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।।सृजनगाथा।।

 

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वर्ष- 2, अंक - 17, अक्टूबर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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 ग़ज़ल

 

फिर परिंदे लौटकर जाने लगे

 

नये पत्ते डाल पर आने लगे ।

फिर परिंदे लौटकर जाने लगे ।।

 

जो अँधेरे की तरह डसते रहे

अब उजाले की क़सम खाने लगे ।

 

चंद मुर्दे बैठकर श्मशान में

ज़िंदगी का अर्थ समझाने लगे ।

 

उनके ऐनक टूटकर नीचे गिरी

दूर तक के लोग पहिचाने लगे ।

 

जब सियासत का नया नक़्शा बना

थे जो अंधे लोग चिल्लाने लगे ।

 

आईनों की साफगोई देखकर

सामने जाने से कतराने लगे ।

 

जब कोई सच्चाई निर्वसन होने लगी

लोग उसको वस्त्र पहनाने लगे ।

सजीवन मयंक

251- शनिचरा वार्ड - 1, नरसिंह गली

होशंगाबाद, मध्यप्रदेश

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 छंदकार

माह के छंदकार

संजय ग्रोवर की पाँच ग़ज़लें

(एक, दो, तीन, चार, पाँच)

गीत

स्व. विजय देव नारायण शाही

डॉ. तिलकराज गोस्वामी

अवध बिहारी श्रीवास्तव

शंकर सक्सेना

ग़ज़ल

सजीवन मयंक

 

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