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रूठ गये दरवाज़े
क्योंकर बंद हुई खिड़कियाँ रूठ गये दरवाज़े
ज़हरीली हवायें बहती टूट रहे सन्नाटे गहरी नींद सोई सत्ता लेती है खर्राटे गली-मोहल्ले फैल रही ख़ौफनाक आवाज़ें
मौसम उगल रहा है आग उठ रही कई लपटें कितनी बेरहमी से बाज हर चिड़िया पर झपटे धृतराष्ट्र से अँधे राजे कुर्सियों पर विराजे
ख़ून के फव्वारे छूटे ढेर हुई दीवारें शासन को तब होश आया बढ़ गई जब पुकारें मरे हैं कितने दंगों में ले रहे है जायज़े
आकाक्षा, 91सी/8सी सर्वोदय नगर, भारद्वाज पुरम इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश – 211006 ◙◙◙ |
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