साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच                                                                             SRIJANGATHA

।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

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  छंद

संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें

एक

जबसे धरती के पास रहता है

चाँद अकसर उदास रहता है

 

आओ झुग्गी से ये पता पूछें

किस गली में विकास रहता है

 

साफ़गोई से डरती भाषा में       

अलंकार औ' समास रहता है

 

जबकि कहने को कुछ नहीं रहता

क्यूं ख़लि है कि ख़ास रहता है

 

छोड़ पाया नहीं 'वरन' वरना

कहने को वो बिन्दास रहता है

   संजय ग्रोवर

'संवादघर'

एल-76ए, दिलशाद गार्डन,

दिल्ली-95

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छंदकार

माह के छंदकार

संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें

(एक, दो, तीन, चार, पाँच)

गीत

स्व. विजय देव नारायण शाही

डॉ. तिलकराज गोस्वामी

अवध बिहारी श्रीवास्तव

शंकर सक्सेना

ग़ज़ल

सजीवन मयंक

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