साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

  ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 हिंदी-विश्व

 

प्रबंधन और हिन्दी


रंजना अरगड़े

 

भाषाओं की नस-नस एक-दूसरे से गुथी हुई है

(मगर उलझी हुई नहीं)

हमारी साँस-साँस में उनका सौन्दर्य है

(मॉ ड र्निस टिक्) कहो मत

अभी हमें लड़ने दो

 

यब स्टेज महान

मूर्खों के लिए ही है

आह यह आधुनिक स्टेज

परिस्थितियाँ हीरो हैं

और यांत्रिक राजनीति हिरोइनें

 

कविता में आगे कहा है-

 

इस नाटक के लिए

आधुनिकतम निर्देशक अमरीका से बुलाओ

और फ़्रांस से । और जापान से

तभी हम लिखेंगे और रक्त के समान उज्ज्वल

हमारी भाषाओं का तिलक होगा।।

(शमशेर)

एक बड़ा कवि आने वाले समय की हक़ीक़त को देख ही लेता है। आज हिन्दी को वैश्विक संदर्भ में देखने का हमारा नज़रिया अब पहले जैसा नहीं रहा है। पिछली पीढ़ी को इस बात की चिंता अधिक थी कि किस तरह हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता मिल जाए और यह कह दिया जाए कि हाँ- तुम्हारी भाषा महान् और फिर हम सिर उठा कर कहें कि हिन्दी भाषा महान्। आज उस मान्यता के अध-खुले परदे दार दरवाज़े पर खड़े हम, दो प्रकार के लोगों में विभक्त हो गए हैं। एक वही पीढ़ी, जो इसे यानी हिन्दी को राष्ट्र संघ की मान्यता दिलवाना, अपने लंबे संघर्ष का परिणाम मानती है और एक वह नयी पीढ़ी जिसे इस बात का एहसास संभवतः है कि इसमें केवल बुज़ुर्गों का संघर्ष शामिल नहीं है, बल्कि अमरीका का अस्तित्व-संघर्ष भी ज़िम्मेदार है। अब हिन्दी राष्ट्र संघ की भाषा अवश्य बनेगी क्यों कि अब अमरीका को इसकी आवश्यकता है। हिन्दी का आगामी सम्मेलन न्यूयॉर्क में तय होना तथा अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का 2007 जून से लाग होना निश्चय ही एक-दूसरे के साथ जुड़ी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद क्या हम हिन्दी का वज़नदार थैला उठा कर चले थे जिसे  हमने संयुक्त राष्ट्र संघ के दरवाज़े पर ही छोड़ दिया और फिर घर आ कर धुंध और धूल में पड़ी अंग्रेज़ी को अपने आँचल से बड़े प्यार से, कुछ-कुछ अपराध-भाव से, साफ़ करने और सहलाने में लग गए।

 

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस बात पर अपना ध्यान केन्द्रित करें कि कहीं कुछ ही समय के बाद थैले में पड़ी-पड़ी हमारी हिन्दी एक ख़ूबसूरत पैकिंग में किसी निश्चित पेकेज के साथ हमें एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ने की नौबत न आ जाए। वैश्वीकरण के इस युग में जब भाषा और लिपि यंत्र-बद्ध हो गयी है, कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी और सॉफ़्टवैर प्रोग्रामिंग का इतना विकास हो गया है कि अब भाषा, उच्चारण, ध्वनियाँ, हिज्जे, व्याकरण - सर्व-जन-सुलभ हो गया है अतः उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तनों के लिए किसी की कोई बपौति नहीं है। कहीं ऐसी नौबत न आ जाए कि अँग्रेज़ीदाँ हमारी इस नई पीढ़ी को विदेशियों से हिन्दी भाषा को पढ़ना पड़े। अंग्रे़ज़ी के गढ़ में इंडियन इंग्लिश को जगह मिली अवश्य है, पर सर्जनात्मक स्तर पर। उनके प्रशासनिक कामकाज में भारतीयकृत अंग्रेज़ी को कोई स्थान नहीं है।

 

और अमरीका कोई यशोदा थोड़े ही हैं कि हौं तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करत ही रहियो - कह कर हमारे सांस्कृतिक अधिकार को स्वीकार करेगा। बहु-सांस्कृतिकता वाद के इस दौर में टाट के तार-तार परदे के उस पार खड़ा है अमरीकी पठान तथा इस पार अपनी अस्मिता को बचाते वे देश तथा उनकी संस्कृति हैं, जो अमरीका के धन-वर्चस्व के सामने विवश नज़र आते हैं। तब तक कोई नया दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित हो जाएगा जिसके तहत बहु-संस्कृति वाद के विरोधी अथवा आगे के कदम के रूप में विश्व-संस्कृति वाद की चर्चा होने लगेगी। इसके तहत यह कहा जाएगा कि चूँकि  संस्कृति- विधान, सामाजिक नियम तथा विधि-विधान मनुष्य की सुविधा के लिए बनाए गए हैं अतः सुविधाओं के बदलने के साथ-साथ सभी कुछ बदल जाता है अथवा तो बदल जाना चाहिए। अतः यह आग्रह करना ही व्यर्थ साबित हो जाएगा कि हाँ, हिन्दी हमारी है। हमारी भाषा के राज-सिंहासन पर बैठा दिलकश बाज़ार और खतरनाक शस्त्र कभी उससे अपना दिल बहलाएगा और कभी  वह खतरनाक शस्त्रों का जिरह-बख़्तर बन कर स्वयं अपने आप को लहुलुहान करती रहेगी।

 

विश्व मंच पर अब हिन्दी को एक सर्वथा नए विधान तथा नई चुनौतियों के साथ उपस्थित होना होगा। निश्चित् रूप से इन चुनौतियों का सामना हम नहीं करेंगे तो कोई और कर लेगा। क्योंकि वैश्वीकरण ने जिन उपकरणों का निर्माण किया है वे सभी के लिए हैं। इन चुनौतियों के कई स्वरूप हो सकते हैं। इसके अन्तर्गत हिन्दी कॉरपोरा- अर्थात् - कॉरपोरेट जगत और हिन्दी, हिन्दी कंप्यूटिंग, हिन्दी प्रबंधन आदि की बात की जा सकती है। हिन्दी भाषा प्रौद्योगिकी की गहरी उपस्थिति से यह बात अब नई नहीं रही कि भाषा भी अब एक विकास का, भौतिक विकास का उपकरण बन गयी है। वह भाषा जो आध्यात्मिक, नैतिक, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम थी और है वह अब भौतिक विकास का भी साधन है। हिन्दी भाषा की यह माध्यम से साधन तक की गति का ही परिणाम है कि अब उसके बारे में नए ढंग से सोचने में अगर विलंब हुआ तो विश्व मंच पर हमारी भूमिका एक दर्शक-भर की रह जाएगी।

 

इस प्रपत्र के माध्यम से मैं हिन्दी और प्रबंधन के संदर्भ में कुछ सह-चिंतन करने का उपक्रम करना चाहती हूँ। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर अभी विशेष सोचा नहीं गया है। पहली बार सन् 1995-96 में जब भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद से मुझे यह कहा गया कि हमें हिन्दी में काम कर सके ऐसे एक व्यक्ति की नियुक्ति करनी है, पर स्थाई नहीं क्योंकि हमारे यहाँ हिन्दी का क्या काम। पर चूँकि सरकार का यह नियम और आग्रह है अतः हमें किसी को रखना होगा। हम उस पर अधिक धन नहीं खर्च करना चाहते। तब तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में मैंने यह कहा था कि आप का सोचना गलत है क्योंकि अब आपको इसकी आवश्यकता पड़ेगी। प्रबंधन में जब हमारे पास इतनी बड़ी और ख्याति-प्राप्त संस्था है तब इसके द्वारा ही हम हिन्दी की और प्रकारांतर से भारत की स्थिति विश्व में दृढ कर सकते हैं। एक सहज हिन्दी-प्रेम के कारण मेरे मन में यह बात दृढ होती गयी कि हिन्दी को लेकर यह उपेक्षा का भाव किसी भी क़ीमत पर दूर होना चाहिए। समय समय का काम करता है और जैसा कि कवि ने कहा है कि विश्व मंच पर नायिका राजनीति का ऐसा कमाल हुआ कि सन् 2007 जनवरी में विश्व हिन्दी उत्सव में बोलते हुए मैनेजमैंट गुरु श्री अरिंदन चौधरी ने कहा कि प्रबंधन के व्यावहारिक क्षेत्र में न अंग्रेजी चलती है न ही मातृ भाषा, वहाँ तो केवल हिन्दी ही चलती है। अरिंदन चौधरी के इस कथन ने मुझे बाध्य किया कि मैं अपनी उस बात को क्रिया- रुप में ढालूं। इस हेतु से प्रबंधन के पाठ्य क्रम में हिन्दी को कैसे स्थान मिल  सकता है, उसे किस प्रकार उसमें शामिल किया जा सकता है उस पर थोड़ा सोचा है। इस संदर्भ में मैंने प्रबंधन पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले युवा पीढ़ी के अध्यापकों को तथा गुजरात और गुजरात बाहर के कुछ विद्यार्थियों से भी बातचीत की है। सभी इस बात से सहमत थे कि हिन्दी को प्रबंधन पाठ्यक्रम में लाना उचित होगा। इस बात को दो-तरफा देखा जा सकता है। हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन और प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी।

 

 हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन-

 इस के अन्तर्गत  पाठ्यक्रम के परंपरागत युनिट्स को प्रबंधन की दृष्टि से पढ़ाया जा सकता है। जैसे रामचरितमानस का सोश्यल एंड फैमिली बिहेव्रियल मैनेजमैंट की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। चूँकि रीतिकालीन कविता में धन-प्राप्ति कवियों का एक प्रमुख उद्देश्य रहा था। साथ ही परंपरागत रूप से हीन काव्य के रूप में जाना जाने वाला चित्र-काव्य उसमें बहुतायत से लिखा गया था। वह अपने स्वरूप तथा प्रकृति में विज्ञापन की दृष्टि से नए ढंग से पढ़ाया जा सकता है। प्रयोजन मूलक पाठ्यक्रमों में, इस दृष्टि से रीतिकाल का अध्ययन किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य विषयों पर भी सोचा जा सकता है। आज यह इसलिए भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि समाज तथा व्यवहार-जगत में स्पष्ट दिखाई पड़ते मूल्य-ह्रास तथा मूल्य-परिवर्तन तथा बाज़ार की अंधी तथा तेज़ दौड़ में हमारे परंपरागत साहित्य के पाठ्यक्रमों पर एक प्रश्न-चिह्न लगता जा रहा है। अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रमों में प्रयोजन मूलक, भाषा तथा साहित्य के पाठ्यक्रमों सें किसी भी प्रकार का संघर्ष इसलिए नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि वहाँ सोच का लचीलापन अधिक है और साथ ही शाश्वतता के भ्रम-मूलक विचारों से वे मुक्त हैं। अथवा टिके रहने के लिए वे आगे बढ़ने में किसी भी प्रकार का परहेज़ नहीं करते।

 

 

प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी-

प्रबंधन के पाठ्यक्रम का एक उद्देश्य यह है कि उत्पादन तथा कार्य विधि(ऑपरेशनल) की दृष्टि से नए विषयों को इसमें जोड़ा जाए। चूँकि उत्पादन का अंतिम सिरा ग्राहक है, अतः ग्राहक की भाषा अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्य विधि का संबंध भी केवल अंग्रेज़ी के जानकारों या किसी एक भाषा विशेष के जानकारों की बपौती नहीं है, अतः इस पाठ्य क्रम में हिन्दी के समावेश की स्थति सहज ही बनती है, जहाँ तक भारत जैसे देश का प्रश्न है।

 

Ø            अगर प्रबंधन को प्रभावक बनाना है(इफेक्टिव मैनेजमैंट) तो हिन्दी से बेहतर कोई भाषा काम नहीं आ सकती। प्रबंधन की प्रकृति तथा संभावनाओं में यह एक पाठ्य बिन्दु है।

 

Ø            नए लोगों की नियुक्ति में भाषा का एक महत्वपूर्ण रोल है। बीरबल की उस कथा को याद रखना चाहिए कि व्यक्ति आपत् काल में केवल अनी भाषा में ही अभिव्यक्त होता है। तथा जब उसे औचक पकड़ना हो तब केवल उसकी अपनी भाषा के द्वारा ही ऐसा संभव हो पाता है। देश के संदर्भ में भी यह सच है। आपत् काल में किसी भी देश की नब्ज को उसकी भाषा के द्वारा ही समझा जा सकता है। ख़ास कर जब वह एक लोकतांत्रिक देश हो।

 

Ø             किसी भी संस्थान में नियुक्ति के लिए जो परीक्षाएं ली जाती हैं उनमें उसका विषय गत ज्ञान अवश्य ही अंग्रेजी में मालूम किया जा सकता है। परन्तु व्यक्ति की आंतरिक ताकत,  उसके स्वभाव तथा उसके चरित्र का वास्तविक परीक्षण उसकी अपनी भाषा में उससे बातचीत कर के ही लिया जा सकता है। परीक्षण का यही आधार किसी भी कंपनी की उन्नति  का आधार बन सकता है।

 

Ø            मार्केटिंग, विज्ञापन, औद्योगिक संबंध एवं निजी प्रबंधन कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिन्दी की एक महत्व पूर्ण भूमिका है। प्रबंधन में अब तक प्रयुक्त परंपरागत भाषा अंग्रेज़ी का तुलना में हिन्दी किस तरह बेहतर परिणाम ला सकती है, ऐसे विषयों पर शोध करवाने चाहिए ताकि वस्तु स्थिति का पता चल सकता है।

 

Ø            इनमें सबसे मौजूं तथा महत्वपूर्ण मुद्दा नेतृत्व एवं संप्रेषण का है। जैसे कम्युनिकेशन स्किल्स इन इंग्लिश का चलन है,  वैसे अब कम्युनिकेशन स्किल्स इन हिन्दी का समय आने वाला है। बल्कि आ गया है। हमारी सरकार भले ही अंग्रेज़ी पर भार रख कर अनेक आयोजन कर रही है। इस बात की चिंता कर रही है कि उसके कर्मचारी अच्छी अंग्रेजी में बात करें। पर इस मामले में तो यही कहा जा सकता है कि हमारी नींद देर से खुली है। वह समय पीछे निकल चुका है और हम अपने उसी पुराने समय के अनुसार जीवन जी रहे हैं। छठी शताब्दी में जगे बुद्ध 21 वीं शताब्दी में छठी शताब्दी के अनुसार रहेंगे तो पिछड़े ही कहलाएंगे। अब तो समय भारत के लिए हिन्दी का ही है। अगर राष्ट्र-प्रेम नहीं तो बाज़ार ही इस बात को सिखलाएगा तथा सिद्ध करेगा।   

 

Ø            नेतृत्व तभी सफल होता है जब अपनी भाषा में किया जाता है। सोनिया गांधी तथा लालू प्रसाद जी इसके अच्छे उदाहरण है।

              यह कुछ आरंभिक सोच है जिस पर भविष्य में काम करने की इच्छा है।

                                                                                रंजना अरगड़े

एच-72, सचिन टॉवर्स, सैटेलाइट

अहमदाबाद, गुजरात-380015

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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