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संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का समय डॉ. वेदप्रकाश वैदिक
संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का यह अनुकूल समय है। भारत सरकार को केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा -51 संशोधन करवाकर हिंदी का नाम जुड़वाना होगा। इस मुद्दे पर देश के प्रायः सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं।
कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व-मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा। जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिंदी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपत्ति है, वे भी संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 19 भाषाएँ भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं। वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व-मंच पर भारत ‘गूँगा’ बनकर बैठा रहे। अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिन्दी बैठा रहे । अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिंदी बिठा दी, तो हमें सुरक्षा परिषद में बैठना अधिक आसान हो जाएगा।
1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं। अँग्रेज़ी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी । सिर्फ ये चार इसलिए क्योंकि ये पाँच विजेता महाशक्तियों की भाषाएँ थीं । अमेरिका और ब्रिटेन दोनों की अँग्रेज़ी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी। इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन जर्मनी, जापानी आदि भाषाएँ किसी तरह कमतर नहीं थी, लेकिन वे विजित राष्ट्रों की भाषाएँ थीं। यानी जिस भाषा के हाथों तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही सिंहासन पर जा बैठी। क्या अब 62 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा।
1945 में जो चार भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषाएँ बनीं, उनमें1973 में दो भाषाएँ और जुड़ीं। हिस्पानी और अरबी ! इन दोनों भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में शक्ति बल के कारण नहीं, संख्या बल के कारण मान्यता मिली।
हिंदी को तो पता नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए। सबसे पहला कारण तो यह है कि हिंदी को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा । उसके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का यह शुभारम्भ माना जाएगा। 62 साल से विजेता और विजित के खाँचे में फँसी हुई संयुक्त राष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा। दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र दुनिया के दूसरे के सबसे बड़े लोकतंत्र, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और दुनिया के चौथे सबसे मलादार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़एगा। तीसरा, हिंदी को मान्यता देने का अर्थ है-तीसरी दुनिया और गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना। भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता रहा है।
चौथा, हिंदी विश्व की सबसे अधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्त राष्ट्र की इन भाषाओं में चीन की अधिकृत भाषा ‘मेंडारिन’ को बोलने-समझने वालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्व कोशों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है। उसे 100 करोड़ भी बताया जा सकता है, लेकिन असलियत क्या है ? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं। चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएँ हैं। उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते । मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूँ। एक-एक माह वहाँ रहा हूँ। मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़ते थे। अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी इससे हिंदी पिछड़ नहीं जाती। आज हिंदी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी ज्यादा है। सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिन्दी समझ लेते हैं। और ज़रूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं। अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिंदी के व्यावहार में अब भी कठिनाई है, तो उसकी भरपाई ‘दक्षेस’ के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं। उनमें से ज्यादातर हिंदी समझते हैं। उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिंदी का प्रयोग सगर्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को प्रतिष्ठित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है।
पाँचवाँ, हिंदी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएँ नहीं बोली-समझी जाती हैं। यह ठीक है कि अँग्रेज़ी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें ब्रिटेन, फांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है, लेकिन ये भाषाएँ उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा लोग आज भी नहीं बोलते, जबकि हिंदी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, ट्रिनि़डाड, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियाँ टीवी पर सुनाई देगी, तो सोचिए कि कितने लोगों और व्यापार राष्ट्रों का संयुक्त राष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता जाएगा।
छठा, यदि हिंदी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी, तो दुनिया की अन्य सैंकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया ख़जाना खुल पड़ेगा। हिंदी संस्कृत की बेटी है। संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं। एशिययाई और अफ्रीकी ही नहीं, युरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज नए शब्दों की जरूरत बड़ती है। इस कमी को हिंदी पूरा करेगी।
सातवाँ, हिंदी के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को लिबास मिलेगा। वे निवर्सन हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज्बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि भाषाएँ विदेशी विपियों में लिखी जाती हैं। मजबूरी है। हिंदी इस मजबूरी को विश्व-स्तर पर दूर करेगी। वह रोमन, रूसी और चित्र-लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी। उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है। जो बोलो, सो लिखो और जो लिखो, सो बोलो। संयुक्त राष्ट्र में बैठी हिंदी विश्व के भाषाई मानचित्र को बदल देगी।
यदि हिंदी संयुक्त राष्ट्र में दनदनाने लगी, तो उसके पास ठोस परिणाम सामने आएँगे। पहला, भारतीय नौकरशाही-नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी। भारत के राजकाज में हिंदी को उचित स्थान मिलेगा। दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्धि होगी। तीसरा, ‘दक्षेस’ राष्ट्रों में ‘संगच्छध्वं संवद्ध्व’ का भाव फैलेगा । जनता से जनता का जुड़ाव बढ़ेगा। तीसरा, वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अँग्रेज़ी का संशक्त विकल्प तैयार होगा। चौथा, स्वभाषाओं के ज़रिए होने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की गति तीव्र होगी। उसके कारण भारत ‘दिन-दूनी रात चौगुनी’ उन्नति करेगा । सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरू बनेगा।
वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली ◙◙◙
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