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छत्तीसगढ़ की नाट्य परंपरा प्रो.अश्विनी केशरवानी
तद्ध्यात्माभिसंभूतं छन्द: शब्द समन्वितम्। लोकसिध्दं भवेत्सिध्दं नाटयं लोकात्मकंत्विदम्।।
छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य की प्राचीन परंपरा सरगुजा के रामगिरि और सीता बोंगरा गुफा में स्थित नाटयशाला से सिद्ध होती है। यहाँ के शिलालेख में भी इसका उल्लेख है :-
आदि पयंति हृदयां सभावगरूकवयों यं रातयंदुले। अवसंतिया हांसानुभूते कुदस्पीसं एवं अलंगेति।।
इन गुफाओं में स्थित नाट्यशालाओं की तुलना प्राचीन ग्रीक थियेटर से की जाती है। रंगशाला यानी थियेटर और लोकनाट्य के बारे में लोगों में अनावश्यक भ्रम होता है। थियेटर अपेक्षाकृत व्यापक शब्द है और यूनानी शब्द 'थिया' से लिया गया है। इसका अर्थ है 'दृश्य' और विषेशकर 'देखने' के अर्थ में यूनानी भाषा के 'थडमा' से साम्य रखता है। इसका अर्थ है- 'ऐसी वस्तु जो घूर घूरकर देखने को बाध्य करे' दूसरी ओर 'ड्रामा' शब्द भी यूनानी शब्द 'ड्रान' से लिया गया है जिसका अर्थ है- 'अभिनय करना।' भारतीय परिवेश में 'थियेटर' शब्द को 'रंगभूमि' का और ड्रामा को नाटय के नज़दीक माना गया है।
अविक्य कियोपतेम तिसत्वातिभाशितम्। लोलांगहारभियं नाटय लक्ष्मण लक्षितम्॥ स्वरालंकार संयुक्तमस्वर्भूरूशाश्रयम्। यदोधषं भवेन्नाटयं नाटयधर्मोतुसास्मृता॥
अर्थात् नाटय प्रकृत स्थिति भिन्न कलात्मक और विशिष्ट उद्देष्य का अग्रणी होता है, जबकि लोकनाट्य प्राकृतजन की अभिव्यक्ति को लोक रंजन के लिए कृत्रिम रूप से प्रस्तुत करता है। कालिदास ने 'नाटयं भिन्न स्वेजनिस्य बहुधात्येक समाराधनम्' कहकर नाटक को सभी के लिए ग्राह्य बताया है। इसी प्रकार सुप्रसिध्द संस्कृत कवि और 'उत्तार राम चरित्र' के रचयिता भवभूति कहते हैं-' कालोह्यं निरवधि विपुला च पृथ्वी:।'
लोकनाट्य के तीन प्रमुख अंग होते हैं- 1. बहिरंग। इसके अंतर्गत कथा का उद्याम आवेग, आंचलिक बोली, आंचलिक प्रातीकात्मक पात्र, आडम्बरहीन रंगमंच और सहज श्रृंगार प्रमुख होते हैं। 2. अंतरंग। इसमें गीत और नृत्य प्रमुख होते हैं। 3. अभिनय। इन तीनों अंगों की समवेत प्रस्तुति ही मूलत: लोकनाट्य है। गीत इसके प्राण हैं और अभिनय से यह सजीव हो उठता है।
श्री गोपाल शर्मा अपने लेख- 'मध्यप्रदेश का हिन्दी नाटय साहित्य' में लिखते हैं- 'जिस समाज में रंगमंच का अभाव हो, वहाँ नाटय साहित्य का उचित विकास नहीं हो पाता। रंगमंच से केवल एक पर्दे से सजे हुए मंच का बोध नहीं होता। इसके अंतर्गत कई बातें आती हैं। जिस समाज की अभिनय की ओर रूचि न हो, अभिनय कला को संगीत और चित्रकला के समान सम्मान और श्रध्दा की भावना से न देखा जाता हो, नाटक के प्रति आकर्षण के साथ साथ उसके तंत्र और साहित्य संबंधी बारीकियों का अर्थ समझकर आनंद लेने की वृत्ति न उत्पन हुई हो उस समाज में रंगमंच का अभाव है, ऐसा समझना चाहिए।'
एक समय था जब नाट्य साहित्य मुख्यत: अभिनय के लिए लिखा जाता था। कालिदास, भवभूति और शुद्रक आदि अनेक नाटककारों की सारी रचनाएँ अभिनय सुलभ है। नाटक की सार्थकता उसकी अभिनेयता में है अन्यथा वह साहित्य की एक विशिष्ट लेखन षैली बनकर रह जाती। नाटक वास्तव में लेखक, अभिनेता और दर्शकों की सम्मिलित सृष्टि है। यही कारण है कि नाटक लेखकों के कंधों पर विशेष उत्तरदायित्व होता है। रंगमंच के तंत्र का ज्ञान पात्रों की सजीवता, घटनाओं का औत्सुक्य और आकर्षण तथा स्वाभाविक कथोपकथन नाटक के प्राण हैं। इन सबको ध्यान में रखकर नाटक यदि नहीं लिखा गया है तो वह केवल साहित्यक पाठय सामग्री रह जाती है। भारतीय हिन्दी भाषी समाज में रामलीला और नौटंकी का प्रसार था। कभी-कभी रास मंडली भी आया करती थी जो अष्टछाप के काव्य साहित्य के आधार पर राधा कृष्ण के नृत्यों से परिपूर्ण संगीत प्रधान कथानक प्रस्तुत करती थी। रामलीला और रासलीला को लोग धार्मिक भावनाओं से देखते थे। गाँवों में जो नौटंकी हुआ करती थी उसका प्रधान विषय वीरगाथा अथवा उस प्रादेशिक भाग में प्रचलित कोई प्रेम गाथा हुआ करती थी। ग्रामीणजन का मनोरंजन करने में इनका बहुत बड़ा हाथ होता था।
मुगलों के आक्रमण के पूर्व भारत के सभी भागों में खासकर राज प्रसादों और मंदिरों में संस्कृत और पाली प्राकृत नाटकों के लेखन और मंथन की परंपरा रही है लेकिन उनका संबंध अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था। ग्रामीणजन के बीच परंपरागत लोकनाट्य ही प्रचलित थे। मुगलों के आक्रमण से भारतीय परंपराएँ छिन्न भिन्न हो गयी और यहाँ के प्रेक्षागृह भग्न हो गये। तब नाटकों ने दरबारों में भाण और प्रहसन का रूप ले लिया। लेकिन लोकनाट्य की परंपरा आज भी जीवित है...चाहे ढोलामारू, चंदापन या लोरिकियन रूप में हो, आज भी प्रचलित है। आज हमारे बीच जो लोकनाट्य प्रचलित है उसका समुचित विकास मध्य युग के धार्मिक आंदोलन की छत्र-छाया में हुआ। यही युग की सांस्कृतिक चेतना का वाहक बना। आचार्य रामचंद्र ने राम कथा को और आचार्य बल्लभाचार्य ने कृष्ण लीला को प्रोत्साहित किया। इनके षिश्यों में सूर और तुलसी ने क्रमश: रासलीला और रामलीला को विकसित किया। इसी समय बंगाल में महाप्रभु चैतन्य ने जात्रा के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया।
छत्तीसगढ़ में लोकनाट्य दो रूपों में विकसित हुआ। एक तो निम्न वर्ग के देवार, नट, भट आदि लोगों में आल्हा उदल, ढोला मारू जैसी परंपरा को तथा पंडु, कंवर और संवरा जाति में पंडवानी और पंथी को विकसित किया। छत्तीसगढ़ में इसका प्रचार प्रसार लगभग 16 वीं और 17 वीं शताब्दी के मध्य हुआ। उत्तार भारत के रासलीला और रामलीला मथुरा, वृंदावन, काशी और इलाहाबाद से सतना, रीवा, अमरकंटक होते हुए पेंड्रा, रतनपुर, शिवरीनारायण, अकलतरा, सारंगढ़, किकिरदा, मल्दा, नरियरा, बलौदा, कवर्धा, कोसा और राजिम आदि में फैल गया। इसलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में ब्रज और अवधी का पुट मिलता है। दूसरी ओर बंगाल की जात्रा, उड़ीसा की पाल्हा, जगन्नाथपुरी से सुंदरगढ़, संबलपुर, सारंगढ़, चंद्रपुर, पुसौर, रायगढ़, घरघोड़ा और तमनार आदि जगहों में फैल गया। यहाँ की नाट्य परंपराओं में इसका स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।
डॉ. बल्देव के अनुसार रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के शासनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निष्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिध्द थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिध्दि मिली कि उसे 'छत्तीसगढ़ का वृंदावन' कहा जाने लगा। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, उनके बहनोई कोसिरसिंह और भांजा विश्वेश्वर सिंह ने नरियरा और अकलतरा के रासलीला और रामलीला के लिए अथक प्रयास किया। उस काल में जांजगीर क्षेत्रान्तर्गत अनेक गम्मतहार सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मणदास चिकरहा को नाचा पार्टी में रास का यथेष्ट प्रभाव देखने को मिलता था। उस समय दादूसिंह गौद और ननका रहस मंडली, रानीगाँव रासलीला के लिए प्रसिध्द था। पंडित शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ गौरव में लिखा है :-
ब्रज की सी यदि रास देखना हो तो प्यारों ले नरियर नरियरा ग्राम को षीघ्र सिधारों यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघवलीला अकलतरा तो चलो करो मत मन को ढीला शिवरीनारायण जाइये लखना हो नाटक सुघ्घर बस वही कहीं मिल जायेंगे जग नाटक के सूत्रधार।
इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में नाटय लेखन की परंपरा समृध्द रही है। भारतेन्दु युग में हिन्दी रंगमंच का निर्माण हुआ और अधिक से अधिक अभिनय, नाटक और प्रहसन आदि लिखे और प्रस्तुत किये गये। हालांकि यह रंगमंच सामाजिक परिस्थितियों के कारण चिरस्थायी न रह सका और उसका स्थान पारसी थियेटिकल कम्पनियों ने ले लिया। इसके अवसान काल में सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ। इसके बावजूद लोग सजीव व्यक्ति को अपने सम्मुख उनके और उनकी समस्याओं का अभिनय करते देखना चाहते थे। इस युग में अँग्रेज़ी और संस्कृत नाटकों के अनुवाद का प्रचलन था।
सुप्रसिध्द साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के बाल सखा, कवि और सुप्रसिध्द आलोचक ठाकुर जगमोहन सिंह के प्रिय षिषय और शिवरीनारायण के मालगुजार पंडित यदुनाथ भोगहा के सुपुत्र पं. मालिकराम भोगहा ने रामराज्यवियोग, प्रबोध चंद्रोदय, और सती सुलोचना नाटक लिखा। इन नाटकों का शिवरीनारायण के अलावा कई स्थानों में सफलता पूर्वक मंचन किया गया। भोगहा जी ने शिवरीनारायण में एक नाटक मंडली बनायी थी। छत्तीसगढ़ के अनेक साहित्यकारों ने नाटक लिखा है। इनमें साहित्य वाचस्पति जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के पिता श्री बक्षीराम ने 'हनुमान' नाटक लिखा था। रायगढ़ के पं. अनंतराम पांडेय ने सन 1903 में 'कपटि मुनि' नाटक लिखा था जिसे मंचित भी किया गया। द्विवेदी युगीन साहित्यकार पंडित शुकलाल पांडेय ने सन 1930 में मातृमिलन नाटक लिखा था। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय ने सन 1914 में 'साहित्य सेवा' प्रहसन लिखा था। डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र ने शंकर दिग्विजय, वासना वैभव, समाज सेवक, दानी सेठ, असत्य संकल्प और क्रांति आदि नाटक लिखा है। उनके नाटकों के कथोपकथन काव्यमय और चमत्कारपूर्ण हैं। उनके कुछ नाटकों की शैली पारसी नाटय परंपरा पर आधारित है।
छत्तीसगढ़ी में व्यवस्थित नाटय लेखन की शुरूवात डॉ. खूबचंद बघेल से होती है। उन्होंने सन 1930 से 1950 के बीच अनेक नाटक लिखा जिसमें ऊंच-नीच, करम छटहा, जनरैल सिंह, बेटवा बिहाव, किसान के करलई और काली भाटो आदि प्रमुख है। वे अपने इन नाटकों का उपयोग छत्तीसगढ़ में जनजागरण के लिए करते थे। पंडित शुकलाल पांडेय ने छत्तीसगढ़ी में भूल भुलईया, गींया, छत्तीसगढ़ी ग्राम गीत, कलिकाल, उपसहा दामाद, सीख देवैया, केकरा धरैया आदि लिखा है। डॉ. प्यारेलाल गुप्त ने छत्तीसगढ़ी नाटक 'दू सौत' लिखा है। इसी प्रकार श्रीरामगोपाल कश्यप ने 'माटी के मोल', डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा ने सोनहा बिहान, गुरू चेला, भोला बनाइले, महेत्तार साहू ने 'राजा बेटा', श्री नारायणलाल परमार ने 'भुल सुधार' और भुवनलाल मिश्र ने 'रतिहा मदरसा' नामक छत्तीसगढ़ी नाटक लिखकर नाटय परंपरा को पुष्ट किया है।
छत्तीसगढ़ी नाटकों को लोकनाट्य के बजाय हिन्दी और एकांकी से प्रभावित समस्या मूलक नाटक कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा। क्योंकि इनमें सम सामयिक चेतना तो है लेकिन गाँव की अल्हड़ता नहीं है। इनमें सम सामयिक लोक भाषा ओं का उद्दाम आवेग, लोकधर्मी प्रस्तुतियाँ नहीं होती और न ही इन्हें खुले मंच पर खेला जा सकता है। रंगकर्मी चाहे तो इन्हें आधार बनाकर लोकनाट्य के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। जैसे डॉ. खूबचंद बघेल ने काली माटी, श्रीरामचंद्र देशमुख ने सरग अऊ नरक, जनम अऊ मरन, श्री हबीब तनवीर ने चरनदास चोर, मोर गाँव के नाम ससुराल मोर नाम दामद और महासिंह चंद्राकर ने सोनहा बिहान को सफलता पूर्वक प्रस्तुत किया है।
लोकनाट्य की स्वाभाविक भावधारा को श्री रामचंद्र देशमुख द्वारा निर्देशित ''चंदैनी गोंदा'' ने आज के सिनेमाई युग में संबल प्रदान किया है। इनसे प्रभावित होकर अनेक कला मंडलियों, नाटय संस्थाओं और कला पथकों का निर्माण हुआ मगर सिनेमाई युग की मार, उसमें प्रदर्शित पश्चिमी अंग प्रदर्शन के दृश्य ने कुछ ही समयों में उसे धराशायी कर दिया। यह अत्यंत चिंता का विशय है कि हमारी सांस्कृतिक परंपराएँ धीरे धीरे लुप्त होने लगी है। इसके संरक्षण की दिशा में प्रयास किया जाना उचित होगा।
'राघव' डागा कालोनी, चांपा-495671 (छत्तीसगढ़) ◙◙◙
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