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अभिशप्त
हमारे ही कार्यालय के अन्तर्गत एक अन्य अनुभाग में एक चपरासी कार्य करता था। उसका नाम था- बृजलाल। पक्षाघात के कारण उसका पूरा शरीर थुलथुल हो गया था। वह अजीब ढंग से तैरता हुआ सा चलता था। चलती बार उसके अंग-प्रत्यंग बेजान से होकर ढुलमुल ढंग से हिलते रहते थे। कभी-कभी उसका समूचा शरीर ऐसा झटका-सा खाता था कि उसके पूरे शरीर का सन्तुलन बिगड़ जाता था। उसे पुनः स्थिर करने के लिए वह बहुत देर तक शराबियों-सा झूमता रहता था। उसके होंठ सदा खुले रहते थे तथा मुँह के किनारों से हमेशा लार-सी टपकती रहती थी। अपने अजीब से व्यक्तित्व के कारण वह सब की दृष्टि में था। उसका सबकी दृष्टि में होने का दूसरा कारण था-उसकी बेहद खूबसूरत पत्नी बेहद खूबसूरत थी। मगर थी बिल्कुल ही अन्धी । मैंने भी उसे बाजार में बृजलाल के झूलते बाजू को पकड़कर आते-जाते हुए देखा था। किसी भी ऐसे अलग व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के जीवन के बारे में जिज्ञासा भावना का होना स्वाभाविक ही है। मैंने भी उसके जीवन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था मगर कुछ और सुनने की जिज्ञासा सदा ही बनी रहती थी। संयोग से कुछ दिनों बाद वह हमारे ही अनुभाग में स्थानांतरित हो कर आ गया।
‘बृजू, तुमने कभी अपनी पत्नी की आँखें डॉक्टर से चैक-अप नहीं करवाई ?” मैंने एक दिन यूँ ही पूछ लिया।
‘करवाई थी बाबूजी’ बृजलाल ने अपनी थथलाती जुबान में कहा और फिर आहिस्ता से बोला, ‘ठीक तो हो सकती है’ “तो करवा क्यों नहीं लेता, जीवन में थोड़ा सुख ही आ......” “अरे बाबू सुख कहाँ बहुत ही दुःख आ जाएगा। “वह रहस्यमय ढंग से थथलाया।” मैंने उसे आश्चर्य से देखा। अपना थथलाता मुँह मेरे कानों के बहुत ही पास लाकर वह फुसफुसाया, “फिर क्या वह मेरे साथ ही अटकी रहेगी ?”
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समकालीन लघुकथाएँ |
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