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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 गीत

रूठ गये दरवाज़े

 

क्योंकर बंद हुई खिड़कियाँ

रूठ गये दरवाज़े

 

ज़हरीली हवायें बहती

टूट रहे सन्नाटे

गहरी नींद सोई सत्ता

लेती है खर्राटे

गली-मोहल्ले फैल रही

ख़ौफनाक आवाज़ें

 

मौसम उगल रहा है आग

उठ रही कई लपटें

कितनी बेरहमी से बाज

हर चिड़िया पर झपटे

धृतराष्ट्र से अँधे राजे

कुर्सियों पर विराजे

 

ख़ून के फव्वारे छूटे

ढेर हुई दीवारें

शासन को तब होश आया

बढ़ गई जब पुकारें

मरे हैं कितने दंगों में

ले रहे है जायज़े

 

डॉ. तिलकराज गोस्वामी

आकाक्षा, 91सी/8सी

सर्वोदय नगर, भारद्वाज पुरम

इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश 211006

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छंदकार

माह के छंदकार

संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें

(एक, दो, तीन, चार, पाँच)

गीत

स्व. विजय देव नारायण शाही

डॉ. तिलकराज गोस्वामी

अवध बिहारी श्रीवास्तव

शंकर सक्सेना

ग़ज़ल

सजीवन मयंक

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