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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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विचार-वीथी

 

 

महान देश महान लोग


अशोक कुमार वशिष्ठ

 

ब हम किसी देश की बात करते हैं तो हम उस देश के धर्म, उस देश की सभ्यता और उस देश की संस्कृति की बात करते हैं किसी देश के धर्म, किसी देश की सभ्यता और किसी देश की संस्कृति से ही किसी देश की महानता या उसके लोगों की महानता का पता चलता है कोई भी देश पैसों से, कोई भी देश ताकत से या कोई भी देश चमक-दमक से महान नहीं हो जाता उसे महान बनाने वाला उसका धर्म होता है उसे महान बनाने वाली उसकी सभ्यता होती है उसे महान बनाने वाली उसकी संस्कृति होती है देशों के हालात बदलते रहते हैं लोगों के हालात बदलते रहते हैं लेकिन जिस धर्म, जिस सभ्यता और जिस संस्कृति की नींव पर कोई देश या उसके लोग खडे होते हैं, वह नहीं बदलती नींव नहीं बदलती चाहे वह पुरानी हो जाए चाहे वह कूडे क़रकट से भर जाए चाहे उसके ऊपर मंदिर बन जाए चाहे उसके ऊपर मरघट बन जाए चाहे वह गुलाम होचाहे वह आज़ाद हो किसी भी खंडहर से, उसके बिखरे सामान से पता चल जाता है कि यहा पर बनी हुई इमारत कितनी सुंदर, कितनी विशाल और कितनी बुलंद थी किसी से सुनने या पूछने की ज़रूरत नहीं पडती भारत और भारतीयों को देखकर और समझकर या यूं कहें कि बिखरे हुए, थके हुए भारत और भारतीयों को देखकर और समझकर, उनकी महानता छुपी नहीं रहती उस महान देश और उसके महान लोगों के बारे में देख, समझ और जानकर, किसी भी ईमानदार और होशमंद इंसान का सिर, उनके प्रति श्रध्दा और सम्मान से अपने आप झुक जाता है चाहे वह इंसान किसी भी धर्म या देश का क्यों न हो वह महान भारत और महान भारतीयों को नमस्कार करने से नहीं चूकता भारत सचमुच महान है उसके लोग सचमुच महान हैं वे हर क्षेत्र में महान हैं सिर से पाव तक महान हैं

 

युग बदलते हैं हालात बदलते हैं और लोग भी बदलते हैं इसका सबूत इतिहास है, जो हमें सतयुग, त्रेता और द्वापर के विषय में थोडी बहुत जानकारी देता है उन युगों के लोगों के विषय में थोडी बहुत जानकारी देता है और इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि पिछले तीनों युगों में, भारत और भारत के लोग हर क्षेत्र में शिखर पर रहे हैं तीनों युगों में उनका डंका बजता रहा है उन्हें उनके अच्छे कर्मों और अच्छे व्यवहार के कारण, संसार से सम्मान मिला है, संसार से प्रशंसा मिली है और संसार से प्यार मिला है उन तीनों युगों की बदौलत ही, आज कलियुग में भी भारत और भारतीयों को श्रेष्ठ समझा जाता है इसका कारण है उनका धर्म, उनकी सभ्यता और उनकी संस्कृति और जब तक यह संसार है, तब तक महान भारत और महान भारतीयों का यह रूतवा, यह स्थान कोई नहीं ले सकता और न ही हासिल कर सकता है यदि यह संसार एक फूल है तो भारत उस फूल रूपी संसार की खुश्बू है यदि यह संसार एक शरीर है तो भारत उस शरीर रूपी संसार की धडक़न है अपना मूल्य खुद आकने से कोई महान नहीं बन जाता जोर जबरदस्ती करने से भी कोई महान नहीं बन जाता महान बनने के लिए इंसान में महानता के गुण होने चाहिए जो युगों युगों की मेहनत, युगों युगों की साधना और युगों युगों की तपस्या के बाद मिलते हैं

 

जब भी युग बदलत है, बहुत से परिवर्तन भी होते हैं हर लिहाज से, हर क्षेत्र में परिवर्तन होते हैं जिस तरह एक फलों और फूलों से भरे वृक्ष को पतझड से गुज़रना ही पडता है उसी तरह इस संसार को भी चारों युगों से गुज़रना ही पडता है चारों युगों का सामना करना ही पडता है चाहे कोई खुश हो या नाराज़ चाहे कोई सुखी हो या दुःखी चाहे कोई जीए या मरे जिस तरह मौसमों के परिवर्तनों का सामना करने के बाद भी, किसी वृक्ष के बीज का, उसके स्वभाव का नाश नहीं होता उसी तरह किसी देश और उसके लोगों का स्वभाव, उनका धर्म, उनकी सभ्यता और उनकी संस्कृति नहीं बदलती लेकिन नई हवा का, नए चलन का उनपर थोडा बहुत असर ज़रूर पडता है नए युग का और नए समय का  उनपर प्रभाव ज़रूर पडता है जिससे उनके उठने बैठने में, खाने पीने में, रहने सहने में थोडा बहुत फर्क आ ही जाता है लेकिन जैसे ही उन्हें अपने स्वभाव, अपने धर्म, अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति की याद आती है तो वे उसे स्वीकार करने से परहेज़ नहीं करते उसे फिर से गले लगाने से नहीं डरते यह असर अस्थायी होता है, स्थायी नहीं आज उसी परिवर्तन से संसार गुज़र रहा है आज उसी परिवर्तन से भारत गुज़र रहा है यह संसार का या भारत का दुर्भाग्य नहीं है बल्कि यह प्रकृति का नियम है प्रकृति का स्वभाव है, जिसे होना ही होना है, जिसे घटना ही घटना है गुरूवाणी में इसपर बडे सुंदर शब्द कहे गए हैं-

                                      

राम गयो रावण गयो, जा का बहु परिवार,

कहो नानक थिर कुछ नहीं, सुपने ज्यों संसार

चिंता ता की कीजिए, जो अनहोनी होए,

इह मारग संसार में, नानक थिर नहीं कोए

 

आज जिस परिवर्तन और जिस दौर से भारत और भारतीय गुज़र रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि भारतीय अपना धर्म और कर्म भूल चुके हैं वे अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति भूल चुके हैं क्योंकि आज ज्यादातर भारतीय दूसरों की आखों से देख रहे हैंदूसरों की बुध्दि से सोच रहे हैं और दूसरों की आंखें और बुध्दि चमक दमक देखने और समझने की ही अभ्यस्त हैं उनमें सिर्फ ऊपर ही ऊपर देखने और समझने की क्षमता है यही कारण है कि आज भारत और भारतीयों को देखकर, शक सा होने लगता है कि क्या यही रिशियों और मुनियों की संतान है? क्या यही राम और कृष्ण के वारिस हैं? क्या यही नानक और गोविन्द सिंह की औलाद है? क्या यही वे महान भारतीय हैं, जिनकी महानता के गुण सारा संसार गाता है? यकीनन हम हैं तो वही महान भारतीय, लेकिन हम स्वयं से ज्यादा दूसरों पर विश्वास करने लग गए हैं दुर्भाग्य से हम खुदको छोटा और दूसरों को बडा समझने लग गए हैं बदकिस्मती से हम खुदको गलत और दूसरों को सही समझने लग गए हैं बदकिस्मती से हम दूसरों के धर्म, दूसरों की सभ्यता और दूसरों की संस्कृति को, अपने धर्म, अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति से बेहतर समझने लग गए हैं न जाने कब हमने अपनी आखें मूंद लीं और बिना कुछ सोचे विचारे, दूसरों के इशारों पर चलने लगे? न जाने कब और कैसे हम अपना महत्व, अपनी क्षमता भूल गए? न जाने कब और कैसे हम अपनी अक्ल से ज्यादा, दूसरों की नकल करने में दिलचस्पी लेने लगे? न जाने कब, क्यों और कैसे हमने कर्मों से ज्यादा, कल्पनाओं को, बहमों को अहमियत दे दी? यह सब कैसे हो गया? पर हो गया वह महान भारत और महान भारतीय, जिनका अनुसरण सारा संसार करता था, वह अब दूसरों का अनुसरण करने लग गए बिना अच्छा और बुरा विचारे बिना सही और गलत समझे भारतीयों को जागना होगा भारतीयों को अपनी आखें खोलनी होंगी. भारतीयों को अपनी बुध्दि का इस्तेमाल करना होगा भारतीयों को अपनी क्षमता, अपनी काबलियत पर भरोसा करना होगा और उसपर अमल करना होगा यदि उन्हें अपनी महानता को कायम रखना है तो उन्हें अपने धर्म, अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति को मजबूती से पकडना होगा उसपर चलना होगा. हर युग में, हर सदी में, हर काल में, हर देश में और हर दशा में 

अशोक कुमार वशिष्ठ

103 chelveston crescent
Aldermoor, Southampton
SO16 5SD
Hampshire, ENGLAND

 

 

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