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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 प्रवासी कहानी

 

नो समोसा पार्टी प्लीज़


डॉ क़ृष्ण कुमार

 

 ''निर्मला! सुना है अनुभव ने एक गोरी लड़की के साथ शादी कर ली है, क्या यह बात सही है?'' ऐसा कहते हुए, अपने कहने के अंदाज़ से, रंजना ने जान-बूझ कर निर्मला के कलेजे को अन्दर तक जला दिया । रंजना एवं निर्मल के बेटे एक साथ ही पढ़ लिख कर बड़े हुए थे । अनुभव की सफ़लताओं को ले कर रंजना सदैव जलती-भुनती रहती थी और उसको नीचा दिखाने का मौका ढूँढती  ही रहती थी । रंजना के व्यंग्य से क्षुब्ध हो कर निर्मला ने मन ही मन ठान लिया कि इस बार वह भी बड़ा ही चुभता हुआ सटीक ज़वाब ज़रूर देगी । टेलीफ़ोन को अपने दाहिने हाथ में पकड़ते हुए जवाब दिया-

 

''हाँ! उसकी सफलताओं के बारे में टी वी, रेडियो एवं समाचारपत्रों में ख़बर आते ही सुन्दर-सुन्दर पंजाबी लड़कियों की लाइन लग गई थी अपने अनुभव के लिए । किन्तु उसने तो अपने बचपन के साथी को तो पहले से ही चुन रखा था। शीला निक्सन एक बहुत ही होनहार बच्ची है जिसका पालन पोषण एक अनाथालय में हुआ था । शीला के माता-पिता के बारे में न कुछ पता है न करना ही है । लड़की बहुत ही अच्छी है यह मैने देख लिया है । माँ की निगाह जो मैने पाई है । इसी बच्ची के साथ हम लोगों ने बड़े ही धूम-धाम से भारत में जा कर अपने होनहार बेटे की शादी कर दी । मेरी बहू होम ऑफ़िस में एक बहुत बड़ी अफ़सर है । वह तो घर में ऐसे समा गई है जैसे कि वह हमारी ही बेटी हो । रंधीर तो खुशी से गदगद हैं । बहन कभी आना, हम आपको अपनी बहू के हाथों का बनाया हुआ भारतीय भोजन परोसेंगे । फ़ोन करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । हाँ रंजना यह तो बताना कि अपना विक्रम क्या कर रहा है और उसकी शादी के लड्डू कब खिलाओगी ?''

 

रंजना से बिना उत्तर लिए ही निर्मला ने कहा - ''बहन मैं फ़ोन रखती हूं, दरवाज़े पर कोई आया है ।'' विक्रम अनेक प्रयासों के बाद हैलीफ़ैक्स विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए गया तो ज़रूर था किन्तु, अपने माता-पित को बिना बताए ही, पढ़ाई छोड़ कर वहीं बूट्स में काम करने लगा था । एक बहुत ही साधारण-सी नौकरी थी और एक बेलजियन लड़की पैट के साथ रहने लगा था । रंजना एवं बलदेव इन सब बातों को ले कर बड़े ही चिंतित रहते थे किन्तु कुछ कर नहीं पा रहे थे क्योंकि विक्रम ने घर छोड़ने की धमकी दे रखी थी अगर किसी ने इसका विरोध किया । निर्मला एवं रंजना के परिवार पिछले बीस वर्षों से बर्मिंघम में रह रहे थे ।

 

हाउस वाइफ़ रंजना अपने स्वभाव के कारण अपनी मित्र मंडली में बड़ी ही चर्चित रहती थी । उसको अपनी सुन्दरता पर बड़ा ही नाज़ था । वह लोगों से अक्सर कहा करती थी- 'अगर मैं सुन्दर हूँ तो मैं क्या करूँ, लोग अब भी मुझ पर जान निछावर करने को तैयार दिखते हैं । हाँ, यह बात और है कि उनको अधिक आगे बढ़ने का अवसर ही नहीं देती हूँ। कभी-कभी तो वह यह तक कह देती थी कि मैने बलदेव के साथ शादी करके बड़ी गलती की क्योंकि वह तो बिल्कुल साधारण सा नॉनरोमान्टिक आदमी है । भावावेश में वह यह भी कह जाती कि मेरा बलदेव है तो बड़ा अच्छा क्योंकि वह मेरी इच्छा के विरूद्व कोई काम नहीं करता ।'' रंजना ने अपने दोनों बच्चों के दिमाग में घमण्ड एवं ईष्या के बीज बचपन में ही डाल दिए थे । इसके कारण अब दोनों की किसी के साथ भी मित्रता निभ नहीं पाती थी । रंजना को बदलने की बलदेव ने अनेक नाकाम कोशिशें की और उसने जब यह देखा कि यदि और अधिक दबाव डाला तो उनका अपना वैवाहिक सम्बन्ध ही टूट सकता है, बलदेव ने अपने जीवन से समझौता कर लिया था । रंजना इन सब बातों को समझने में पूर्णतया असमर्थ थी । बलदेव ने यद्यपि पंजाब यूनीवर्सिटी से पोलिटिकल साइंस में एमए क़िया था किन्तु यू क़े ने के बाद उसको कोई उपयुक्त नौकरी नहीं मिल पाई थी । अब वह एक बड़े स्टोर में आयात-निर्यात विभाग का बड़ा ही सम्मानित एवं विश्वस्त मैनेजर था । अच्छा बड़ा घर, दो महगी कारें एवं दो सुन्दर बच्चे बलदेव को प्रसन्न रखने के लिए बहुत थे ।

 

निर्मला एवं रंधीर दोनों ही एक सर्जरी में जेनरल प्रैक्टीशनर थे । रंधीर अपने सुन्दर काण्ड के पाठ एवं गायन के लिए अपनी दवाओं से ज्यादा मशहूर था । अनुभव दोनों का इकलौता बेटा था । इनके मकान में सारा सामान एक से एक अच्छा तथा विश्व के कोनों-कोनों से या तो लाया गया था या मित्रों ने उपहार में दिया था । मुख्य द्वार से घर के अन्दर आते ही रंधीर के स्वर्गवासी पिता जी का चित्र लटका था । रोज़ प्रात: अपने पिता को प्रणाम करके ही निर्मला एवं रंधीर अपने दिन का काम प्रारम्भ करते थे । अनुभव भी ऐसा करने का आदी हो गया था, जब कभी वह बर्मिंघम आता था ।  अनुभव लंदन विश्वविद्यालय में रिसर्च साइंटिस्ट था । पूरे परिवार एवं घर में शान्तिमय वातावरण सदैव बना रहता था । समाज के लोगों को इस परिवार पर बड़ा ही गर्व था ।

 

विक्रम को शराब की आदत पड़ चुकी थी और वह रोज़ पी कर जब घर आता तो पैट बार में काम करती रहती थी । कुछ उल्टा-सीधा खा कर वह सो जाया करता । वह ज्यादातर तो माँसाहारी ही था और बाज़ार से ही अन्य अँग्रेज़ बच्चों की तरह फ़िश-चिप्स खरीद का ले आता जिस पर खूब सारा वेनेगर और नमक छिड़का होता था । पता नहीं क्यों उसे बचपन से ही भारतीय भोजन एवं नाश्ता पसंद ही नहीं था । जलेबी, समोसा, पकौड़े, दोसा-सांभर इडली, ढोकला आदि की गंध तो उसे दुर्गंध-सी लगती थी । जब कभी वह अपने माता-पिता के घर जाता तब वहां भी उसकी माँ इसका खास ध्यान रखती और केवल यूरोपीय भोजन ही परोसती थी । वास्तव में रंजना के इस प्यार ने ही विक्र की आदतों को शुरू से ही खराब कर रखा था । देर रात पैट जब बिस्तर में आती तो आपसी तकरार शुरू हो जाती । ज़िंदगी का यह क्रम एक साल से चलता आ रहा था जब से पैट साथ-साथ रहने लगी थी । विक्रम अब तक पूरी तरह से ऊब चुका था । गाहे-बगाहे जब कभी विक्रम अपने घर फ़ोन करता तो माँ-बाप के साथ बहस के बाद ही वह फ़ोन पटक देता । पैट देर तक सोती रहती और विक्रम सुबह उठ कर हैलीफ़ैक्स की ऊची-नीची सड़कों पर गाड़ी चला कर अपने काम पर चला जाता । इन रास्तों की तरह की ज़िंदगी अब विक्रम को सताने लगी थी । पैट भी तंग आ चुकी थी । एक दिन विक्रम जब काम पर था तब पैट ने विक्रम का सारा फ्लैट पूरी तरह से खाली कर दिया । यहाँ तक कि बल्ब और ट्वालेट रोल होल्डर तक निकाल कर, बेड और डाइंनिग टेबल आदि ले कर दूर कहीं चली गई । बाहर दरवाज़े पर एक नोट चिपका मिला-''आई ऐम लीविंग यू हैविंग गॉट फ़ेड अप विध योर ड्रिंक ऐंड बिहैवियर । गो ऐंड रिपोर्ट ट पोलिस इफ़ यूडेयर ।'' अंदर पहुँचने पर उसको जो झटका लगा उसका वह अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था ।

 

गाड़ी चला कर दो घंटों में रात के एक बजे सीधे अपने माँ-बाप के घर बर्मिघम पहुँच गया । माँ की गोद में अपना सिर रख कर वह एक छोटेबच्चे की तरह फूट-फूट कर रोया । सब कुछ जान लेने के बाद रंजना ने समझाया, प्यार से भोजन खिलाने के बाद उसको अपने साथ ही सो जाने के लिए कहा । विक्रम को अजीब सा लग रहा था माँ के बिस्तर में लेटना किन्तु वह अब तक अपना विवेक खो चुका था । सुबह उठते ही विक्रम ने अपने दफ्तर फ़ोन कर दिया कि वह बीमार है । सुबह-सुबह रंजना ने अपनी बेटी नीलम को फ़ोन कर सब बताया और काम के बाद लंदन से घर आने के लिए कहा। नीलम बिना किसी बहस के घर आने को तैयार हो गई ।

 

दिन भर तीनों ने खुलकर बातें की और रंजना ने तरह-तरह से विक्रम को समझाया । आखिरकार विक्रम मान गया कि वह माँ-बाप द्वारा बताई गई लड़की के बारे में सोचेगा।पहले तो वह भारतीय मूल की लड़की के बारे में सुनते ही बिगड़ जाता था । पर अब वह शीघ्र ही शादी करने के लिए भी तैयार हो गया । उसके इस बदलाव के पीछे उसके अपने व्यक्तिगत अनुभव ही थे । उसने तरह-तरह की लड़कियों के साथ रह कर देख लिया था कि उनमें से कोई भी उसके काबिल नहीं थी । सबकी सब अवसरवादी ही निकली थीं । पैट ने तो सभी को चारो कोने चित्त ही कर दिया था। वह अपने आप बुदबुदाता रहा-'उसने क्यों नहीं शुर में ही माँ-बाप का कहना माना? उसने क्यों नही सोचा कि वे उसका ही भला चाहते हैं? वह क्यों गोरे लड़कों के बहकावे में आता रहा? उसकी समझ में पहले क्यों नहीं आया कि भारतीय और पश्चिमी संस्कृति-सभ्यता की सोच में बड़ा मौलिक अंतर है? आदि-आदि......'

 

शाम के आठ बजते ही नीलम अपनी कार से अपने घर सहेली निम्मी के साथ आ गई । निम्मी-नीलम साथ-साथ ही एक स्कूल में ही पढ़ कर आगे बढ़े थे । नीलम बार्कलेज़ बैंक की साउथ हाल ब्रांच में क्लार्क थी और निम्मी एक एडवरटाइज़िंग कम्पनी में आईटी विभाग की सर्वेसर्वा थी । दोनों ने अपनी दोस्ती अब तक बरकरार रखी थी किन्तु यह अब तक सिर्फ निम्मी के कारण ही चलती रही थी । रंजना ने रमा को भी फ़ोन कर चाय पर बुला लिया । निम्मी विक्रम से पहली बार मिली थी और रमा ने भी उसको 15 वर्षी के बाद देखा था । विक्रम दोनों को पहली निगाह में अच्छा खूबसूरत लड़का लगा । निम्मी अभी भी अकेले थी । रमा को रंजना और उसके बच्चों की सोच और व्यवहारिकता को ले कर चिंता अवश्य थी । लेकिन फिर भी मन ही मन में वह सोचने लगी-'हो सकता है कि घर से दूर रहने के कारण और जीवन की वास्तविकताओं को देख लेने के बाद विक्रम में वैचारिक बदलाव आ गया हो ।' अपने मन की बातों को रमा ने विचारों की तह में दबा कर रख लिया । निम्मी के पिता का देहान्त करीब पांच साल पहले अचानक हार्ट फ़ेल हो जाने के कारण हो गया था ।

 

चाय के बाद निम्मी और रमा घर वापस आ गए । रमा निम्मी की भावनाओं को टटोलने में लग गई । दूसरी तरफ बलदेव के घर भी सबने मिल कर विक्रम की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए चर्चाएँ शुरू की । नीलम अपने बड़े भाई के बारे में सब जान कर परेशान हो उठी । यद्यपि रंजना-बलदेव के दिमाग में निम्मी को ले कर कोई खयाल नहीं आया था किन्तु न जाने क्यों नीलम विक्रम को टटोलती रही । नीलम ने विक्रम को निम्मी का मोबाइल नम्बर और ई मेल आई डी दे दिया और कहा कि वह निम्मी को भी उसके कांटैक्ट डिटेल्स दे देगी । विक्रम ने कोई आपत्ति नहीं दिखाई ।

 

प्रातः होते ही पांच बजे विक्रम सीधे काम पर हैलीफ़ैक्स और नीलम-निम्मी लंदन चले गए । रंजना-बलदेव इस बात से ही खुश हो रहे थे कि दोनों बच्चे लम्बे अर्से के बाद घर तो आए थे । नीलम ने भाई को प्यार भरी निगाहों से देखते हुए सहानुभूतिमय वातावरण में बातें तो की थीं अन्यथा वे झगड़ते ही रहते थे और दोनों ने कोई सम्पर्क ही नहीं रखा था ।

 

निम्मी के चले जाने के बाद रमा ने निर्मला की सर्जरी में फ़ोन लगाया । निर्मला उस समय एक मरीज़ का निरीक्षण कर रही थी किन्तु फिर भी संक्षेप में बात कर ही ली । लम्बी बात को बीच में ही काटते हुए निर्मला ने कहा-''रमा मैं तुमको तनिक देर से फ़ोन करती हूँ ।'' सारा दिन बीत गया फ़ोन नहीं आया । रमा तरह-तरह की अटकलें लगाने लगी । लंच टाइम में निम्मी ने फ़ोन कर बताया-''इस बार घर आ कर मुझको बड़ा अच्छा लगा ।'' रात के नौ बजे टेलीफ़ोन की घंटी बजी । टेलीफ़ोन का हैंडसेट अपने बांए हाथ में लेते हुए रमा दूसरी ओर से आने वाली आवाज़ की प्रतीक्षा करने लगी । निर्मला जो रंधीर से कुछ पूछ रही थी बोली- ''रमा मॉफ़ करना सर्जरी के बाद मरीज़ों को उनके घरदेखने जाने के कारण मुझे घर पहुँचते-पहुँचते देर हो गई और तुम तो जानती ही हो कि हम डॉक्टरों को फुर्सत कहाँ मिलती है । कहो अब सारा समय तुम्हारे लिए है । बड़ा अच्छा लग रहा है इतने अर्से के बाद तुम्हारी आवाज़ सुन कर । तुम निम्मी के बारे में कुछ कह रही थीं । हाँ, विक्रम है तो लड़का सुन्दर लेकिन क्या करता है ठीक से मालूम करना होगा । बलदेव तो बहुत ही सुलझा हुआ इंसान है और रंजना के बारे में तो हम सब जानते ही हैं कि उसमें 'मैं' की हवा कितनी भरी है । क्यों न दोनों बच्चों का फ़ार्मल सम्पर्क करवा दो । ई मेल-फ़ोन के माध्यम से वे आपस में चैट करके एक-दूसरे को समझ सकते हैं । अब तो यही एक रास्ता रह गया है ऐसे कामों के लिए । हमारा-तुम्हारा तो ज़माना रहा नहीं कि माता-पिता ने जहाँ ठीक समझा रिश्ता जोड़ दिया और हम बस खामोश रहे । लेकिन बहन मैं तो रंधीर से बहुत खुश हूँ और जितना मैं जानती हूँ तुम भी बहुत आराम से थीं जब तक पंकज जिंदा रहा । लगता है किसी की बुरी नज़र लग गई थी अन्यथा ।…….''

 

रमा ने अपनी आँखों से अनायास ही फूट निकले आँसू को पोछते हुए कहा निर्मला तुम ठीक  कहती हो । हम वैसा ही करने की कोशिश करते हैं । मुझे तुमसे और रंधीर जी से ही मदद की उम्मीद है । निराश न करना । निर्मला ने रमा को आगाह करते हुए कहा बहन चर्चा की शुरुआत रंजना से तुम न करना । तुम स्वयं समझदार हो। वह जली-भुनी बातों से बेमतलब तुमको परेशान कर देगी ।

 

दो माह के अंदर ही विक्रम और निम्मी ने एक दूसरे के साथ वैवाहिक सम्बंध स्थापित करने के इरादों से मिलने की बातें की । इस दरमियां कितने ही ई मेल और फ़ोन दोनों के बीच हुए थे इसका अंदाज़ा लगाना आसान नहीं था । विक्रम ने कई बार निम्मी को अपने फ्लैट पर आने की दावत दी थी जिसको वह समझदारी से टालती रही थी क्योंकि वह सब समझती थी । निम्मी और विक्रम ने अपनी-अपनी माँ को सूचित कर दिया । दोनों परिवारों में योजनाए बनने लगीं । हॉल आदि बुक करने की बातें हुईं । लिस्टें बनने लगीं । मुख्य प्रीस्ट कौन होगा से ले कर वेडिंग रिंग तक की बातें भी हो गईं । दूल्हे का सूट कैसा होगा और कहाँ से आएगा । दूल्हन साड़ी पहनेगी या लहंगा । जूलाई माह के पहले रविवार को विक्रम-निम्मी के मिलने के लिए समय चुना गया । रमा ने सबको अपने घर पर चाय का निमंत्रण दिया । रमा शादी की खरीदारी करने के लिए भारत चली गई और तमाम सामान खरीद कर जून की 30 तारीख को वापस आ गई ।

 

विक्रम और नीलम शुक्रवार की शाम को ही आ गए थे । नीलम अपने नाइजीरियन ब्वाय फ्रेंड स्टीवेन के साथ आई थी । घर पहुँचते ही नीलम ने अपने माँ-बाप से स्टीवेन का परिचय करवाया । रंजना-बलदेव अपनी बेटी के काम करने के ढ़ंग से तपते तवे की तरह लाल हो गए । दोनों एक-दूसरे के चेहरे देखते रह गए । नीलम को कमरे का वातावरण समझने में गलती नहीं हुई । स्टीवेन को वहीं छोड़ कर वह किचेन में चली गई जहाँ विक्रम पहले से ही अपनी चाय बना रहा था । ड्राइंगरूम में बैठे तीनों खामोश ही रहे । स्टीवेन दीवारों पर टंगे चित्रों को देखने लगा और रंजना-बलदेव की आंखें ज़मीन में गड़ी की गड़ी रह गईं मानो कुछ खोद कर निकालने की योजना बन रही थी ।

 

निम्मी यूस्टन स्टेशन से 10.00 बजे की वर्जिन ट्रेन ले कर 11.36 पर बर्मिघम न्यू स्ट्रीट पहुँचने वाली थी । मोबाइल फ़ोन के बटनों पर ऊँगलिया नर्तन करने लगीं । माँ-बेटी शनिवार के अर्ली मॉर्निंग रश ऑवर को चीरते और निर्मला को मिलते हुए घर पहुँचे ही थे कि निम्मी के मोबाइल पर विक्रम का फ़ोन आया । रमा ने विक्रम को ठीक से समझा दिया कि वह सब कल शाम को 4 बजे तक पहुँच जांय तो अच्छा रहेगा । यकायक निम्मी को पिता पंकज की याद आ गई । दोनों के बीच खून के रिश्ते के साथ दोस्ताना सम्बंध भी था । जिंदगी के हर पहलू पर दोनों के बीच खूब खुल कर बहस हुआ करती थी । पुरानी यादों का पेड़ एक सजीव चलचित्र की तरह उसकी ऑंखें के सामने आने गया । उसने माँ से जा कर कहा-''माँ! आपकी पुरानी राजस्थानी चुनरी कहाँ है जो पिता जी को बहुत भाती थी, कल मैं वही पहनना चाहती हूँ । आपको कोई एतराज़ तो नहीं है ।'' रमा ने बेटको गले लगाया और रंग-बिरंगी चुनरी ला कर निम्मी को दी ।

 

समय पर सब आ गए । विक्रम डार्क ग्रे सूट में कुछ अजीब सा लग रहा था । राजस्थानी चूनर में निम्मी बड़ी ही सुन्दर लग रही थी । वह सजी हुई ट्रे में चाय और नाश्ते का सामान ले कर कमरे में आई । सामान्य बात-चीत के बाद रमा ने एक तरह के बड़े-बड़े समोसे को विक्रम की ओर बढ़ाते हुए कहा-''बेटा! यह एक खास समोसा है जिसमें काजू एवं पिस्ता डलवा कर मैने अपने निरीक्षण में इलाहाबाद की मशहूर दुकान नेत्र राम से बनवाया है, खाकर देखो कैसा लगता है? अन्य समोसे भी लेना सब बड़े ही स्वादिष्ट हैं ।'' विक्रम ने मुंह बनाते हुए बिना कुछ सोचे तपाक से कहा-''ऑन्टी मुझे समोसे बिल्कुल नहीं पसन्द हैं, जहाँ जाओ हर भारतीय घर में केवल समोसही मिलता है ।'' रंजना और बलदेव तो विक्रम का मुंह देखते ही रह गए । रमा ने बड़े ही प्यार से फिर कहा-''बेटा जो पसन्द हो वह खुद ले लो, चाय में शक्कर लोगे या तुमने भी छोड़ रखी है? '' ''ऑन्टी मैं चाय नहीं पहूँ, मुझे तो कॉफ़ी चाहिए ।'' रमा कॉफ़ी बनाने के लिए उठ कर चली गई । उसके पीछे-पीछे निम्मी भी आ गई और माँ से कहा-''यह तो अजीब ही निकला, तुम क्या सोचती हो? '' क्षुब्ध हृदया रमा ने यह कह कर बात टाल दी- ''देखते हैं मेरी बच्ची''

 

अन्य सभी लोगों ने तरह-तरह के चटपटे मसालेदार समोंसो का जी भर लुत्फ़ लिया और रमा को इतनी बढ़िया समोसा पार्टी के लिए धन्यवाद भी दिया । मौका पाते ही रंजना ने कहा - रमा बहन ! उन गुजराती समोसों का भी स्वाद लेना जो हम आज के लिए ही ले लाए हैं जिनमें गाज़र-पनीर भरा है और कुछ-कुछ मिठास लिए हुए हैं । गुजराती समोसों को तलने के लिए रमा उठ कर चल दी । गुजराती विक्रम ने इन समोसों को भी नहीं उठाया ।

 

थोड़ी देर बाद रमा एवं रंजना ने विक्रम और निम्मी को बाहर लॉन पर भेज दिया ताकि वे आपस में बात कर एक दूसरे को समझ सकें । बाहर आते ही निम्मी ने पूछा-''आपको समोसे नहीं पसन्द हैं तो आपको अपने कामके अलावा और क्या पसन्द है?'' विक्रम ने तपाक से जवाब दिया-''मुझे तुम जैसी खूबसूरत लड़कियों से गप्पें मारना एवं टेलीविज़न देखना ही अच्छा लगता है, और आपको क्या भाता है?'' तनिक सम्भलते हुए निम्मी ने जवाब दिया-''मतो भारतीय संस्कृति के बारे में पढ़ने और आध्यात्म को समझने में ही आनन्द आता है । भारतीय दर्शन शास्त्र अथाह है । मुझे तो हिन्दू देवी-देवता भी अच्छे लगते हैं ।'' इसक