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संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें तीन गो तीर छूटा पर हदों के दरमियान रहा न बेईमान हुए और न ईमान रहा
पहुँच भी पाऊँगा मंज़िल पे, ख़ुदपे शक है मुझे मैं आए दिन अगर उतारता थकान रहा
मैं बूढ़े घाघ तजुर्बों से बचके रहता हूँ यही है राज़ कि मासूम और जवान रहा
वो अपने बारे में थोड़ा तो जानते होंगे मुझे था उनपे, उन्हें ख़ुदपे ये ग़ुमान रहा
लो एक तीर भी साबुत-कमर नहीं निकला मैं ख़ामख्वाह ही ताने हुए कमान रहा
छुआके पाँव, दुआएं तो उसको दी मैंने वो टाँग खींच न ले, ये भी मुझको ध्यान रहा
'संवादघर' एल-76ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 ◙◙◙ |
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