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शकुंतला बहादुर
की दो कविताएँ
उधेड़-बुन
सलाइयों पर कुछ फन्दे डाल
मैं बिनती रही,
बिनती ही रही
!
कभी कुछ घटाती कभी कुछ बढाती
कभी कुछ गिराती कभी कुछ उठाती
कभी उधेड़ देती और फिर से बिन लेती
!
बिनाई को आकार देने के प्रयास में
बार-बार
भूलें सुधारती रही
निरंतर य़त्न से जुटी रही
बिनती रही,
बिनती ही रही
!
तभी मन में बिजली
-सी
कौंध गई
और
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पल भर को
मैं विचारों में खो गई
!
समय की सलाई पर
पलों के फन्दों को डाल
निरन्तर बिनते ही तो रहते हैं
!
अतीत को उधेड़ते और
भविष्य को बुनते हैं
कभी कुछ घटाते और कभी कुछ बढ़ाते हैं
कुछ याद करते और कुछ बिसराते हैं
!
कभी कोई पूरा जीवन बिन जाता है
तो किसी का अधूरा छूट जाता है
!
इसी उधेड़-बुन
में सारा जीवन बीत जाता है
!
मुक्ति
साँस की ज़ंजीर से ही
प्राण बंधन में बँधे हैं
!
और प्राणों से सदा ही
मोह के रिश्ते जुड़े हैं
!
पलक मुँदते साँस की ज़ंजीर टूटे
मोह के ये तार भी सब
झनझना एक साथ छूटे
!
शकुन्तला बहादुर
Dr.
Shakuntala Bahadur
3855 Baldwin
Drive , Santa Clara , CA 95051 U.S.A.
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