|
डॉ. अजय त्रिपाठी दो कविताएँ
रिश्ते
नोचते हैं खसोट
लेते हैं
दबे पाँव आ कर दबोच लेते हैं
रात सोने भी नहीं देते हैं मुद्दत ग़ुज़री
ख़ौफ़ज़दा मुझ को ये कर देते हैं
ज़रा सा गोश्त जो बाक़ी है जिस्म पर मेरे
लिए वो हाथ में ख़ंजर खुरचने आते हैं
मुझे मेरी ही निग़ाहों में गिरा कर फिर वो
ऐसे मिलते हैं जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं
रिश्ते भी अजीब होते हैं
◙◙◙
सपने
सपने
कुछ कच्चे
कुछ पक्के सपने
कुछ झूठे
कुछ सच्चे सपने
बारिश की अल्हड़ बूँदों से
नन्हें से
मासूम से सपने
धरती की सच्चाई से टकरा टकरा कर
बिखर हमेशा ही जाते हैं सारे सपने
आखिर क्यों
डॉ. अजय
त्रिपाठी
बर्मिंघम, यु.के.
◙◙◙
|