मौसम कुछ सुधरा। उइग तट के पर आर्डोइल इलाके में समुद्र में आए ऊँचे ज्वार के बाद तट के पास रेत का एक टीला ढह गया, और एक छोटा सा पत्थर का भूमिगत कोटर प्रकट हो गया, पास ही में काम कर रहे एक पेनीडॉनल्ड गाँव में रहने वाले किसान मालकम "स्प्राट" मेकलाउड ने जब वहाँ से गुजरते उसे देखा और जिज्ञासावश फावड़ा लगा कर जब उसने उसे खोला तो दृश्य को देख कर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई वहाँ उसने छोटी-छोटी सफेद उसे आकृतियाँ देखीं तो वह उन्हें वहाँ सो रही नहीं परियाँ समझ कर डर गया और अपना फावड़ा वहीं फेंककर घर भाग गया, घर पहुँच गया और उसने यह किस्सा अपनी पत्नी को सुनाया उसने उसे समझा बुझा कर वापस भेज कर वह खजाना लाने क मना लिया

 

जाने में मोहरों के अलावा 14 गोटियाँ भी थी और एक बारीक नक्काशीदार बकसुआ भी था, उस खजाने को वह घर ले आया, शुरू-शुरू में किसान ने उसे अपनी गौशाला में प्रदर्शन के लिए रख दिया और जिले भर से लोग उस कतुहल को देखने के लिए आते थे। कुछ समय बाद उसने उसे स्ट्रोनअवे के रॉडरिक पेइरी नामक व्यापारी को तीस पाउँड में बेच दिया। इन मोहरों को पहली बार 11 अप्रैल 1831 को एडिनबरा में प्रदर्शित किया गया, उधर लुइस द्वीप में कुछ बरस बाद मालकम "स्प्राट" मेकलाउड और उसके परिवार और पड़ोसियों को पेनीडॉनल्ड से बेदखल कर दिया गया और उनके स्थान पर आर्डरोइल में एक फार्म को स्थापित कर दिया गया। मोहरों के प्रदर्शनी के बाद एक प्राचीन वस्तुओं के व्यापारी से बयासी मोहरों व गोटियों को ब्रिटिश म्यूजियम ने नवंबर 1831 और जनवरी 1832 के दौरान 80 गिनीज में बेच दिया। ब्रिटिश म्यूजियम सारे खजाने को एक साथ खरीदने के मंशा रखता था पर व्यापारी ने चुपके से दस मोहरों को चार्ल्स कर्क पैट्रिक नाम के व्यक्ति को उसने बेच दिया, कर्क पैट्रिक ने फिर एक उँट (बिशप) को बाद में सीधे लुइस द्वीप से खरीदा इन ग्यारह मोहरों को स्काटलैंड के राष्ट्रीय संग्रहालय ने 1888 में खरीदा जहाँ वे प्रदर्शित हैं, सन 2000 में उन्हें केवल एक दिन के लिए उइग में प्रदर्शित किया गया था।

 

 

उइग के तट के नजदीक निर्जन ढलान के पास पर आठ फुटे ऊँचे शंतरज के मोहरे को देख कर भय और विस्मय का मिला-जुला भाव मन में आता, लकड़ी में तराशी ये मूर्तिशिल्प मूल मोहरे की हूबहू नकल हैं उसकी सारी बारीकियाँ शिल्पकार ने कुशलता से गढ़ी हैं।

 

इन मोहरों के लोकप्रियता की एक बानगी देखें कि सन 2001 में बनी "हैरी पॉटर एंड द फिलॉसफर्स स्टोन" के एक रोमांचक दृश्य में शतरंज के खेल में उइग पाए इस शतरंज के खजाने की रानी को एक मोहरे के रूप में उसे दर्शाया गया था।

 

इनकी कीमत तय करना कठिन है शायद जिसने भी उन्हें दबा छुपाया था उसे भी मालूम था कि वे कीमती हैं पर वह उन्हें बेच नहीं सका 80 गिनीज की कीमत यान आज के पैसे के हिसाब से केवल 6600 पाउँड।  जब सन 2000 में छह मोहरों को लुइस द्वीप में एक विशेष प्रदर्शनी के लिए ले जाएगा तो पूरे संग्रह का मूल्य 3 मिलियन पाउँड आका गया था। चालीस लाख से अधिक लोग हर साल इन मोहरों को लंदन और एडिनबरा में देखने के लिए आते हैं इन्हें एक तापमान नियंत्रित कोष्ठ में इन्हें प्रदर्शित किया गया है ताकि इनका स्वरूप जस का तस बना रहे।

 

इन सभी मोहरों से शतरंज के दो पूरे सेट बनते हैं, माना जाता है ये चार से पाँच अपूर्ण सेटों का हिस्सा है। अभी तक संग्रहित मोहरों में कुल मिलाकर 8 राजा, 8 रानियाँ 16 ऊँट(बिशप), 15 घोड़े (सरदार), 12 हाथी (रूक) और 19 प्यादे (पॉन) हैं इनका आकार 3।5 सेंमी चौड़ा और 10।2 सेंमी ऊँचा है, बाक मोहरे हो सकता है अभी भी उइग के निर्जन विस्तृत तट में कहीं दबें हो या समुंदर उन्हें अपने साथ कहीं ले गया हो। इन मोहरों की बड़ी-बड़ी विस्फारित आँखें क्या देख कर आक्रांत हैं, आतंकित कर रही हैं विपक्ष को अपलक सदियों से। क्या ये खेल के मोहरे हैं या खेल के दर्शक?

 

 शिल्प को कुछ देर तक देखने के बाद मैं तट की बढ़ गया। वहाँ कोई नहीं था, पानी लहरें दौड़ती उमड़ती टकराती, किनारे पर उँची घास सरसराती हवा के साथ झूमती, और एक पल को सब कुछ शांत जो जाता अगली लहर के आने तक। यही कहीं कुछ हुआ बहुत पहले एक दिन।

 

अटकलें !

7 अगस्त 2007 

 नींद अचानक टूट गई बाहर हवा साँय-साँय कर रही थी और बारिश हो रही थी काली स्लेट की छत पानी की बौछारों और थपेड़ों से काप रही थी, बिना कुछ और सोचे मैंने जबरन आँखें मूद लीं, नींद तो नहीं अँधेरा तो था वहाँ सुबह हवा की तीव्रता कुछ कम हो गई थी पर बूँदा बांदी जारी थी।

 

दोपहर बाद स्ट्रोनवे से लौटते हुए देखा कि अभी तक जो छोटे छोटे सुंदर पानी के झरने और नाले दिखाई देते थे लगातार बारिश ने उनका स्वरूप ही बदल दिया उफान और वेग के साथ वे सड़क के आसपास के मैदानों और ढलानों में अपनी अपनी दिशा में बढ़े जा रहे थे। कत्थई रंग का पानी पत्थरों से टकराता उछलता, और कार पानी की छपाकों के बीच सर्पिल सड़क पर अपने गंतव्य को भाग रही थी।

 

गेस्ट हाउस के सामने जो घास में छुपा हुआ नाला चुपचाप अब तक बहता था उसमें भी बाढ़ आ गई थी शाम को बारिश चलती रही खिड़की से देखा उसका पानी सड़क तक चढ़ चुका था समुद्र में ज्वार आने के कारण पानी समुद्र में बहने के बजाय वापस लौट रहा था अटकलें चल रही थी मन कि अगर यह कल सुबह उतरा नहीं तो मेन रोड तक कैसे पहुँचेगे कहीं कल दोपहर फेरी तो छूट ना जाएगी।

 

 यहाँ रहते हुए दिन बीत चुके हैं, जुलाई को पहुँचे थे, और जैसे एकाएक पूरे हफ्ता बस यह सोच कर ही बीत गया डेविड किनलाक की कविता है "बोस्टा के तट पर"  पढ़ रहा हूँ -

मेरी बायें ओर एक मकान गल रहा है,

और दायें समुंदर चल रहा है

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   मोहन राणा

221, Wellsway, Bath BA2 4RZ

England, UK

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