साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

  ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 ज़िंदगी के रंग

 

मेरे घर आई एक नन्हीं परी......!


किशोर दिवसे

 

कुलक्छनी!फिर उसने एक बेटी जन दी...मर क्यूँ नहीं गई.....अच्छा होता कि बाँझ ही रह जाती - बूढ़ी सास हमउम्र महिला के पास अपनी भड़ास निकाल रही थी।

अरे ....तेरी लुगाई ने तो बट्टा लगा दिया....क़रमजली ने फिर बेटी पैदा की। तेरा खानदान चलाने मैं तो तेरा दूसरा ब्याह करवाने की सोच रही हूँ!

कालचक्र को अपनी पूरी रफ़्तार से घूमना था, सो घूमता रहा और आज- पहली बेटी दूध-रोटी, बधाई हो..., घर में लक्ष्मी आई-बेटी जनमते ही दाई ने अहाते में टहलते शु्क्ला जी को बधाई दी और आँखों के भीगे कोरों पर पलभर के लिए अपना तहबंद रुमाल रखकर वे ज़रूरी कामकाज मे लग गये थे ।

मुस्कुराती कली से आहिस्ता-आहिस्ता बनता फूल । खेतों में लहराती सुनहरी बालियाँ ।  कुलांचे भरती हिरनी । तपती धूप में मंदानिल...मंदिर या गिरिजा की घंटियों के स्वर और मस्ज़िद की अज़ान या गुरुद्वारे के शबद कीर्तन की शुचिता इन सभी भावनाओं को अगर, किसी शरीर में बंद कर आपके  सामने रख दिया जाय तो यकीन मानिये एक बेटी ही होगी आपके सामने। यादों के दरीचे खुलकर आपके कानों में आवाज़ गूँजेगी- पापा...पापा...! लोरी सुनाओ ना ! लल्ला लल्ला लोरी...दूध की कटोरी...दूध में बताशा.....!

किशोर दिवसे

जन्म-15,सितम्बर,1956। शिक्षा-बीएस.सी, बी.जर्नलिज़्म। कुछ वर्षों तक गुरू घासीदास विवि, बिलासपुर के पत्रकारिता विभाग में व्याख्याता रहे । मराठी, हिंदी और अँग्रेज़ी अनुवाद में गहरी रूचि । पत्रकारिता और रचनात्मक लेखन में निरंतर सक्रिय हस्तक्षेप। विगत 28 वर्षों की पत्रकारिता के दौरान व्यावसायिक अनुवाद के साथ-साथ, बाज़ारवादी दौर में दम तोड़ती संवेदनाओं को बचाने की ज़िद वाले व्यक्तित्व । वेब-पत्रकारिता से भी संबद्ध रहे । 84 से हिंदी दैनिक 'नवभारत' बिलासपुर संस्करण में वरिष्ठ उपसंपादक। छत्तीसगढ़ी लोककथाओं का अनुदित अँग्रेज़ी संस्करण प्रकाशित ।

संपर्क

जनता क्वार्टर, EWS-67, नेहरू नगर,  बिलासपुर - 495001, छत्तीसगढ़

मेरे घर आई एक नन्ही परी...रेशमी लटों के नीचे काला टीका छुपाकर माथे पर थप्पी देकर सुलाते हुए माँ के बोल उन शब्दों में दिल को क़तरा-क़रता पिघलते देखा है। दूज के चाँद  और पूरनमासी की चमकती-दमकती थाली तक पल-पल बढ़ती चंद्रकलाओं में कभी अपनी बेटी का चेहरा देखना, अद्रभुत सम्मोहन है इसमें ।

 

क्यों जी ! सासूजी क़ह रही थीं घर में सिर्फ़ बेटियाँ है बेटे के बगैर अपना खानदान कैसे चलेगा !”

देखो ! आज के ज़माने में बेटे-बेटी में कोई फ़र्क नहीं है। अखबारों में पढ़ती नहीं तुम बेटियाँ शहरत की बुलंदी पर हैं। जानती नहीं तुम अब तो बेटी भी बाप की अर्थी को कंधा देने लगी है। बंद कमरे का यह संवाद अब खुला सच है।

पर...कभी आपके मन में ऐसा तो नहीं लगता कि काश अपना कोई बेटा होता !

काली !..बेवकूफ़ हैं जो इस बात पर कुढ़ते रहते हैं। आखिर छोटे भाई क्या बेटे जैसे नहीं?

दुबेजी की बेटी नहीं है। वह अपनी पड़ोसन पांडे भाभी की बेटी को देखकर खुश हो जाती है। दुबाइन के बेटे कहाँ घर के काम-काज में हाथ बटाने, लेकिन पांडे भाभी की बेटी को घर का काम काज संभालकर पढ़ाई और खेलकूद में अबल देखते हुए मन भर आता है। बेटी जैसा ही प्यार लुटाती है उसपर।

 

बेटी के न होने का दुख उनसे पूछिये जिनकी बेटी को क्रूर काल ने छीन लिया हो जिसे माता-पिताओं की आँखों  में झाँककर देखिये । उनकी सूनी पुतलियों में अब भी उन खो गई बेटी का आँसुओं से भीगा चेहरा दिखाई देगा। अँगुलियाँ पलकों तक पहुँचे बगैर नहीं रह सकेंगी।

 

चलो...नर्सिंग होम में जाँच करवा लेते हैं यदि लड़का है सो ठीक वरना ....! सोनोग्राफी क्लीनिक्स में परीक्षण करवाने पहुँचे युवा दंपत्तियों की देह भाषा को ताड़ने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगता । यहीं वज़ह है कि स्त्री-पुरुष अनुपात बिगड़ गया है जिसका ख़ामियाजा सामाजिक समस्या के रुप में हम सब के सामने है। ऑपरेशन थियेटर में रक्त रंजित माँस का लोथड़ा देखकर अजन्मे नारी भ्रूण की करुण क्रंदन मेरे मन को छलनी कर देता है, मानो चीखकर वह कह रहा हो नहीं...मत मारो मुझे ...मैं निर्दोष हूँ अपने पापों की सज़ा मुझ बेगुनाह को क्यूँ दे रहे हो ?”

 

कन्यादान का सुख बूढ़े बाप के लिये अनिर्वचनीय है । अपने ज़माने का एक पुराना गीत दिमाग के किसी कोने में उभरता है- बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको...., बेटी पराया धन है...हम तो बेटी के ससुराल में आकर पानी तक नहीं पीते...पुरानी मान्यताएँ बदल-चुकी हैं अब। विदाई की मार्मिक बेला में आसुओं की बरसात का सच शाश्वत है। खूँटी पर टँगे उस कुरते पर अनायास ही नज़र पड़ती है और आँसुओं के उस सैलाब को तलाश करने लगता हूँ जब दद्दू  अपनी बेटी को विदा करने के बाद मेरे सीने से लगकर फफक-फफक कर रोये थे।

 

बेटी को संस्कारित करना एक पूरे परिवार को संस्कारवान बनाना है क्योंकि बेटी ही एक पृथक परिवार की बुनियाद है। मीनेन्डर ने कहा है बेटी पिता के लिये आकुलकारी एवम् जटिल वैभव है। यूरीपीड़िस भी दुहिता के वास्तल्य से अभिभूत है बूढ़े होते पिता के लिये बेटी से प्रिय कुछ भी नहीं। बेटे ओश का - ज्वालामुखी होते है परंतु मिठास भरे प्रीतिकर अनुराग का दूसरा नाम है बेटी।

 

अँग्रेज़ी की पुस्तक पढ़ते-पढ़ते अनायास ही दर्पण में अपने ही चेहरे पर दृष्टि पड़ती है। यह क्या...मेरे चेहरे पर यीट्स का मुखौटा ! अँगुलियों के स्पर्श भी बेमानी हो जाते हैं जब विलियम बट लर यीट्स की कविता के सम्मोहन में कोई भी पिता खुद को यीट्स समझ बैठता है 26 फरवरी 1919 को अपनी बेटी के जन्म पर पिता यीट्स की कविता अ प्रेयर फॉर माई डॉटर के भाव कुछ इस तरह हैं-

पालने में सोई है बेटी और बाहर चल रही हैं तुफानी हवाएँ। बाहरी तूफान मेरे मन के भीतर है। कैसे बचाऊँगा तूफानी हवाओं से जो इसे...जीवन के तूफानों का किस तरह सामना करेगी वह !

 

मेरी बेटी इतनी खूबसूरत न हो कि शिष्टाचार भूल जाये। वह हरा-भरा फलों से लदा पेड़ हो। ऐसा वृक्ष हो जिसकी जड़ें भी गहरी हो और वह ज़मीनी सच्चाइयों को पहचाने। वह अति सौंदर्यवती हेलेन ऑफ ट्राय की तरह नहीं हो जिसकी वज़ह से युद्ध हुआ और एक लंगड़े से शादी की। वह सही गलत की पहचान कर सके और बुद्धिजीवियों की नफ़रत उसने मन में न समाये। अमीरी की अकड़ और मिथ्या वैभव से मेरी बेटी दूर रहे । वह उस लिनेट पक्षी (चटक) की तरह बने जो तूफानों मे भी गीत गाता है। और...जब उसका व्याह हो, उसे ऐसा जीवन साथी मिले जो उसे मकान नहीं ऐसा आशियाना दे जहाँ घर संस्कार और परम्परा का ख़जाना हो।

 

अचानक ही तेज हवा की एक झोंका आता है और मेरे गले से दो बाहें आकर लिपट जाती हैं- पापा ! मैं कॉलेज जा रही हूँ....बाय ! ठीक है...टेक केयर कहकर पुस्तक, मेज पर ख़ामोश हो जाती है। पड़ोस मैं क्लास सेवन में पढ़ने वाली बिटिया आकर कहती है “”अंकल जी !  देखिये ना...अच्छी बेटी, दूध-रोटी पर मैंने एक कविता लिखी है । पप्पू टीवी का स्विच ऑन करता है और सोनू निगम का एक गीत गूँजने लगता है-

चंदा की डोली में, परियों की झोली में

शहज़ादी आई मेरी....!

किशोर दिवसे

जनता क्वार्टर नं. 67

नेहरुनगर, बिलासपुर

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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