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संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें पाँच 'मैं हँ' कि 'मैं हँ', 'मैं हँ', 'मैं हँ आजका कबीर' पहले तो सुनके रो पड़े फ़िर हंस दिए कबीर
कांधे को छूके जब कहा 'कुबरा मेरे फ़कीर' मैं उसके घरके सामने उस दिन हुआ अमीर
बदलाव, बग़ावत या तरक्क़ी की ये तस्वीर नदियां सुनीं थीं दूध की, यां उठ रहा खमीर
असदुल्ला खां ने एक वज़ीफा क्या ले लिया मौकापरस्तों को तो जैसे मिल गयी नज़ी
'संवादघर' एल-76ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 ◙◙◙ |
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