साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

  ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 संस्कार

 

चौंथा भाग

एक नये समीक्षक को सलाह


जार्ज बर्नार्ड शॉ 

 

(उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक नाट्य समीक्षा से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में 'ऐडवाइस टु ए यंग क्रिटिक' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा - एक नये समीक्षक को सलाह । हम इसे साहित्यिक हित में संपूर्णतः प्रकाशित कर रहे हैं। इस महान कृति को अब धारावाहिक रूप से आगे पढ़ सकते हैं । प्रस्तुत है इस धारावाहिक की चौंथी कड़ी - संपादक)


निजी

29, फिट्जरॉय स्क्वायर, डब्ल्यू

2 दिसम्बर, 1894

प्रिय महोदय,

मैं आपकी सबसे बड़ी सेवा यही कर सकता हूँ कि आपके द्वारा प्रस्तुत समीक्षा को लूँ और उस पर बिना किसी औपचारिकता के अपने विचारों को अंकित करता चलूँ। यह परिवर्तन काली स्याही से किया जा रहा है। जो बात आप कहना चाह रहे थे, उन्हीं बातों को मैं भी बिना किसी भूमिका के कहने की कोशिश कर रहा हूँ अर्थात् किसी विषय को कहने के लिए जहाँ आप पैंतरे-बाजी करना चाहते हैं, वहाँ मैंने सीधे ढंग से अपना स्पष्ट विचार अंकित कर दिया है । फ्रांसीसियों के बारे में आपका मतलब पारम्परिक मंचीय फ्रांसीसी से है। इसलिए मैने इस भी तदनुकूल ही संशोधित कर दिया है। पहले यह सोच लिया करें कि सटीक और सपाट रूप में आपके कहने का अर्थ क्या है। राष्ट्रीय, नैतिक, आलोचनात्मक या अन्य किसी प्रकार की पूर्वधारणाएँ न बना लें । जब आपने फ्रांसीसी और अँग्रेज़ों की बात की तो ऐसा लगा कि आपकी धारणा राष्ट्रीय है, और जब आपने यह कहा कि वह विवेक के सम्बन्ध में बहुत नीचे गिर चुकी है तो ऐसा प्रतीत हुआ कि आपका दृष्टिकोण नैतिक है। सबसे पहले आप अपने तथ्यों को लिखें। यही सभी शैलियों की नींव है। शैली ही आपकी अभिव्यक्ति है और यथार्थ सत्य के बिना अभिव्यक्ति सम्भव भी नहीं।

 

लाल स्याही से मैंने वे ही आलोचनाएँ अंकित की हैं जो आपकी रचना पर कोई अनुभवी सम्पादक अंकित करता ।

 

पुस्तक लिखने के बारे में आपने मेरी सलाह नहीं मानी । आपका कहना है कि पुस्तक-लेखन में आप सक्षम नहीं हैं, बस, यही कारण है कि मैं आपको सीखने की सलाह देता हूँ । आगर मैं आपको स्केटिंग करने की सलाह दूँ तो आप यह नहीं कहेंगे कि आपका संतुलन अभी पर्याप्त ठीक नहीं है । गिरते-पड़ते और अपने को हास्य का अंग बनाकर ही हर आदमी स्केटिंग करना सीखता है और इसी प्रकार हास्य का अंग बनकर ही कोई आदमी उन्नति करता है । जब तक आप कुछ खराब पुस्तकें लिखने का अभ्यास न कर लें, तब तक आप कोई अच्छी पुस्तक लिख भी नहीं सकते । अगर आपको मेरी स्कॉटिश रचना भेजी गयी हो तो आप देखेंगे कि मैंने तिरस्कार करने योग्य खराब समीक्षा से लिखना प्रारम्भ किया था । प्रेस के लिए लिखने से पहले मैंने पाँच लम्बी पुस्तकें लिखी । द वर्ल्ड में अपना कैरियर प्रारम्भ करने से पहले विलियम आर्चर ने रिचर्ड बैग्नर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक लम्बा आख्यान, एक विशाल उपन्यास और एक नाटक लिखने के अतिरिक्त इर्विंग पर एक विशाल उपन्यास लिखा । साथ ही स्कॉच पत्र के लिए मुख्य रुप से वे राजनीतिक लेख भी लिखते रहे । अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में उन्होंने चार नाटक भी लिखे (इस बात को आप किसी से बताएँगे नहीं) । इसी प्रकार आपको भी चक्की में पिसना होगा । लगता है कि आप बहुत जल्दी लिखना आरम्भ  नहीं कर रहे हैं । अगले पाँच वर्षों के प्रत्येक नौ महीने हर रोज कम से कम एक हजार शब्द लिखें । रस्किन, रिचर्ड वैग्नर, लेसिंग, लेम्ब और हेजलिट आदि सभी बड़े समीक्षकों को पढ़ें । ब्रिटिश म्यूज़ियम के अध्ययन कक्ष का टिकट ले लें और जब तक आप वहीँ रह सकते हों, रहें । हर प्रथम श्रेणी के संगीत-समारोह, ऑपेरा और थिएटर जाएँ । वाद-विवाद संस्थाओं में प्रवेश पा जाना भी ठीक रहेगा । साथ ही, जनसाधारण के सामने भाषण देने की कला सीखें रविवारीय, सांध्य तथा राजनीतिक सभाओं में आएँ और राजनीति का अध्ययन करें । जब तक आप अपने पद पर हैं तब तक सबसे चुस्त व्यक्ति बने रहने का प्रयत्न करें । बीस वर्ष की अवस्था का होने के पहले मैंने चार वर्ष तक श्रम किया है । मद्यत्यागी बने, जुआ मत खेलें, उधार न दें, न लें और यदि आप अपने जीवन की सुरक्षा चाहते हैं तो शादी न करें । कार्यकुशलता की प्राप्ति हेतु आगामी 15 वर्षों के लिए अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारित कर लें । शहर आपको कुछ अधिक सिखा नहीं पाता या सीखने का पूरा अवसर नहीं दे पाता तो आप अपने पिताजी को कहें कि आप अलग रहकर भूखों मरते हुए भी यह सब करेंगे । लेकिन, यह कठिन और जोखिमपूर्ण काम है जिसे पूरा करने में साल दो साल, तो लग ही जाएँगे । अन्त में आपको एक सर्वोच्च सलाह दे रहा हूँ । यह सबसे अधिक मूल्यवान है - वह यह कि -

कभी किसी से सलाह न लें ।

 

अब इस बात की आवश्यकता नहीं रही कि मैं आपके पथ-प्रदर्शक, दार्शनिक और दोस्त की भूमिका निभाता ही रहूँ। अगले दस-एक वर्ष तक आपकी उन्नति की सूचना पाये बिना मैं फिर कुछ न हीं कहूँगा । द सन में आया हुआ स्तम्भ बिल्कुल सही और उपयुक्त है । इसके  लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। कुछ और नयी खबर नहीं है। हाँ, मैंने अपना नवीनतम नाटक पूरा कर लिया है। आशा है कि इसमें मुख्य भूमिका कुमारी जेनट एचर्च करेंगी जिनकी प्रतिभा के विषय में मेरे बड़े ऊँचें विचार हैं। यह बहुत भावना-प्रधान नाटक है जिसे पुरुष यदि न भी समझें तो स्त्रियाँ अवश्य समझ लेंगी। यह नाटक इतना सीधा सपाट है कि आश्चर्यजनक ढंग से इसकी बिक्री होगी। यह मेरी पाँचवीं नाट्य रचना है। मेरी पहली रचना विडोवर्स हाउसेज ने इण्डिपेन्डेण्ट थियेटर में ख्याति प्राप्त की थी। मेरी दूसरी रचना है द फिलैन्डरर । यह सामयिक कामदी  थी जिसमें न्यू वोमैन की भूमिका थी। बाद में उसे श्री ग्रुन्डी ने खोज निकाला । मेरी तीसरी रचना मिसेज वैरेंस प्रोफेशन है। यह उद्देश्यपूर्ण नाटक है, जिसका उद्देश्य राज्य के विवाद परपॉल मॉल गजट में छपे बहुचर्चित पत्र के उद्देश्य का स्पष्टीकरण करना है। मेरी चौथी रचना हैआर्म्स ऐण्ड द मैन । इसे इतना अधिक गलत समझा गया कि न्यूयार्क में इसने चारों ओर मेरी ख्याति बढ़ा दी ।इन्डिपेन्डेट थियेटर ने अपने अगले सत्र के लिएमिसेज वैरेंस प्रोफेशन की है। मौलिक रूप सेद फिलैन्डरर की रचना उसी समाज के लिये हुई थी, लेकिन पूरा होने पर इसे मैंने अलग कर दिया और उस समाज के उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए दूसरा उपयुक्त नाटक लिखा-मिसेज़ वैरेंस प्रोफेशनआर्म्स ऐम्ड द मैन देखने के बाद वाइण्ढम ने मुझसे उसके लिए कुछ करने को कहा। मैंने उनसे द फिलैन्डरर के अभिनय के लिए आग्रह किया, लेकिन जब योजना पर विचार ही किया जा रहा था तभी वाइण्ढम को रिबेलियन सूसन की भूमिका निभाने में बड़ी सफलता मिली। परिमाम यह हुआ कि मेरे निराधार खड़े नाटक की भूमिका निभाने की अपेक्षा उन्होंने हेनरी आर्थर जोन्स द्वारा शुरू की गयी कामदी  की धारा में बहने का निश्चय कर लिया । लेकिन इसमें इतनी देर हो गयी कि मैंने नाटक को ही  वापस ले लिया । तब से मैं उस व्यक्ति को ढूँढ़ रहा हूँ जो वाइन्ढम की तरहद फिलैन्डरर की भूमिका को भली-भाँति निभा सके। मैं फिर आपसे कही हुई बात को दुहरा रहा हूँ कि चालीस वर्ष की अवस्था होने के पहले यदि मैं छह नाटक नहीं लिख सका तो मैं लिखना ही छोड़ दूँगा। हाथ में आये हुए सभी कामों को 26 जुलाई1896 तक मुझे पूरा कर लेना चाहिए। लेकिन, मैं इससे भी ज्यादा करने की आशा करता हूँ । अभी  ‘स्कूल बोर्ड  और वेस्ट्री के चुनाव में भाग लेने के क्रम में मैंने फेबियन सोसायटी में काम किया । लन्दन और दूसरे राज्यों में करीब दो दर्जन भाषण दिये और विभिन्न लेखों के साथ मैंने समीक्षाएँ भी लिखीं। यह सब करते हुए भी इस नाटक को मैंने तीन महीने में पूरा कर लिया। बात यह है कि मैंने शरद की छुट्टी जर्मनी, इटली और सरे में बितायी । इसमें अविराम गति से खर्च करने के लिए मैंने साधन जमा कर लिया था। ठीक समय पर अब क्रिसमस की छुट्टियाँ आने ही वाली है। तभी मैं राहत पा सकूँगा।

 

याद रखें, दुनिया वर्नार्ड शॉ को बहुत बर्दाश्त नहीं करती । स्तम्भ-लेखन के लिए ये सारी बातें आपको यदि उपयोगी लगें तो आपका स्वागत है। आप इसे अपने तरीके से इस्तेमाल कर लें। बस सिर्फ इतना ही उद्वरण न दें कि आपको ये सारी बातें मैंने कहीं हैं। सफलता के लिए यह आसान है, लेकिन मैं इस पर प्रतिबन्ध लगाता हूँ।

 

मुझे लगता है कि मैंने आपको बड़ी लम्बी चिट्ठी लिख दी है। आज की संध्या को मैं प्लेटफॉर्म पर भाषणकक्ष से हुँकारता रहा हूँ और अब इस मशीन पर खट-खुट करने की अपेक्षा मुझे सो जाना चाहिए।

 

अद्धनिद्रा की स्थिति में आपका,

जी. वर्नार्ड शॉ

सेवा में,

श्री आर. गोल्डिंग ब्राइट

प्लेगोअर्स क्लब

 

 (शेष अगले अंकों में....)

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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