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मेज इला प्रसाद
मेरे इस निर्णय को किसी ने चुनौती नहीं दी किन्तु बाहर खुले में रहकर , धूप बारिश झेल कर अतंत वह टूटकर खत्म हो जायेगी, यह अहसास हर किसी को था । "ठीक है सुधा , इसे पेन्ट कर दो ।" सचिन ने कहा । पेन्ट कर देने के बाद यह बैठने के लायक हो जायेगी और जब चार से पाँच लोग जुटेंगे तो कोई इस चौकी का उपयोग बैठने के लिए कर लेगा , यह समझ में आने वाली बात थी । मैंने स्वीकार लिया । कोई उपयोग होगा तो यह हमें भी फ़ालतू नहीं लगेगी । जब मैंने उसे घर में पड़े हरे रंग के वार्निश से पेन्ट कर डाला तो सचिन ने माथा ठोक लिया । " मैंने सोचा था, तुम इसे कायदे से पेंट करोगी । कोई अल्पना जैसा डिजाइन बना दोगी कि यह खूबसूरत लगे । तुमने तो इसे और बेकार कर डाला ।" मैंने इतना सोचा ही नहीं था । पेन्ट इसलिए करना था कि धूप बारिश में सड़ न जाए , टूट न जाए । पेन्ट रक्षा कवच था बस । उसका सौन्दर्य से क्या सम्बन्ध ? लेकिन सचिन को हर चीज़ में सलीका, कायदा और सौन्दर्य चाहिए था सो उनकी अवहेलना भरी दृष्टि अब बार बार चौकी पर पड़ती और घूमकर मुझ पर टिक जाती ।
"इस पर कोई गमला रख देते हैं । वो पीले फूलों वाला । या एक प्लास्टिक का मेजपोश डाल दूँ ? अच्छा लगेगा । कभी बाहर में बैठकर अख़बार पढ़ने हों तो इस पर रख सकते हैं ।" मैं सुझाव देती । सचिन के चेहरे का भाव यथावत्। उन्हीं गर्मियों में एक नील पंछी के जोड़े ने हमारे आँगन के सामने वाले पेड़ पर बैठना शुरू किया ।
बहुत सुन्दर होते हैं नील पंछी । उनकी भी कई प्रजातियाँ होती हैं । ह्यूस्टन में जो प्रजाति दिखती है उसका नाम ब्लू जे है और यह आकार में बड़ा और काले , सफ़ेद नीले रंगों के धब्बे वाले पँखों का बहुत ही खूबसूरत पक्षी होता है। गले में एक कालापन लिए नीली धारी होती है और सही अर्थों में नील कंठ शायद इसे ही कहा जाना चाहिए।
वह हमारे मैदान में उतरता तो नीले रंगों की आभा एक छोर से दूसरे | |||||||||