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प्रौढ़ वैचारिक अभिव्यक्ति श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी
श्रीमश्रीमती विद्यागुप्ता का काव्य-संग्रह ‘पारदर्शी होते हुए’ कविता ही प्रारंभ होता है। कविता के बारे में विश्व के कवियों ने बहुत कुछ कहा है और मोटे-मोटे ग्रंथ लिखे हैं। हिन्दी में यह प्रकृत्ति मुख्य रूप से छायावाद कालीन कवियों की देन है। पर कविता के बारे में विद्याजी का दृष्टिकोण एकदम नया और युगीन परिस्थियों की उपज है। वे कविता में हर ऐरे-गेरे शब्द (प्रतीकतः व्यक्ति) का प्रवेश निषिद्ध मानती हैं और अनावश्यक शब्दों पर रोक लगा देना चाहती हैं। संस्कारित एवं जीवंत शब्दों को ही वे कविता की पंक्ति में खड़ा किए जाने की पक्षधर हैं, केवल उन शब्दों को जो ठहरें हैं कुछ पल वेदना के पास, केवल उन शब्दों को जो पाठक को उष्मा दे सकें कम्बल की तरह, जो प्यासों की अँजुरी भर सकें, साँसों की वसीयत कर सकें - उन्हें समृद्ध बना सकें। (अकिंचन वसीयत करेगा भी तो किसकी !) |
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ऐसे शब्दों से कविता ही दानवीर कर्ण की भाँति सबकी झोली भर सकती है, सभी को एकल मनोरम कर सकती है। दोगली बेशर्मी और जुगाली की मजबूरी से मुक्त कविता ही कह सकती है हारे हुए आदमी की बात जो उसका प्रमुख उद्देश्य और कर्तव्य होना चाहिए।
विद्या जी की कविता में सामान्य प्रकृति को भी विज्ञान के दिव्य चक्षुओं से देखती हैं-हरे पत्ते में बहती हरहराती हुई नदी (जीवन-रस से परिपूर्ण), चमकता आयुष्मान (बाल) सूर्य, धरती की हरे रहने की दीर्घ-जीवी-इच्छा, उसके विराट में समा रहे धरती और आकाश ने इस हरीतिमा को अभयदान देना चाहती हैं ताकि समुद्र की प्रार्थना व्यर्थ न जाए, प्रलय की गर्जना और विद्रोही दावानल मनुष्य को विवेकशील बना सकें। उन्हें ऐसी कोई निराशा नहीं है कि पुस्तकें कोई पढ़ेगा ही नहीं तो कविता लिखने से क्या लाभ । उन्हें पूरा विश्वास है कि ‘किसी दिन थककर / अवश्य लौटेगी पीढ़ी / फिर किताबों की ओर, मृग-मरीचिका की माँस की दुर्गंध से ऊबकर / सोंधी मिट्टी की ओर समाज को लौटना ही पड़ेगा / किताबें बताएगी आदमी की आदतों के बारे में / सोंपेगी उन्हें / आदमी होने का प्रमाण।’ भले ही अनेक संवत्सर लग जायें पर मनुष्य को मनुष्य बनाने का काम किताबें ही करेंगी, मशीन नहीं।
कृति का शीर्षक बनने वाली कविता ‘पारदर्शी होते हुए’ स्वाभिमान के साथ समस्याओं को झेलने की आग्रही है। ( नीची न हों प्रत्युत्तर की आँखें ) यथार्थ के रेतीले विस्तार में आदर्श की हरी पगडंडी रहनी ही चाहिए ताकि थम सकें ‘पाँव सब कुछ यहीं पाते हुए।’ बहुपाठी विदुषी की कवितायें थोड़े मे बहुत कुछ कह जाने की बैचारिक उपलब्धि कही जा सकती है। जरा-सी आहट को भी वे पूरे ध्यान से सुनती हैं और पूरे मन से अभिव्यक्ति देती हैं। अन्तर अरण्य में बैठी शबरी की चिंता आज के हतप्रभ हो रहे विश्वास की चिंता है। इसीलिए कवयत्री बचपन के पथ को लीक के अँधेरे से बचाए रखना चाहती है। उम्र के उत्तर-पथ को निरर्थक न मानते हुए वह ठहाका लगाकर अंतर के कुंठित एकांत को तोड़ देने की पुरजोर अपील करती है-आज के बोझिल हो रहे पारिवारिक माहौल में यह एक नई उद्भावना है।
ये कविताऐं जीवन के विराट फलक की कवितायें हैं - बचपन से लेकर अशक्त वृद्धावस्था तक विस्तृत, हर पल पर गहरी दृष्टि रखती हुई, टहनी के फूल से लेकर जड़ों तक फिर पहुँचती हुई बरगद की जटाओं, आम्रमंजरियों और उन पर कूक रही कोयल तक । नारी के बड़े मोहक चित्र हैं – उदास लड़की, गुलकंद बना रही लड़की, स्वप्न-याचिका लड़की, ईमानदारी का पहाड़ ढ़ो रही रधिया की माँ, दादी माँ। उनकी विराट दृष्टि में शांति की नन्हीं गिलहरी, सुख की गौरैया, सुकून का नन्हा खरगोश, जल, मेघ रेत, आदि भी सुरक्षित हैं। बिना किसी नारेबीजी के वे मनुष्य को सावधान करती हैं कि योनिजा के बिना ‘होगी छिन्द तार मनुवंश की वंशावली ।’ उन्हें जीवन और परिवेश से कितना प्रेम है यह उनकी प्रेम पर ही लिखी चार कवितायें स्पष्ट करती हैं । तीसरी जाति का दर्द व्यक्त करने वाली वे संभवतः पहली कवयत्री हैं।
ताश के तिरपनवें पत्तों एवं तथाकथित महानों के बौने संघर्षों की आदमवाद छायाओं के विमोचन पर वे मुसकुराती हैं और पूरे हक के साथ प्रश्न करने और जवाब माँगने का दायित्व जताती हैं। धुआँ या अंकुरण के बीच भटक रहे ठूँठ को देखकर वे किश्तों मे कट रही लम्बी ज़िंदगी को ढोते थक रही ठुँठियाती हुई देह से अनुरोध करती हैं कि वह ‘इतनी मिट्टी ज़रूर दे’ कि उससे एक दीप बन सकें। निर्थकता को भी सार्थक बनाने की उनकी यह अभिलाषा कितनी शलाघ्य है।
दीपान्तर,ला.ब. शास्त्री मार्ग, फतेहपुर (उ.प्र.) -212601 ◙◙◙
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