साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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 गीत

मैं जवानी पूजता हूँ

 

मैं जवानी पूजता हूँ

है गगनचुम्बी पहाड़ों सा अडिग विश्वास मेरा

खेलता जिसके शिखर पर रहा आशा का सवेरा

क्या धरा के पत्थरों से मैं भला तोलूँ कलेजा

मौत की भीषण बलाएँ आसमानी पूजता हूँ

 

सृष्टि जिसके ताप से व्यक्तित्व अपना नापती है

दौड़ जिसकी देखकर तक़दीर भय से काँपती है

रंग उठे संसार जिसकी चार बूँदों में सिमटकर

उस उबलते ख़ून की उठती जवानी पूजता हूँ

 

वृद्ध कायरता जवानी को समझती खेल केवल

मानता हूँ खेल ही है यह उमंगों का रणस्थल

पर जवानी खेलती है आग की चिनगारियों से

ज़िंदगी के खेल की जलती निशानी पूजता हूँ

स्व. विजय देव नारायण शाही

 

शाही तीसरे सप्तक(1958) के प्रमख  कवि थे । जन्म-7 अक्टूबर, विजय दशमी, 1924, कबीर-चौरा वाराणासी, मृत्यु,-5 नवंबर, 1982, बैंक रोड़, इलाहाबाद । प्रमुख कृतियाँ-मछली घर, साखी, जायसी, साहित्य और साहित्यकार का दायित्व आदि ।

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छंदकार

माह के छंदकार

संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें

(एक, दो, तीन, चार, पाँच)

गीत

स्व. विजय देव नारायण शाही

डॉ. तिलकराज गोस्वामी

अवध बिहारी श्रीवास्तव

शंकर सक्सेना

ग़ज़ल

सजीवन मयंक

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