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संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें एक जबसे धरती के पास रहता है चाँद अकसर उदास रहता है
आओ झुग्गी से ये पता पूछें किस गली में विकास रहता है
साफ़गोई से डरती भाषा में अलंकार औ' समास रहता है
जबकि कहने को कुछ नहीं रहता क्यूं ख़लिश है कि ख़ास रहता है
छोड़ पाया नहीं 'वरन' वरना कहने को वो बिन्दास रहता है
'संवादघर' एल-76ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95 ◙◙◙ |
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