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न करें किसी कौम को कठघरे में खड़ा विश्वनाथ सचदेव
इसमें कोई शक नहीं कि कश्मीर से लेकर हैदराबाद तक फैली आतंकवादी गतिविधियों में शक की सुई मुसलमानों की ओर ही इशारा करती है । पिछले लगभग एक दशक में मुसलमान आतंकवादी ही संदेह के घेरे में आए या पकड़े गए हैं, लेकिन इन सबके बावजूद न तो यह सही है कि सारे आतंकवादी मुसलमान होते हैं और न ही यह सही है कि किसी का मुसलमान होना ही उसे शक़ के घेरे में ले आए । आतंकवादी सिर्फ़ आतंकवादी होता है, उसका कोई मज़हब नही हो सकता । कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में कुछ मुसलमान मारे जा चुके हैं, मालेगांव में भी हमने मुसलमानों को आतंकवाद का शिकार होते देखा और हैदराबाद का यह उदाहरण भी सही है कि आतंकवादी आतंक फैलाने के लिए मारता है, वह यह नहीं सोचता कि हिंदू मर रहा है या मुसलमान ।
हैदराबाद बम विस्फोट में मुसलमान भी मारे गए हैं और यह कार्यवाई करने वाले अच्छी तरह से जानते थे कि लुंबिनी पार्क और गोकुल चाट भंडार में मारे जाने वाले सिर्फ़ गैर मुसलमान नहीं हो सकते । सच पूछा जाए तो हैदराबाद में हुए आतंकी हमले का लक्ष्य हैदराबाद नहीं, भारत था और यह सच्चाई भारत में हुई हर आतंकवादी कार्रवाई पर लागू होती है । चाहे वह आतंकवाद नक्सलियों का हो या माओवादियों का, निशाने पर कोई मज़हब या वर्ग नहीं, पूरा भारत होता है । इस बात को यदि हम समझ लें तो यह समझना भी मुश्किल नहीं होगा कि आतंकवाद की जड़ों को ही पानी देते हैं । यह बात बहुसंख्यक हिंदुओं को ही नहीं, अल्पसंख्यक मुसलमानों को भी समझनी है हर भारतीय का कर्तव्य बनता है कि वह आतंकवाद की भर्त्सना करे, क्यों अंततः कोई भारतीय ही आतंकवाद का शिकार होता है । यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज भी अल्पसंख्यकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे हर कदम पर अपनी निष्ठा प्रमाणित करें । राष्ट्र के प्रति निष्ठा तो हर भारतीय को प्रमाणित करनी होती है, सिर्फ़ कथनी से नहीं, करनी से । लेकिन यह अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हमने भाषा को, जाति को, रहन-सहन को धर्म से जोड़ दिया है । भाषा की बात ही करें तो हमने यह मान लिया है कि मुसलमानों की भाषा उर्दू है । यह सही है कि उर्दू की अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं मुसलमान ही प्रकाशित करते और पढ़ते हैं, लेकिन उर्दू मुसलमानों की ही भाषा नहीं है । यदि ऐसा होता तो फिराक गोरखपुरी या कृश्न चंदर उर्दू में नहीं लिखते और न ही हिंदी हिंदुओं की भाषा है ।
हमारे संविधान में वर्णित सभी भाषाएं भारतीयों की भाषाएं हैं । जिस तरह किसी भाषा को किसी धर्म के साथ जोड़कर देखना गलत है, उसी तरह धर्म के आधार पर राष्ट्र के प्रति किसी की निष्ठा को तौलना भी गलत होगा । इसके बावजूद हम इस तथ्य से भी आँख नहीं चुरा सकते कि धर्म के नाम पर हुए देश के बँटवारे के बाद और भारत द्वारा स्वयं को धर्मनिर्पेक्ष घोषित करने के बावजूद, ऐसी स्थितियाँ भी बनीं कि एक देश के नागरिक होते हुए भी हिंदू और मुसलमान कभी-कभी एक-दूसरे के शक की निगाहों से देखने लगे । इस स्थिति के लिए किसी एक को दोषी ठहराना सही नहीं होगा । सही यह है कि गलती दोनों तरफ़ से होती है । ऐसे भी मौके आए जब बहुसंख्यक एक जनतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में अपनी सही भूमिका भूल गए और ऐसे भी मौके आए जब अल्पसंख्यकों ने अपनी कथनी-करनी से शक़ के अवसर पैदा किए । लेकिन यह बात आम भारतीय चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पर लागू नहीं होता, सब पर भी नहीं । सिर्फ़ कुछ पर लागू होती है । गणना की दृष्टि से देखें तो इस कुछ का मतलब बहुत-बहुत कम है। हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का तकाज़ा है कि इस बहुत-बहुत कम को राह पर लाया जाए। यह काम दोनों पक्षों के रहबरों को करना है। हिंदुओ कट्टरपंथी तबके को यह समझना होगा कि देश का हर नागरिक भारतीय है, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो और कट्टरपंथी मुसलमानों को भी यह समझना होगा कि साथ जीना हमारी नियति ही नहीं, हमारे जीने की शर्त है। इसी शर्त का तकाज़ा है कि दोनों पक्षों में विवेकशील नेतृत्व पनपे। ऐसा नेतृत्व ही अपनी जाति, अपने धर्म के भटके लोगों को राह पर ला सकता है ।
विवेक का मतलब होता है चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में देखना-समझना । पिछले दिनों मुंबई बम कांड के आरोपियों को सजा सुनाई गई। देर से ही सही, न्याय होता हुआ दिखा । बाबरी मस्जिद कांड के बाद मुंबई में हुए दंगों के दोषियों को भी लोग जेल की सलाखो के पीछे देखना चाहते हैं। यह माँग करने वालों में मुसलमान ज़्यादा मुखर है। उधर हिंदुओं का कट्टरपपंथी तबका इस माँग को गड़े मुर्दें उखाड़ना बता रहा है। दोनों ही पक्षों का सोच गलत है। बम कांड या मुंबई के दंगों के दोषी हिंदू या मुसलमान नहीं थे। अपराधी थे, वैसे ही जैसे आतंकवादी सिर्फ़ अपराधी होते हैं।
संपादक, नवनीत मुंबई, महाराष्ट्र ◙◙◙
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