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असमंजस
एक खूबसूरत प्रेमी प्रेमिका, चाँदनी रात में, यमुना नदी के किनारे बैठे, यमुना के जन में पड़ रही ताजमहल की परछाई को मुग्ध होकर देख रहे थे।
उस परछाई को देखकर प्रेमी के मन में शायर की यह आ गई। फिर वह सोचने लगा कि, “एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल सारी दुनियां को मोहब्बत की निशानी दी है।” या “एक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताजमहल हम गरीबों के मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।”
देखने के क्रम में सोचने का क्रम भी अचानक जुड़ गया, सोचते-सोचते वह असमंजस में पड़ने लगा और विचारों के द्वंद में घिरने लगा। जब कोई हल निकल नहीं पाया, तो उसनें एक कंकड़ उठाकर शांत यमुना में फेंक दिया, नहीं में तरंगों की हचलच बिखर गई, उस हलचल को देखकर वह नाच-नाचकर, गाने लगा कि - “मैने ताजमहल को हिला दिया, जमुना के जल में एक कंकड़ फेंककर”।
एन-3 ‘साकेत’ बसंत पार्क कॉलोनी, महावीर नगर, न्यू पुरैना, रायपुर-6 ◙◙◙
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समकालीन लघुकथाएँ |
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