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कृति हिंदी के साहित्य नक्षत्र
लेखक डॉ. रावलमल जैन ‘मणि’
प्रकाशक लब्धसुरि फाउंडेशन, दुर्ग, छत्तीसगढ़
मूल्य 300/-
पृष्ठ 200 |
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सच कहें तो वर्तमान में रचा जा रहा लगभग साहित्य आत्मकेंद्रित है । आत्मकथात्मक है । वहाँ अपने अलावा औरों के लिए कोई स्पेस नहीं दिखता । अपनी रचनाओं (?) के साथ वहाँ साहित्यकार पाखंड और मुगालतों के साथ अकेला खड़ा है । न जड़ के क़रीब और न ही आकाश के समीप । जैसे वह सबकुछ बिसारना चाहता हो । जैसे इस बिसारने में ही वह आधुनिक, विकसित और मौलिक साहित्य रच सकता है । स्मृतिविहीनता या स्मृतियों से मुक्त होने का ऐसा कठिन दौर शायद ही कभी भारतीय साहित्य में आया हो । तब बारीक नज़र से देखें तो क्या भ्रम नहीं होता है - जैसे साहित्य आत्मकथा मात्र हो, वर्तमान का यथार्थ और उसका अनुभव ही सब कुछ हो, वहाँ स्मरण या विरासत की प्रतिस्मृति की साफ-साफ मनाही हो ।
यदि आप भी मेरी तरह ऐसे भ्रमों के धुंध में व्याकुल हैं तो निश्चय ही – ‘हिंदी साहित्य के नक्षत्र’ जैसे संस्मरणात्मक और आलोचनात्मक निबंधों की किताब आपको क्षण भर के लिए इस कोहरे को चीरने में सूरज की तरह लग सकती है । तपते रेगिस्तान में एक शांत, स्निग्ध सरोवर की तरह लग सकती है । भीषण अकाल के बाद एकाएक घिर आये काले मेघों की मानिंद लग सकती है । वह इसलिए कि इस किताब में संस्मरण या व्यक्तित्वों के मूल्याँकन के बहाने ख़ुद को विशिष्ट साबित करने का कहीं कोई लेखकीय आग्रह या चेष्टा नहीं है । लेखक अपनी विवेक-दृष्टि, और अनुभव से ऐसे रचनाकारों की याद पाठकों को कराता है जो अपने समय के नक्षत्र रहे हैं, जिन्हें बिलग कर देने से हिंदी का अतीत लगभग शुष्क और उदास प्रतीत हो सकता है ।
किसी भी प्रतिष्ठित लेखक की पहचान होती है कि वह अपने समय को कितने गंभीर और सूक्ष्म दृष्टि से देखता रहा है । सिर्फ इतना ही नहीं वह समकालीनों में से कितनों और पूर्वपीढ़ी में से कितनों को स्मृति में निरंतर बनाये रखना चाहता है । उनसे कुछ लेता है, और इसी बहाने भावी संसार को कितना कुछ नया देता है । ऐसा वही कर सकता है जिसमें मूल्याँकन और चीज़ों को अपने ढ़ंग से देखने-परखने की मौलिक दृष्टि हो। रावल मल जैन ‘मणि’ की 38वीं किताब से गुज़रते वक्त मुझे लगता रहा है कि लेखक पठन-पाठन में बहुलता और विविधता का आग्रही है । शायद यही कारण है कि वह हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ रचनाकारों के विषय में लिखते समय विधा विशिष्ट की परिधि में नहीं बँधता। कह सकते हैं कि यह किताब कभी निबंध संग्रह की तरह प्रतीत होती है, कहीं संस्मरण की तरह, और कहीं आलोचना या समीक्षा की तरह। इन विशिष्टताओं के साथ इस किताब को पढ़ें तो हम ‘सरलता’ से हिंदी के समृद्ध अतीत उसके प्रमुख रचनाकारों को परख सकते हैं । साहित्य की प्रमुख विधाओं को उनके निजी चरित्रों के साथ आत्मसात करने का लाभ बोनस में ।
‘सरलता’ शब्द यहाँ अनायास नहीं, सायास है । वह इसलिए कि संपूर्ण कृति में पाठनीयता के लिए भाषा अत्यंत सरल, सुबोध एवं सादगीपूर्ण है । किताब में लेखक कहीं भी इस तरह नज़र नहीं आता है कि जैसे वह अत्याधुनिक शिल्प में गढ़कर चकाचौंध पैदा करना चाहता हो । वह महत्वपूर्ण रचनाकारों के जीवन के अनछुए पहलुओं में पाठकीय चौंध की संभावना को भी ऐसी तटस्थ दृष्टि और शिल्प के साथ प्रस्तुत करता है जैसे वह यह नहीं कहना चाहता कि हाँ उसने यहाँ कोई तीर मारा है । लेखन और खासकर भाषा में ऐसी विनम्रता इधर कम ही देखने को मिलती है । यहाँ हर समीक्षा या निबंध लगभग निरहंकारी निबंध है । इन निबंधों में लेखक ने अपने विचारों और टिप्पणियों को भी ऐसे पिरोया है जैसे पानी में ऑक्सीजन की तरह हो । वहाँ ऑक्सीजन का पृथकत्व देख पाना कठिन है । यह लेखक की सहकारिता है - पाठकों के साथ । यही सहकारी भाव साहित्य की भी विशिष्टता है जिसे समकालीन लेखन खासकर आत्मकथा और आलोचनाओं में एक सिरे से भूलाया जा रहा है । और ऐसे विचारों के झाड-झंखड और पथरीले रास्तों से दूर एक निर्द्वंद्व, आत्मीय रस के साथ पुराने लोगों के बारे में जानना इस किताब को पढ़ने का खास आस्वाद जगाता है ।
हिंदी में समीक्षा लेखन या आलोचना की सबसे बड़ी कमी रही है कि लगभग समीक्षकों ने अपने आप को निराला, पंत, महादेवी, नागार्जुन, अज्ञेय और मुक्तिबोध, प्रेमचंद आदि दो चार की रचनात्मकता पर ही केंद्रित किया है । जैसे इनके अलावा हिंदी में और कोई ऐसा हुआ ही न हो और जिसे पढ़ा जा सके, या जिसने नयी पथ की ओर इशारा किया हो । हिंदी का अकादमिक रवैया भी कमोवेश यही रहा है । कामचोरी के कारण वहाँ कई महत्वपूर्ण लेखकों पर वांछित शोध अब तक नहीं हो सका है । गंभीर पाठक के साथ-साथ अक्सर एक सामान्य पाठक हिंदी साहित्य के आकाश के नक्षत्रों-श्रृंखलाओं के बारे में नहीं जान पाता । रावल मल जैन मणि भी कुछ हद तक इन्हीं के इर्द-गिर्द भ्रमण करते हैं, पर वे इस कृति के माध्यम से ऐसी समीक्षायन को लांघते भी हैं – शिवपूजन सहाय पर लिखकर, नाटककार उदयशंकर भट्ट पर लिखकर, और तो और गुमनाम किंतु यशस्वी कवि मुंशी अजमेरी प्रेम पर भी लिखकर । लक्ष्मीनारायण मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी और धीरेंद्र वर्मा जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्याँकन उनके इस निद्वंद्व प्रयास का ही प्रतिफल है । मणि जैसे यहाँ कहना चाहते हों कि सितारे तो बहुत हैं भाई, ज़रा अपनी आँखें तो खोलो और देखो गौर से – कैसे दिपदिपा रहे हैं वे ?
ऐसे दौर में जब स्वयं हिंदी के साहित्यकार दो-तीन रचनाकारों के अलावा किसी अन्य पर नहीं बोल पाते, साहित्येतर विद्यार्थी मंचीय भाटों के अलावा किसी कवि का नाम तक नहीं जानते, और आम पाठक तुलसी, कबीर, रहीम के अलावा किसी को कवि के रूप में अपनी आत्मीय स्वीकृति नहीं देते, अपने समय में अपनी रचनात्मक क्रांति को सिद्ध करने वाले मनीषियों पर लिखना कम चुनौती भरा नहीं । पर इस चुनौती में रावल मल जैन जी की वह लेखकीय प्रतिबद्धता भी झलकती है जिसके आलोक में उन्हें अब एक कवि, संपादक, निबंधकार के साथ-साथ एक आलोचक भी कहा जा सकता है ।
यह अलग बात है कि जिन स्थापित साहित्यकारों पर शताधिक आलोचनात्मक कृतियाँ पूर्व से नयी दृष्टियों और चकाचौंध के साथ हों वहाँ उन पर ही लिखना ज़रा चैलेंजिग काम है । चैलेंजिग इस नाते कि नवोन्मेष, नयी स्थापना के बगैर आलोचक को किस रूप में साहित्यिक पाठक याद करें ? पर जब हम अपनी प्रखर चेतना के साथ यहाँ रामधारी सिंह दिनकर को पढ़ते हैं तो रावल मल जैन इस चैंलेंज को लाँघने की चेष्टा में दिखते हैं । उनका मानना है कि दिनकर के काव्य में जो आध्यात्मिक चेतना है उसके मूल में आचार्य श्री लब्धसुरि देव का व्यक्तित्व भी रहा है । इसी तरह रामेश्वर शुक्ल अंचल की रचनाओं में ऐंदिकता और रोमांस की प्रबलता के बरक्स वहाँ कृष्णायी प्रेम और अध्यात्म की सिद्धि मणि की भी आलोचकीय सिद्धि है ।
शब्द शिल्पी रामवृक्ष बेनीपुरी की सृजनात्मकता का बाँचते समय मणि के लिए मन में दो तरह का नेह उमड़ता है – पहला यह कि वे बिलकुल खरा कहने के हिमायती हैं और दूसरा यह कि वे खरी-खरी बात को भी खुरदुरे तौर पर नहीं लेते । वहाँ भी वह लेखन में लालित्यपूर्णता के वृत के बाहर नहीं जाते । मानो भाषायी रम्यता को वे अपने लेखन में सान लेते हैं । वे उस हद तक ही प्रगतिशील हैं जिस हद तक सांस्कारिता को कोई आघात नहीं पहुँचे । प्रगतिशीलता मूल चेतना का विरोधी न बन जाये, इस बात का वे सदैव ख़याल रखते हैं । यही भारतीय लेखन की शर्त है । देखिए ज़रा वे रामवृक्ष बेनीपुरी के बिषय में कहते क्या हैं –
“पाठ्यपुस्तकों में जगह पाने की महत्वाकांक्षा उनमें भी रही । लेकिन यह इसलिए कि केवल लेखनी से जीविका चलाने वाले के लिए यह ज़रूरी था । साहित्य से धनार्जन इसी रास्ते हो सकता है, या फिर फ़िल्मों आदि के लिए लिखने से हो सकता है । .. जीविका के लिए ये सब धंधे करते हुए भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया ।” (शब्द शिल्पी रामवृक्ष बेनीपुरी पृष्ठ 183-184)
जैसा कि मैं कह ही चुका हूँ कि रावल मल जैन की यह किताब विभिन्न विधाओं का कोलाज जैसा भी है । सो इस किताब में विविधवर्णी विधाओं के जुगनू से जगमगाता आकाश का विस्तार है । रामवृक्ष बेनीपुरी नामक निबंध में लगता है कि हम ‘मणि’ के रूप में एक ललित आग्रही लेखक को भी पढ़ रहे हैं । कदाचित् रामवृक्ष बेनी का ललित निबंधकार होना भी यहाँ केंद्रीय प्रभाव में रहा हो । कदाचित् स्वयं लेखक का भी यही मानना रहा हो कि किसी विधा विशेष के लेखक के व्यक्तित्व तक उसी की शैली में कहीं अधिक सघन कोणों के साथ देखा जा सकता है ।
इस किताब का स्वागत भले ही अडियल स्वभाव वाले तथाकथित आलोचक और साहित्यकार भी न करें, पर यदि हिंदी साहित्य का रसिक पाठक उन्हीं के नक्शे क़दम पर चलेगा तो उसे अनेक रचनाकारों के जीवन के महत्वपूर्ण और प्रसंगों से भी वंचित होना पड़ेगा । क्योंकि किताब के अधिकांश लेखकों के साथ स्वंय लेखक इस तरह जुड़ा रहा है जैसे वह उनका परिजन ही हो । यह इस किताब की विश्वसनीयता भी मानी जा सकती है । मुंशी अजमेरी प्रेम जैसे गुमनाम कवि की जीवनी तो निश्चय ही संग्रहणीय है ।
अंत में बस इतना ही कि एक गंभीर लेखक को बाजार के प्रभाव से खुद को बचाना चाहिए और ऐसी अच्छी पठनीय कृतियों में विज्ञापन जैसी प्रतीत होने वाली सूचना नहीं देना चाहिए । भले ही वे एक दो ही क्यों न हों । अब तक रावल मल जैन मणि को एक कवि, एक निबंधकार के रूप में तो पढ़ा ही जाता रहा है। आने वाले दिनों में अब उन्हें एक जीवनी, संस्मरण लेखक तथा एक आलोचक के रूप में पढ़ा जा सकता है।
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