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अमेरिका की चिट्ठी-1 |
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ईश्वर सत्य है ! लावण्या शाह
16 नवम्बर 1915 के अपयशी दिवस, 19 वर्षीय सरापा को भारत में, फाँसी पर चढाया गया था । शहीद भगत सिंह ने सरापा को अपना गुरु माना था। सरापा का अँतिम गीत था -
पर, हिन्दी भाषा भारती तो संस्कृत की ज्येष्ठ पुत्री है ! ऐसा सँत विनोबा भावे जी का कहना है और आज यह हिन्दी की भागीरथी विश्व के हर भूखंड में बहती है जहाँ कहीं एक भारतीय बसता है ...मेरी कविता में मैंने कहा है -
"
हम
भारतीय जन मन में कहीं गंगा छिपी हुई है " लहराये पानी में जैसे धूप-छाँव रे "
आज हिन्दी भाषा से मेरे संबंध की ओर एक विहंगम दृष्टिपात करते हुए स्मृति में एक शब्द बार-बार आ रहा है - "नमकीन " !
मेरे पूज्य पापाजी हम चारों भाई बहनों के साथ हमेशा हिन्दी में ही बतचीत किया करते थे। इस प्रकार हिन्दी मेरे शैशव से मिली, विरासत है. हाँ अम्मा गुजराती भाषा का ही उपयोग किया करतीं थीं चूँकि वे गुजरात से थीं। इस तरह गंगा जमनी भाषा का प्रभाव मुझ पर बना रहा है जो आज तक कायम है।
"बताओ तुम्हारे लिय देहली से क्या लाऊँ ? " मुझे पापा जी के जाने का बहुत दुख था परंतु आँसुओं के बीच अचानक बोली," मेरे लिये "नमकीन" लाना पापा !" पापा जी प्रसन्न हो गये सुनकर और मुस्कुराते हुए अम्मा से कहा," सुन रही हो, लावण्या को नमकीन चाहिये !" खैर ! जब वे लौटे तब बडे चाव से उन्होंने एक दालमोंठ का पैकेट मेरी तरफ, बढाते हुए कहा, "ये लो तुम्हारा नमकीन !" और मैं फूट-फूट कर रोने लगी ! अम्मा, पापाजी दोनों घबड़ा गये कि ऐसा क्यूं हुआ? ये लडकी रोने क्यूं लगी ? अम्मा ने गोद में भरकर जब प्यार से सहलाते हुए पूछा कि "रो क्यों रही है हम्म लावण्या ? यही तो माँगा था न तुमने - "नमकीन " ? तो रोते हुए मैंने कहा " ये नमकीन नहीं है ! " तब अम्म समझ गईं कि, मुझे भारी भरकम, या नये-नये हिन्दी या अन्य भाषाओं के शब्द, सुनते ही याद हो जाते थे और उनका प्रयोग मैं अक्सर मेरी हर बातचीत में डाल दिया करती थी। आज भी जिसका नतीज़ा ये निकला था कि बिना समझे हुए कि "नमकीन " किसे कहते हैं, मैंने उस की फरमाइश कर दी थी ! कैलेन्डर के पन्ने सरसर्राते हुए, सालों की समंदर सी फैली धारा को पार करते आज २००७ मई माह के समापन पर रुकी है -
और जून माह के बाद जुलाई में, अंतराष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन न्युयोर्क शहर में सम्पन्न होने जा रहा है। य़ हिन्दी का "परदेस" की भूमि पर हो रहा "महायज्ञ "ही तो है। पिछले कई इसी तरह के सम्मेलनों में हिन्दी की महान कवियत्री आदरणीया श्री महादेवी वर्मा जी ने भी समापन भाषण दिया था। भाषा-भारती "हिन्दी" को युनाइटेड नेशन्स में स्थान मिले ये कई सारे भारतीय मूल के भारतीयों की एक महती इच्छा है। ये स्वप्न सत्य हो ये आशा आज बलवती हुई जा रही है। इस दिशा में बहुयामी प्रयास यथासंभव जारी हैं। देखते हैं कि न्युयार्क शहर में स्थित ये अन्तर्राष्ट्रीय संस्था U.N.O.( यु.एन.ओ. ) कितनी शीघ्रता बरतता है "हिन्दी" को स्वीकार करने में !
देखिये ये लिंक - http://en.wikipedia.org/wiki/Manhattan
या उसका चहेता नाम है, 'बीग ऐपल" या फिर "गोथम सीटी '-- http://en.wikipedia.org/wiki/New_york_city
भौगोलिक स्तर पर ये पाँच खंडो मे बँटा हुआ है - उन्हें "बरोज़" कह्ते हैं, जिनके नाम हैं - ब्रोन्क्स, ब्रूकलीन,मनहट्टन, क्वीन्स और स्टेटन आइलेन्ड।
इसे डच मूल के लोगों ने 1625 में बसाया था और 322 क्षेत्रफल या 830 किलोमीटर में फैला यह विश्व का बृहदतम शहरी इलाका है जिसकी आबादी 18.8 कोटि जन से अधिक है. यहाँ विश्व के हर प्रदेश के लोग आपको दीख जायेंगे । ऐसे महानगर में भारतीय दूतावास के सौजन्य से व भारतीय विध्या भवन के संयोजन से जिसके कर्णधार श्रद्धेय डो.जयरामन जी हैं, हिन्दी का सम्मान होने जा रहा है।
मेरी तरह हज़ारों मील दूरी के शहर में रहनेवाले हिन्दी प्रेमियों को इस समय बेसब्री से इंतज़ार करना ही नसीब है कि कब हम इस भव्य कार्यक्रम में शामिल होँगे ! उत्साह इस बात का भी है और एक तरह की उत्कंठा भी है कि, " क्या होगा वहाँ पर?" आयोजन की सफलता पर संदेह नही है। परंतु ये भी शंका है, कि इस सम्मेलन के बाद क्या हिन्दी को सम्मानित दर्जा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा ? कि सिर्फ बुद्धिजीवी वर्ग की चेतना से जुडी हिन्दी भाषा भी सीमित दायरों में बंध होकर रह जायेगी?
हर
हिन्दी भाषा के चाहनेवालों की दुआएं,
प्रार्थनाएं संलग्न हैं कि आगे भी हिन्दी का मार्ग प्रशस्त होता रहे।
गहरे महासागर के जल के ठीक बीचों-बीच एक शांत, द्वीप की तरह जहाँ भारतीय अस्मिता का "माटी का नन्हा दीप" अखंड ज्योति का प्रकाश फैलाता, अकँपित जलता है - जिसकी ज्योति, मानस की ज्योति है। हमारे पुरखों के पुण्य की आस्था है !
परमात्मा श्री कृष्ण से यही माँगती हूँ कि इस " दिये" का तेल कभी भी न घटे ! 2007 से इस का प्रकाश और भी प्रखर होकर विश्व की पीडित, दमित, थकी हुई प्रजा को भौगोलिक परिस्थितीयों से परे ले जाकर, आत्म विश्लेक्षण का अवसर दे । चिर शांति का पाठ दोहराया जाये जिस से "विश्व - शाँति " का बीज, पल्लवित हो कर, भारत के बरगद की तरह हर प्राणी को छाँव देने की क्षमता, चिर स्थायी करे !
अस्तु .........आइये, हम और आप, हर तरह की पूर्व ग्रंथि को खोलकर एकजुट होकर, यथासँभव योगदान करें ताकि हिन्दी भाषा की गरिमा फिर एक बार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के शब्दों को चरितार्थ करे -
" निज भाषा उन्नति ही उन्नति का मूल है "
आओ,
प्रण
करेँ हिन्दी सेवा का,
हिन्दी प्रेम
का ! | ||||||||||