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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 हिंदी-विश्व

 

हिन्दी और विज्ञान लेखन


  डॉ. डी.डी.ओझा

 

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्प, कविता, नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। प्रस्तुत है विज्ञान लेखन पर सारगर्भित आलेख - संपादक


 

आज के युग में विज्ञान के ज्ञान को जन साधारण तक पहुँचाने का कार्य कितना महत्वपूर्ण है, इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। विज्ञान के सरल ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना विदेशी भाषा के द्वारा  नहीं हो सकता और न ही विकास का मार्ग ही प्रशस्त हो सकता है। इस संदर्भ में भारतेन्दु हरिशचन्द की निम्न पंक्तियाँ सार्थक हैं-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय के शूल।।

 

ऐसा विज्ञान जो जनमानस के ज्ञानवर्द्धन के लिए रोचक ढंग से लिखा कहा या प्रदर्शित किया जाए जिससे कि सैद्धांतिक पक्षों में उलझे बिना वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी हो सके, लोकप्रिय विज्ञान कहलाता है। विज्ञान, साहित्य से भिन्न होता है तथा इसमें मनचाहे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। विज्ञान अपने आप में एक अनुशासित विषय है तथा इसकी अपनी भाषा होती है। इसमें तकनीकी शब्दावली का ही प्रयोग अपेक्षित है जिसमें शब्दार्थ एवं भावार्थ दोनों एक ही होते हैं। अतः जो लोग यह तर्क देते हैं कि शब्दावली आयोग द्वारा निर्धारित की गई पारिभाषिक शब्दावली क्लिष्ट है, सरलीकरण होना चाहिए, उन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि शब्द कभी क्लिष्ट नहीं होते हैं। शब्द हमेशा परिचित एवं अपरिचित ही होते हैं। जितना-जितना उनसे परिचित होने का अभ्यास होता रहेगा, वे सरल लगने लगेंगे।

 

आज अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा ऐसे तथ्यों और शब्दों का पता लगाया जा रहा है जिन्हें जन सामान्य की भाषा में व्यक्त ही नहीं किया जा सकता है, जैसे क्वांटम सिद्धांत, पार्टिकल फिजिक्स अथवा वनस्पति विज्ञान में पौधों के वर्गीकरण से संबंधित कुलों के नाम, ऐसे शब्दों को हिन्दी के किसी विशेष शब्द द्वारा नहीं समझाया जा सकता है। इनका ज्यों का त्यों प्रयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है क्योंकि ये जन मानस में प्रचलित हो चुके हैं, जैसे हारमोन, विटामिन, एक्स-रे, अल्ट्रासाउन्ड, कम्प्यूटर, इंटरनेट, जीनोम आदि।

 

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्फ, कविता, नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। बच्चों में वैज्ञानिक रूचि एवं जागृति उत्पन्न करने के लिए तो ये विज्ञान कथाएँ बहुत ही प्रभावी माध्यम हैं। अतःएव बाल विज्ञान कथा लेखन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हिन्दी विज्ञान लेखन में नाटक विधा का भी समावेश हो चुका है। इसके द्वारा वैज्ञानिक जानकारी देने, अवैज्ञानिक भ्रांतियों का निवारण करने तथा विज्ञान में रूचि उत्पन करने का सफल प्रयास किया जा सकता है। विज्ञान लेखन की एक विधा `चम्पू' भी है। इस शैली में गद्य तथा पद्य दोनों का उपयोग होता है। मोटेतौर पर इसे लोग `नौटंकी' विधा भी कहते हैं। आजकल साक्षरता के प्रचार में दूरदर्शन पर अनेक विज्ञापन इसी शैली में आते है। विज्ञान लोकप्रियकरण के सिलसिले में आयोजित नाटकों एवं नुक्कड़ नाटकों में यह विधा उपयोगी होती है। इसमें वार्तालाप के बीच-बीच में, प्रभावी कविताओं तथा शेर-शायरी का उपयोग किया जाता है। विज्ञान लेखन को ललित बनाने में यह शैली अत्यन्त ही उपयोगी है।

 

संचार माध्यमों में विज्ञान लेखन

विज्ञान लेखन कई विधाओं-कहानी, गल्प, कार्टून, कविता, पहेली चुटकुले, नाटक, कथा आदि में मिलता है।

संचार माध्यम : रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्र में कुछ विशिष्टता है।

देहाती क्षेत्रों में रेडियो आज भी बहुत लोकप्रिय संचार माध्यम है। आकाशवाणी द्वारा समय-समय पर विज्ञान वार्ताएँ, कृषि एवं विज्ञान समाचार, मौसम संबंधी जानकारी सुलभ कराई जाती हैं। इसमें विशेषज्ञों से आलेख अथवा उन्हें परिचर्चा में आमंत्रित किया जाता है। आकाशवाणी द्वारा ज्वलंत समस्याओं एवं नवीन विषयों-एड्स, लेसर चिकित्सा, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या नियंत्रण, गर्भावस्था एवं स्वास्थ्य सुरक्षा, कम्प्यूटर सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी पर विज्ञान नाटक, कविताएँ आदि भी आमंत्रित की जाती हैं।

 

रेडियो पर कार्यक्रम देते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि आपके एवं श्रोता के बीच दीवार न हो। आपकी बात तभी श्रोता के मन में उतरेगी जब वह उसके काम की होगी, उसकी जानकारी बढ़ाती होगी और जिज्ञासा शांत करती होगी। श्रोता आपके सामने नहीं है। उस तक मात्र आपकी आवाज़ ही पहुँच रही है। अतः आपके सम्प्रेषण में यदि जान है तो वह आपकी बात को कभी अनसुना नहीं कर सकता। अतः आप ऐसे कार्यक्रम बोलचाल की भाषा में लिखें व पढ़ें। लिखने की भाषा में तो एक प्रबद्धता होती है परंतु बोलते समय यह जरूरी नहीं कि व्याकरण के नियमों के अनुसार ही वाक्य मुँह से निकलें।

 

अतः विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का ध्यान रखते हुए आप बोलने की भाषा ही लिखिए, न कि लिखने की भाषा। यदि आप स्वयं वार्ता दे रहे हैं तो आप उसे आलेख के रूप में न पढ़ें वरन बोलें, क्योंकि बतकही का एक अलग ही रस होता है, जो आपकी वार्ता में नहीं हुआ तो उसे सुनेगा कौन?

 

आप विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का खास ध्यान रखें। बच्चों के लिए वार्ता है तो भारी शब्द, लंबे वाक्य, संयुक्ताक्षर वाले शब्दों से बचें। आँकड़ों के मायाजाल से बचे। युवाओं के लिए संबोधित कार्यक्रमों में उनकी आकांक्षाओं और सपनों के अनुरूप विज्ञान की नयी-नयी दिशाओं का बोध कराने वाली जानकारी होनी चाहिए।

 

एक बात का ध्यान रखें कि आपकी वार्ता किसी अंधविश्वास का समर्थन नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह वैज्ञानिक चेतना जागृत करने में बाधक होता है। इसके अतिरिक्त आप समाचार पत्रों में, पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान स्तंभ के अन्तर्गत ऐसा क्यों होता है, बूछो तो जाने, विज्ञान पहेली, विज्ञान कविता आदि भी लिख सकते हैं।

 

·         अपना वैज्ञानिक ज्ञान परखिए-चार संभावित उत्तर देते हुए विविध विषयों पर 15-20 प्रश्न बनावें।

·         खेल-खेल में विज्ञान-साइंस मॉडल।

·         विचित्र विज्ञान रहस्यों से संकलित समाचार।

·         ऐसा क्यों होता है-मेंहदी का रंग, जुगनू की चमक, कम्प्यूटर की प्रणाली, दांत की सीमेन्ट।

·         विज्ञान हमारे आस-पास प्रयोग दिखावें।

·         विज्ञान कार्टून-चित्रों एवं कार्टून द्वारा विज्ञान विषयक जानकारी।

·         क्या और कैसे - वैक्सीन

·         विज्ञान क्व़िज।

 

आज के युग में विज्ञान लेखन में लेखकों को निम्न बिन्दुओं पर ज़रूर विचार करना चाहिए-

·         लेखक को विषय वस्तु का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।

·         लेखकों को पाठकों के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक स्तर का भी ज्ञान रखना चाहिए।

·         लेखों की भाषा सरल, सुबोध तथा जन सामान्य की समझ की होनी चाहिए।

·         इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रयोग शब्दावली के प्रचार-प्रसार के लिए करना चाहिए।

·         विज्ञान के ज्वलंत विषयों में लोकोपयोगी साहित्य का सृजन होना चाहिए।

·         वरिष्ठ वैज्ञानिकों को अँग्रेज़ी का मोह त्याग कर हिन्दी में लेखन करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिए।

 

अंत में यह कहना चाहूँगा कि आज हिन्दी में विज्ञान का भविष्य बहुत उज्जवल हो चुका है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केन्दीय निदेशालय एवं हिन्दी ग्रंथ अकादमियों तथा स्वयं सेवी संस्थाओं प्रमुखत विज्ञान परिषद् प्रयाग ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज हिन्दी में विज्ञान विषय पर लगभग 3000 से अधिक लेखक विद्यमान हैं जिनमें 150 महिलाएँ भी सम्मिलित हैं तथा हिन्दी में विभिन्न विज्ञान विषयक लगभग एक सहस्त्र पुस्तकें प्रकाशित भी हुई हैं। आज हमें आत्मविश्वास तथा निष्ठा की ज़रूरत है। जब तक हर विज्ञान प्रेमी नित्य ही हिन्दी में लिखेगा नहीं तब तक प्रगति मंद रहेगी। इस संबंध में हमारे मनीषियों का भी यही सुझाव है कि हिन्दी का विकास तभी संभव है जब यह शीघ्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान की भाषा बन जाए। तो आइये, राज्यादेश की अनुपालना करने का संकल्प लें और हिन्दी माँ की गरिमा बढ़ायें।

डॉ. डी.डी.ओझा

'गुरूकृपा', ब्रह्मपुरी, हजारी चबूतरा,

जोधपुर, राजस्थान

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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