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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 प्रवासी कहानी

 

मेज


इला प्रसाद

 

घर पूरी तरह व्यवस्थित हो गया और उसके बाद भी हम यह तय नहीं कर पाए कि इस छॊटी काठ की चौकी को कहाँ रखॆं तो अंतत: हमने उसे आँगन में निकाल दिया आँगन में मेज सहित चार कुर्सियाँ पहले से पड़ी थीं इसलिए वस्तुत: उसका वहाँ होना भी निरर्थक ही था किन्तु थोड़े समय के लिए हमने उससे एक तरह से मुक्ति पा ली भारत होता तो शायद वह चौकी हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती, सत्यनारायण कथा में उपयोग में आती और घर के बाहर होकर पूजा की वस्तु बनती लेकिन परिवेश की भिन्नता के साथ चीज़ों के मायने भी बदल जाते हैं और यही इस चौकी के साथ भी हुआ अमेरिका के कालीन बिछे घर में , जहाँ आप सत्यनारायण कथा जैसे आयोजनों की कल्पना भी नहीं कर सकते और सारे पर्व-त्यौहार मन्दिरों में या अन्य सार्वजनिक स्थलों में मनाए जाते हैं , इस चौकी की सत्ता अर्थहीन थी

 

मेरे इस निर्णय को किसी ने चुनौती नहीं दी किन्तु बाहर खुले में रहकर , धूप बारिश झेल कर अतंत वह टूटकर खत्म हो जायेगी, यह अहसास हर किसी को था

"ठीक है   सुधा , इसे पेन्ट कर दो " सचिन ने कहा

पेन्ट कर देने के बाद यह बैठने के लायक हो जायेगी और जब चार से पाँच लोग जुटेंगे तो कोई इस चौकी का उपयोग बैठने के लिए कर लेगा , यह समझ में आने वाली बात थी मैंने स्वीकार लिया कोई उपयोग होगा तो यह हमें भी फ़ालतू नहीं लगेगी

जब मैंने उसे घर में पड़े हरे रंग के वार्निश से पेन्ट कर डाला तो सचिन ने माथा ठोक लिया

" मैंने सोचा था, तुम इसे कायदे से पेंट करोगी कोई अल्पना जैसा डिजाइन बना दोगी कि यह खूबसूरत लगे तुमने तो इसे और बेकार कर डाला "

मैंने इतना सोचा ही नहीं था पेन्ट इसलिए करना था कि धूप बारिश में सड़ जाए , टूट जाए पेन्ट रक्षा कवच था बस उसका सौन्दर्य से क्या सम्बन्ध ?  लेकिन सचिन को हर चीज़ में सलीका, कायदा और सौन्दर्य चाहिए था सो उनकी अवहेलना भरी दृष्टि अब बार बार चौकी पर पड़ती और घूमकर मुझ पर टिक जाती

 

"इस पर कोई गमला रख देते हैं वो पीले फूलों वाला या एक प्लास्टिक का मेजपोश डाल दूँ ? अच्छा लगेगा कभी बाहर में बैठकर अख़बार पढ़ने हों तो इस पर रख सकते हैं " मैं सुझाव देती

सचिन के चेहरे का भाव यथावत्। उन्हीं गर्मियों में एक नील पंछी के जोड़े ने हमारे आँगन  के सामने वाले पेड़ पर बैठना शुरू किया

 

बहुत सुन्दर होते हैं नील पंछी उनकी भी कई प्रजातियाँ होती हैं ह्यूस्टन में जो प्रजाति दिखती है उसका नाम ब्लू जे है और यह आकार में बड़ा और काले , सफ़ेद नीले रंगों के धब्बे वाले पँखों का बहुत ही खूबसूरत पक्षी होता है। गले में एक कालापन लिए नीली धारी होती है और सही अर्थों में नील कंठ शायद इसे ही कहा जाना चाहिए।

 

वह हमारे मैदान में उतरता तो नीले रंगों की आभा एक छोर से दूसरे