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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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अमेरिका की चिट्ठी-1

 

     

  ईश्वर सत्य है !


लावण्या शाह


      1790 में प्रथम काला सागर पार कर के मद्रास  के एक अनाम व्यक्ति, मेसेच्य्सेट्स के सेलम की गलियों में पहली बार पहुँचे थे - 1820 से 1898 तक 523 और लोग आ पाये। 1993 तक 7000 और आये ।1971 में, काँग्रेस ने इस पर रोक लगा दी । 1943 में जब चीन के अप्रवासियों पर से रोक उठाई गई तब प्रेसीडेन्ट रुज़वेल्ट के बाद आये ट्रूमेन के शासन काल में 3जुलाई 1946 में " एशियन अमेरीकन सिटीज़नशीप एक्ट " पारित किया था। "हिन्दी असोशीयेन ओफ पसेफिक कोस्ट" ने 1 नवम्बर 1913 में "गदर" पत्रिका में घोषणा की, " हम आज विदेशी भूमि पर अपनी भाषा में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हैं ।" - इससे संबंद्ध लाला हरदयाल, दलित श्रमिक मँगूराम और 17 वर्षीय इंजीनियर करतार सिंह सरापा जैसे हिम्म्ती कार्यकर्ता  थे  -

 

16 नवम्बर 1915 के अपयशी दिवस, 19 वर्षीय सरापा को भारत में, फाँसी पर चढाया गया था । शहीद भगत सिंह ने सरापा को अपना गुरु माना था। सरापा का अँतिम गीत था -


"
यही पाओगे, मशहर में जबाँ मेरी बयाँ मेरा,
मैं बंदा हिन्दीवालों का हूँ खून हिन्दी, जात हिन्दी,
यही मज़हब, यही फिरका, यही है, खानदान मेरा !
मैं इस उजडे हुए भारत के खंडहर का ही ज़र्रा हूँ
यही बस पता मेरा, यही बस नामोनिशाँ मेरा !"
ना जाने सरापा की अस्थियाँ गंगा मेँ मिलीं या नहीं ??

 

पर, हिन्दी भाषा भारती  तो संस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है !

ऐसा सँत विनोबा भावे जी का कहना है और आज यह हिन्दी की भागीरथी विश्व के हर भूखंड में बहती है जहाँ कहीं एक भारतीय बसता है ...मेरी कविता में मैंने कहा है -

 

" हम भारतीय जन मन में कहीं गंगा छिपी हुई है "
"
गंगा आये कहाँ से रे गंगा जाये कहाँ रे,

लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे "


      सौम्य स्वर लहरी हेमंत दा की सुनतीं हूँ तब हिन्दी भाषा का मनोमुग्धकारी विन्यास मन को ठीठका कर , स्तंभित कर देता है ..

आज हिन्दी भाषा से मेरे संबंध की ओर एक विहंगम दृष्टिपात करते हुए स्मृति में एक शब्द बार-बार आ रहा है - "नमकीन " !

 

मेरे पूज्य पापाजी हम चारों भाई बहनों के साथ हमेशा हिन्दी में ही बतचीत किया करते थे। इस प्रकार हिन्दी मेरे शैशव से मिली, विरासत है. हाँ अम्मा गुजराती भाषा का ही उपयोग किया करतीं थीं चूँकि वे गुजरात से थीं। इस तरह गंगा जमनी भाषा का प्रभाव मुझ पर बना रहा है जो  आज तक कायम है।


      तो हाँ, जैसे मैं आपसे कह रही थी ना कि, "नमकीन" शब्द आज क्यूं याद आ रहा है ? तो कारण था, कि पापा बंबई से देहली जा रहे थे और हर बच्चे से वे पूछ रहे थे कि,

"बताओ तुम्हारे लिय देहली से क्या लाऊँ ? "

मुझे पापा जी के जाने का बहुत दुख था परंतु आँसुओं के बीच अचानक बोली," मेरे लिये "नमकीन" लाना पापा !"

पापा जी प्रसन्न हो गये सुनकर और मुस्कुराते हुए अम्मा से कहा," सुन रही हो, लावण्या को नमकीन चाहिये !"

 खैर ! जब वे लौटे तब बडे चाव से उन्होंने एक दालमोंठ का पैकेट मेरी तरफ, बढाते हुए कहा, "ये लो तुम्हारा नमकीन !" और मैं फूट-फूट कर रोने लगी !

अम्मा, पापाजी दोनों घबड़ा गये कि ऐसा क्यूं हुआ? ये लडकी रोने क्यूं लगी ? अम्मा ने गोद में भरकर जब प्यार से सहलाते हुए पूछा कि "रो क्यों रही है हम्म लावण्या ?

यही तो माँगा था न तुमने - "नमकीन " ?

तो रोते हुए मैंने कहा " ये नमकीन नहीं है ! "

तब अम्म समझ गईं कि, मुझे भारी भरकम, या नये-नये हिन्दी या अन्य भाषाओं के शब्द, सुनते ही याद हो जाते थे और उनका प्रयोग मैं अक्सर मेरी हर बातचीत में डाल दिया करती थी। आज भी जिसका नतीज़ा ये निकला था कि बिना समझे हुए कि "नमकीन " किसे कहते हैं,

मैंने उस की फरमाइश कर दी थी !

कैलेन्डर के पन्ने सरसर्राते हुए, सालों की समंदर सी फैली धारा को पार करते आज २००७ मई माह के समापन पर रुकी है -

 

 और जून माह के बाद जुलाई में, अंतराष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन न्युयोर्क शहर में सम्पन्न होने जा रहा है।

य़ हिन्दी का "परदेस" की भूमि पर हो रहा "महायज्ञ "ही तो है। पिछले कई इसी तरह के सम्मेलनों में हिन्दी की महान कवियत्री आदरणीया श्री महादेवी वर्मा जी ने भी समापन भाषण दिया था। भाषा-भारती "हिन्दी" को युनाइटेड नेशन्स में स्थान मिले ये कई सारे भारतीय मूल के भारतीयों की एक महती इच्छा है। ये स्वप्न सत्य हो ये आशा आज बलवती हुई जा रही है। इस दिशा में बहुयामी प्रयास यथासंभव  जारी हैं। देखते हैं कि न्युयार्क शहर में स्थित ये अन्तर्राष्ट्रीय संस्था U.N.O.( यु.एन.ओ. ) कितनी शीघ्रता बरतता है "हिन्दी" को स्वीकार करने में !


न्युयोर्क शहर का इलाका जो मुख्य है उसे "मेनहेट्टन " कहा जाता है -

देखिये ये लिंक  - http://en.wikipedia.org/wiki/Manhattan


इस का बृहद प्रदेश " न्यूयार्क " कहा जाता है --

या उसका चहेता नाम है'बीग ऐपल" या फिर "गोथम सीटी '-- http://en.wikipedia.org/wiki/New_york_city

 

 भौगोलिक स्तर पर ये पाँच खंडो मे बँटा हुआ है - उन्हें "बरोज़" कह्ते हैं, जिनके नाम हैं - ब्रोन्क्स, ब्रूकलीन,मनहट्टन, क्वीन्स और स्टेटन आइलेन्ड।

 

इसे डच मूल के लोगों ने 1625 में बसाया था और 322 क्षेत्रफल या 830 किलोमीटर में फैला यह विश्व का बृहदतम शहरी इलाका है जिसकी आबादी 18.8 कोटि जन से अधिक है. यहाँ विश्व के हर प्रदेश के लोग आपको दीख जायेंगे । ऐसे महानगर में भारतीय दूतावास के सौजन्य से व भारतीय विध्या भवन के संयोजन से जिसके कर्णधार श्रद्धेय डो.जयरामन जी हैं, हिन्दी का सम्मान होने जा रहा है।


    इस सम्मेलन में कई सारे लोग कमिटी में काम कर रहे हैं - स्वेच्छासे कार्य भार उठाये अपने रोजमर्रा के बहुआयामी, व्यस्त जीवन से समय प्रदान करते हुए सहर्ष सारी गतिविधियोँ मेँ हिस्सा ले रहे हैं । जाहिर है कि जो सारे हिन्दीवाले न्युयोर्क शहर के आस पास रहते हैं वे श्रमदान देने में सक्षम हैं ।

 

मेरी तरह हज़ारों मील दूरी के शहर में रहनेवाले हिन्दी प्रेमियों को इस समय बेसब्री से इंतज़ार करना ही नसीब है कि कब हम इस भव्य कार्यक्रम में शामिल होँगे !  उत्साह इस बात का भी है और एक तरह की उत्कंठा भी है कि, " क्या होगा वहाँ पर?"  आयोजन की सफलता पर संदेह नही है। परंतु ये भी शंका है, कि इस सम्मेलन के बाद क्या हिन्दी को सम्मानित दर्जा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा ? कि सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग की चेतना से जुडी हिन्दी भाषा भी सीमित दायरों में बंध होकर रह जायेगी?


     हिन्दी के उत्थान में कार्यरत अनेक हिन्दी प्रेमियों से वहाँ मुलाकात होगी ये तथ्य उत्साह दे रहा है"अभिव्यक्ति " व अनुभूति " की संपादिका मेरी सखा कवियत्री श्रीमती पूर्णिमा बर्मन जी सुना है शारजाह ( यु.ए.ई.) से पधार रहीँ हैं । जिनसे मेरी मुलाकात "काव्यालय" जाल घर के सौजन्य से करीब 1993 के करीब हुई - जब मैँने उनके दोहे वहाँ पढे और "ई- मेल"  से सम्पर्क किया था । काव्यालय यानी वाणी मुरारका जी ने स्थापित किया है। जिसे वे कलकत्ता से प्रेषित करतीं हैं और कई सारी हिन्दी काव्य रचनाओँ का सँग्रह काव्यालय पर है। उन्होंने प्रोध्योगिकी व विश्वजाल में हिन्दी के बढते कदम की नींव रखते हुए अथक परिश्रम किया है। वे खुद भी अच्छी कविताएँ लिखतीं हैं और अपने वेब-मगेज़ीन में निष्पक्षता से कई हिन्दी लिखनेवालों को स्थान देतीं आयीं हैं और हिन्दी के लिये गहरी सँवेदना रखतीं हैं।


    ख्यातनामा हास्य रस के सम्राट श्रीमान अशोक चक्रधर जी का आगमन भी संभाव्य है ! अनुमान है कि, वे कवि सम्मेलन में हमेशा की तरह छा जायेंगे और एक बार फिर, अपना लोहा मनवाते हुए सुननेवालों को हँसाते हुए लोटपोट करेंगे। उनकी हास्य कविता मे समाज की विषम परिस्थितियों को परखने की तीव्र दृष्टि है जो हल्के से बात कह जाती है और बाद में श्रोतागण देर तक सोचते रह जाते हैं !


      "सृजनगाथा" के भीष्मपितामह श्रीमान जयप्रकाश मानस जी के आगमन से हिन्दी के कार्य को बल मिलेगा। उनकी पैनी निगाह से विश्वजाल की कोई भी प्रगति, दिशा या आविष्कार अछूता नहीं ! वे बहुआयामी पत्रिका के सफल संपादक ही नही है, अपितु बडे धैर्य से छत्तीसगढ जैसे भारत के एक ग्रामीण व शहरी अँचलों की दोहरी संस्कृति को समेटे, अपने निबंधो में सँयत भाषा प्रयोग करते हुए, कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाते हैं । हिन्दी के इस महायज्ञ में इन सारे महानुभावों की " आहुति", " यज्ञ-ज्वाला"  को परिमार्जित करते हुए यशस्वी बनायेगी, ये मेरा विश्वास है।


     यहाँ अमरीका में बसे हुए श्री अनूप भार्गव जी, डॉ. अँजना संधीर जी, रससिद्ध कवि श्रीमान राकेश जी खँडेलवाल, कनाडा से कवियत्री श्रीमती मानोशी चटर्जी, श्री समीर लाल जी इत्यादी कई सारे लोगों के आने की संभावना है।


    भारत सरकार के बाहरी गतिविधियों के मंत्री मंडल ने ( External Affairs Ministry ) यह आँठवा -८वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, 13, 14 और 15 जुलाई के दिनों में न्यूयार्क में आयोजित करना तय किया तब स्थल का चुनाव हुआ " फैशन इन्स्टीट्य्ट ओफ टेक्नोलॉज़ी " ( जो कि 27 वीं गली 7 वें एवेन्यु पर स्थित है ), वहाँ सम्पन्न होना निश्चित किया गया है। उत्तर अमेरीका के प्रमुख संघ जैसे कि" अंतराष्ट्रीय हिन्दी समिति", "विश्व हिन्दी न्यास", "विश्व हिन्दी समिती"  इत्यादि को भारतीय विद्या भवन के अंतर्गत, इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।

 

हर हिन्दी भाषा के चाहनेवालों की दुआएं, प्रार्थनाएं संलग्न हैं कि आगे भी हिन्दी का मार्ग प्रशस्त होता रहे।
सँभावनाएँ कई हैं !! मार्ग, आगे, अनदेखा, अनचिन्हा है !! परंतु निस्वार्थ परिश्रम व हिन्दी प्रेम के सम्बल से लिपटा हुआ है। अगर हिन्दी भाषा जीवित रहेगी, फूलेगी - फलेगी तभी तो हमारी भारतीय सँस्कृति, हमारा वाङमय, हमारी धरोहर भी सुरक्षित रह पायेगी !  जीवन यापन की आपाधपी में, भारतमाता के बालक, दुनिया के सात समंदर पार कर के विभिन्न प्रेदेशों में जा बसे हैं !अपने त्योहारों को मनाते समय, वे भारत भूमि से सीधा संबंध स्थापित कर लेते हैं ।

 

गहरे महासागर के जल के ठीक बीचों-बीच एक शांत, द्वीप की तरह जहाँ भारतीय अस्मिता का "माटी का नन्हा दीप" अखंड ज्योति का प्रकाश फैलाता, अकँपित जलता है  - जिसकी ज्योति, मानस की ज्योति है। हमारे पुरखों के पुण्य की आस्था है !

 

 परमात्मा श्री कृष्ण से यही माँगती हूँ कि इस " दिये" का तेल कभी भी न घटे ! 2007 से इस का प्रकाश और भी प्रखर होकर विश्व की पीडित, दमित, थकी हुई प्रजा को भौगोलिक परिस्थितीयों से परे ले जाकर, आत्म विश्लेक्षण का अवसर दे । चिर शांति का पाठ दोहराया जाये जिस से "विश्व - शाँति " का बीज, पल्लवित हो कर,  भारत के बरगद की तरह हर प्राणी को छाँव देने की क्षमता, चिर स्थायी  करे !

 

अस्तु .........आइये, हम और आप, हर तरह की पूर्व ग्रंथि को खोलकर एकजुट होकर, यथासँभव योगदान करें ताकि हिन्दी भाषा की गरिमा फिर एक बार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के शब्दों को चरितार्थ करे -

 

" निज भाषा उन्नति ही उन्नति का मूल है "

आओ, प्रण करेँ हिन्दी सेवा का, हिन्दी प्रेम का !