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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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संस्मरण

 

 

पं. भवानी प्रसाद मिश्र


विष्णु प्रभाकर

 

हसा पं. भवानी प्रसाद मिश्र का नाम स्मृति-पटल पर उभरते ही उनकी कविता गीत फरोश की पंक्तियाँ कानों में गूँजने लगती हैं, जी हाँ, जनाब मैं गीत बेचता हूँ।

 

स्वयं कवि के मुख से उनकी यह कविता मैंने बार-बार सुनी है और बार-बार यह अनुभव किया है यह स्वयं अपने द्वारा शब्दों में निर्मित उनका अपना प्रोट्रेंट है, अन्तर और बाह्म दोनों का। उनके अन्तर की व्यथा जैसे उनके बाह्म पुर में नाटकीय होकर रच-बस गई थी। उसकी चित्नमयता, उसका व्यंग्य, ये सभी किसी गहरी वेदना का ही रूपांतरीकरण थे।

 

न जाने क्या था जो सदा कसमसाता रहा उनके भीतर और विवश कर देता रहा उन्हें मुक्त अट्टहास करने को और समझौता करने को भी। बहुत गहरे झाँकना होगा। उनकी काव्य संरचना में उन्हें समझने के लिए। जितनी गहरी टूटन होती है हास्य उतना ही सहज मुखर होता है, झीनी-झीनी चदरिया वाला मोहक परदा।

 

उनका रोग, उनकी मृत्यु, सब कुछ के पीछे एक निश्चित कारण था। अद्भुत जिजीविषा थी उनमें, उसका मैं साक्षी हूँ। उस दिन सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री चतुरसेन शास्त्री के घर पर बेटी के विवाह का उत्सव था। अनेक साहित्यिक मित्र आमन्त्नित थे उस उत्सव में। मिश्र जी भी थे। बारात आने में अभी देर थी। शास्त्री जी ने हम लोगों के लिए प्रचुर मात्रा में मिष्टान्न भिजवा दिया जिससे हमारे कहकहे और जीवन्त हो उठे। मिश्र जी मेरे एकदम पास बैठे थे। खाने और कहकहे लगाने में वे सबसे ऊपर थे कि तभी मैं क्या देखता हूँ कि वे हँसते-हँसते सहसा, संज्ञाहीन होकर, कटे वृक्ष की तरह मेरी गोद में आ गिरे। इस आकस्मिकता से मैं हत्प्रभ रह गया । सभी मित्र घिर आए मेरे चारों ओर । किसी तरह उन्हें उठाकर चारपाई पर लिटाया । इसी संज्ञाहीनता में उन्हें कै बी हो गई। बेटी के विवाह में यह कैसा त्रासदी । कोई डाक्टर को लेने दौड़ा तो, किसी ने दिल की मालिश करने की सलाह दी । साँस अभी चल रही थी कि कै के दो मिनट बाद ही वे उसी आकस्मिकता से उठ बैठे जिस आकस्मिकता से गिरे थे और आश्वस्त करते हुए बोले, मैं बिलकुल ठीक हूँ । आप चिन्ता न करें।

 

हृदय पर गैस का दबाव था । वही बाद में हृदय रोग में परिवर्तित हो गया। कै हो जाने से वे सँभल गये और वे कहाँ हैं इस विचार ने भी उन्हें शक्ति दी। वे उसी मस्ती में फिर बोले, आप नाहक परेशान न हों, बस टैक्सी मँगवा दें, मैं घर जाऊँगा।

 मैंने कहा, "अकेले घर जायेंगे ऐसे में ?"

वे अपने सहज नाटकीय अंदाज़ में बोले,  "मैं बिलकुल ठीक हूँ भाई । यक़ीन मानिये, कुछ ज़्यादा खा गया था ।"

टैक्सी आ गई थी । वयोवृद्ध साहित्यकार पं. उदयशंकर भट्ट उठे, बोले, "तुम अकेले नहीं जाओगे । मैं तुम्हें छोड़ता हुआ अपने घर चला जाउँगा ।"

 

अन्ततः हृदय में पेसमेकर लगवाना पड़ा पर उनकी यह जिजीविषा अंत तक बनी रही, वही कहकहे, वही महफिलें । मृत्यु से पूर्व खण्डवा में खूब रमे। भाई रामनारायण उपाध्याय ने लिखा है कि आने से पहले पत्र आया, शेष ठीक है। यानी ठीक रहेगा। शरीर 19-20 रहता है सो रहता है। कल की रात बुरी बीती अर्थात 3-4 दिन सावधान रहना है।

 

फिर भी वे आये, रेलवेपुल को देखकर बोले, चढ़ जाऊँगा। ज़िंदगी में ऐसे बहुत पुल पार किये हैं, लेकिन ऊपर पहुँच कर दम भर आया। जँगले से टिक कर खड़े हो गये। बोले, भाई, कुछ बातें करते रहो। लोगों को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि थक कर खड़े हैं। लगना चाहिए कि बातें करने को खड़े हैं।

 

अपने को छिपाने की यह प्रवृत्ति उनके अंतर में जैसे कुण्डली मार कर बैठ गई थी। लोग उनके दर्द की न जाने । उनके काव्य संसार की यही सबसे बड़ी शक्ति है। आप्त वाक्य तभी मचल पड़ते हैं ओंठो पर।

 

उपाध्याय जी के उस लेख में मिश्र जी को समझने की अनेक घटनाएँ हैं, बोले, लोग कविता करना तो जानते ही नहीं, सुनता भी नहीं जानते । पण्डित भवानी प्रसाद मिश्र की कविता सुनकर कहते हैं एक कविता मेरी भी हो जाये। अब उन्हें कौन समझाए कि अच्छी रचना सुनने के बाद कुछ भी सुनने से साहित्य का स्वाद जाता रहता है।

 

और एक ठहाका।

 

यह ठहाका सहस्त्र जिह्वाओं से बोल रहा था। बोलने की अपनी इस आदत से कभी-कभी वे स्वयं सजग हो उठते थे और जैसे पश्चाताप के स्वर में कह उठते, भाई ! मुझे इतना बोलना नहीं था। लेकिन क्या करूँ, बोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। ज़रा लम्बी ज़बान का आदमी हूँ।

 

लेकिन एक दिन मैंने यह लोभ संवरण करते भी देखा। एक बार वे मेरे ग़रीबखाने में जूठन गिराने के लिए आए थे। बहुत पुरानी बात है। पर बच्चे उन्हें कवि के रूप में पहचानते थे। उनकी इच्छा हुई कि भवानी भाई कोई कविता सुना दें।

 

वह बोले, किसी दिन आकर खूब सुनाऊँगा पर आज आपके यहाँ भोजन किया है। कोई तो ऐसा हो कि .....।

 

सुनने पर प्रथम क्षण तो अच्छा नहीं लगा पर दूसरे ही क्षण मन गद्गगद् हो आया - कोई तो ऐसा स्वाभिमानी है।

 

इसके और भी अर्थ लगाए जा सकते हैं। पर में जानता हूँ उनके मन में यही भाव थे कि भोजन तो निमित्त है। आपने मुझे स्नेह दिया है। उसका प्रतिदान मत माँगो। मुझे स्वयं देने दो।

 

मैंने उन्हें बहुत गहरे शून्य में झाँकते भी देखा है। उस समय वे वहाँ होते थे जहाँ से उन्हें उनकी ख़बर भी नहीं आती थी। इस डूबने के बिना सृजन सम्भव होता ही नहीं और दर्द सहने की यातना में से गुजरना ही डूबना है । भवानी भाई का सम्पूर्ण जीवन इसी दर्द, इसी डूबने का इतिहास है। आश्चर्य, यह डूबना ही एकान्त से मुक्त होने की प्रेरणा देता है, बिहारी के तरे जे बूड़े सब अंग की तरह।

 

अनेक कारणों से मैं तटस्थ (तथाकथित) अजगरी वृत्ति का शिकार हो गया था। समझने लगा था कि शान्ति का एकमात्र मार्ग यही है पर साथ ही व्यथित कर देने वाली उदासी भी ग्रसती आ रही थी मुझे । उन्हीं दिनों उनकी यह कविता पढ़ी :

 

उठो इस एकान्त से/दामन छुड़ाओ इस महज शान्त से

चलो उतर कर नीचे की सड़क पर

जहाँ जीवन सिमट कर बह रहा है/साहस की दिशाएँ

जहाँ अतर्कित प्रेम/कठोरताओं पर तरल है

सबके बीच में/ जीवन सरल

दामन छुड़ाओ इस महज शान्त से

जो न शक्ति देता है न श्रद्धा/ सिर्फ उदास बनाता है

 

अकेला तो सूरज भी नहीं है

उससे ज्यादा अकेलापन तुम चाहोंगे।

मृत्यु तक तटस्थता निबाहोगे

सिमट कर बहते हुए जीवन में उतरो

घाट से हाट तक/ हाट से घाट तक आओ-जाओ

तूफान के बीच गाओ। मत बैठो ऐसे चुपचाप तट पर.....

 

पढ़ चुका तो लगा जैसे कवि मुझे ही सम्बोधित कर रहा है। पर मैं अकेला कहाँ हूँ, लाख-लाख लोग हैं ऐसे। स्वयं कवि ने अपने की ही सम्बोधित किया हो शायद । कुछ भी हो सकता है पर मेरा मन कवि के प्रति एक तरल कृतज्ञता से भर आया था। यही तो रचना और रचनाकार से एकाकार होना है। भवानी भाई जीवन के कवि हैं, शौक के नहीं। उनसे एकाकार होना जीवन से एकाकार होना है। कवि स्वयं स्वीकारता है :

 

विच्छिन्न करता हूँ /अपने को जब दूसरों से

तो खिन्न करता हूँ/अपने को और दूसरों को

अभिन्न करता हूँ जब/अपने को सबसे

तो फूल खिलाता हूँ जैसे/ चारों तरफ

दूसरों को करता हूँ/ हरा-भरा/कण-कण जरा-जरा

 

हर कवि की अपनी विशेषता होती है। भवानी भाई की कविता को मर्मस्पर्शी गहनता की संज्ञा सम्भवतः नहीं दी जा सकती पर मंत्र रूप वह निश्चय ही है :

वहीं जिया/जिसने किया

सूरज की तरह नियम से/ बेगार करने का दिया।

या

बूँद-बूंद उमगा था एक दिन

धारा हूँ आज

न बूँद मेरी थी न धारा

दूसरों का हूँ समूचा सारा

 

अद्भुत सरलता है उनकी कविता में पर अनेक समीक्षकों की दृष्टि में सरलता तो साहित्य की महानता का प्रमाण नहीं है। सरल वही हो सकता है जिसके हाथ ताला खोलने की कुंजी लग गई हो। इसलिए उनकी सरलता में ऐसा तेज है जो उनकी प्रतिभा को गति देता है और उनकी विनम्रता को गौरवान्वित करता है। कूटनीति उनकी शक्ति नहीं है। बांग्लादेश के प्रश्न पर इसीलिए कह सके थे, इन्दिरा गांधी तो नहीं हो।इस सात्विक आवेश के पीछे अन्याय का प्रतिकार करने की भावना प्रबल थी। और था निष्क्रियता से मुक्ति पाने का आह्वान । तट पर बैठे रहना उन्हें रुचिकर नहीं था।

 

भवानी भाई की मूर्ति को कल्पना करता हूँ तो पाता हूँ कि उनके मुख पर सहज सौम्यता है पर उसके पीछे बैरागी का मन नहीं है। आग्रह-आवेश की ऐसी छिपी हुई छाया है जो राहु-केतु की तरह उन्हें ग्रसने को सतत प्रयत्नशील रहती है पर ग्रस पाती नहीं, पा ही नहीं सकती क्योंकि वह उनका स्थायी भाव नहीं है। उनका स्थायी भाव वह स्नेह और स्वाभिमान था जो उनके नेत्रों से सदा झरता रहता था, कभी भाषाप्रेम के रूप में, कभी देशप्रेम के रूप में।

 

लेकिन गांधी नीति की नींव पर पनपी उनकी तेजस्विता ने उन्हें अतियों से सद मुक्त रखा। इसीलिए जहाँ उन्हें कभी-कभी चेतना से घबराहट होती है वहीं उनकी साधना उनके कवि को यह कहने को विवश कर देती है-

 

तकाज़ा मगर प्राणवत्ता का / रोज अनुक्षरण

हवा में आवाज़ लगा रहा हूँ

दे सकने वाले तत्त्व/जीवन में नहीं हैं।

मगर फिर भी किसी भरोसे के साथ

गोया उन्हें जगा रहा हूँ।

 

यही प्राणवत्ता कवि की नियति है। भवानी भाई ने इसी नियति को अपनी शक्ति बना लिया था। मैंने कहा कि उनके जीवन में विकट त्रासदी थी। मेरा उनका परिचय भी तो एक त्रासदी को लेकर हुआ था जो नितान्त मेरी थी। बात सन् 1952 की है। तब वे चेतना प्रकाशन हैदराबाद में काम कर रहे थे । मेरा पहला उपन्यास ढलती रात वहीं से प्रकाशित हुआ था । पर दफ्तरी की कृपा से उसकी 70 या 75 प्रतियाँ ही बिक सकी थीं। शेष सबह रद्दी में बिकती रहीं। 23 जुलाई, 1952 के पत्र में उन्होंने मुझे सूचित किया, आपकी पुस्तक ढलती रात के छपे हुए लगभग 1650 प्रतियों के फार्म्स हमारे जिल्दसाजों में से एक ने गायब किए और उन्हें रद्दी में बेच दिया।

 

फिर भी उन्होंने आश्वासन दिया कि शेष प्रतियों का हिसाब मैं शीघ्र भिजवाने का प्रयत्न कर रहा हूँ। लेकिन उनके प्रयत्नों का कुछ परिणाम निकलता वे स्वयं वहाँ से मुक्त हो गये। उसके बाद वे आकाशवाणी में आ गये । मैं भी सितम्बर, 1955 में 1957 के मार्च मास तक वहाँ रहा। मिश्र जी उससे पूर्व ही 1956 में गांधी वाङ्मय में सम्पादक के पद पर चले गये । वहाँ से अवकाश प्राप्त करके गांधी मार्ग के सम्पादक बन गये। साथ ही साथ भारत सरकार की सांस्कृतिक सम्बन्धों की परिषद् की पत्रिका गगनांचल का सम्पादन भी करते थे।

 

इन सब सत्रों से उन्होंने मुझे जोड़े सखा। आग्रह-आदेश को सदा सम्मान दिया मैंने। उन्हीं दिनों उन्हें पास से देखने का अवसर मिला। राजनीतिक हलचलों से भी जुड़े रहे वे। भूख हड़ताल भी की। जयप्रकाश जी के सुप्रसिद्ध मुक्ति आन्दोलन से भी सम्बद्ध रखा अपने को। मैं भी कुछ दिन साथ रहा पर गांधी नीति के मार्ग को नहीं छोड़ सके और जैसा मैंने कहा, आवेश कभी-कभी विचलित कर देता था उन्हें । सन् 1980 की घटना है। गगनांचल का प्रेमचन्द अंक निकाला उन्होंने, पर न जाने किस गलतफहमी के कारण वे प्रेमचन्द की रवीन्द्र और शरत से तुलना करते समय असंयत हो उठे । वह लिख गये जिसके लिखे जाने की उनकी कलम से कतई आशा नहीं थी । यहाँ तक की शौम्य-शान्त विमल मित्र के मुख से प्रेमचन्द के लिए कुछ ऐसे शब्द कहलवा दिये जो किसी भी प्रकार शोभनीय नहीं थे।

 

मैंने पढ़ा। मैं हतप्रभ रह गया। तुरन्त उन्हें पत्र लिखा । विमल मित्र को भी लिखा। वे चकित रह गये। मुझे लिखा, मैं तो प्रेमचंद पुरस्कार पा चुका हूँ। मैं उनके प्रति अनादर का भाव रख ही नहीं सकता । मैं उन्हें महान लेखक मानता हूँ।

 

मिश्र जी का जवाब आया, आपका 2 नवम्बर का पत्र आज (27 नवम्बर) को देखा। मैं दफ़्तर नहीं जाता इसलिए ऐसा होता है। प्रेमचंद अंक पर आपकी टिप्पणी पूरी दे रहा हूँ। मेरे मन में गुरुदेव, शरत बाबू और बंकिम बाबू के प्रति पूरा आदर है। उनके महत्त्व आदि को मैं जानता हूँ तथापि यह सही है कि प्रेमचन्द का कैनवस उनके कैनवस से अधिक बड़ा है। यह ठीक है कि कला की दृष्टि से वे शरत और गुरुदेव के समकक्ष नहीं हैं। बात एक प्रसंग में उठ गयी थी उसे टाला नहीं जा सकता था। टाल देता तो अच्छा था यह मैं मानूँगा । यह मानना उनका बड़प्पन था।

 

एक बार सम्भवतः दिवाली के अवसर पर (13-11-82) उन्होंने एक कार्ड पर मात्र एक कविता लिखकर भेज दी थी। वह उनके चिन्तन की प्रतीक है।

 

उठे स्वर्ण की आभा में ज्वाला सा मन

तन झुलस-झुलस कर भी झूमे आनन्द गगन

हर अधिकार में सिसक रही कोमलता का दुख दीन न हो

तम क्षीण अमावस को करने की यह इच्छा प्राचीन न हो।

 

कविता वास्तव में उनके जीवन में रच-बस गयी थी। उन्होंने ऐसे ही एक प्रश्न के उत्तर में कहा था, अगर मैं कविता न करूँ तो जी नहीं सकता। कुछ लोग होते हैं जो कविता न भी करें तो जी सकते हैं। वे ऐसी मछलियाँ है जो पानी के बाहर भी जी लेती हैं, सरकारी पोखर में । अपन तो पानीदार मछली हैं।...

 

अगर कोई मुझ से पूछे कि क्या मिलता है तुम्हें ऐसा। कविता लिखने से । कि तुम इस काम को ख़तम नहीं करते तो मैं गिना सकता हूँ। सौ बातें । ऐसे सैकड़ों दिन सैकड़ों रातें। जो मुझे कविता की मार्फत मिली है और पहुँचाया है जिन्हें मैंने दूसरों तक कविता के मार्फत।

 

अभी दो मिनट जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था तब कागज कागज था । मैं मैं था और कलम कलम। मगर जब लिखने बैठा तब हम तीन नहीं रहे, एक हो गये । इन तीनों चीज़ों का अलग-अलग अस्तित्वों का एकाएक इतनी आसानी से एक हो जाना अपने आप में एक करिश्मा है।

 

 इस वक्तव्य में गहरी वेदना है व्यंग्य भी है, और है कृतिकार का अहम् दुरूह होती कविता में जनजीवन की सीधी सार्थक बोली के माध्यम से अंतर तक उतर जाने की क्षमता पैदा करना उन्हीं का कार्य था। इस क्षेत्र में अप्रतिम रहेंगे। पाँव नामक कविता में उनकी ये पंक्तियाँ इस बात की साक्षी हैं-

 

सुबह की ठण्डी हवा कपड़े नहीं हैं

पाँव रखते हैं कहीं पड़ते कहीं हैं

पाँव जिनमें गति नहीं कम्पन बहुत है

प्राण में जीवन नहीं तड़पन बहुत है।

 

और एक दिन (22 मई, 1985) सुना कि वे चले गये चुपचाप। तब मन में उठा था कि एक ऊँचे कद का आदमी जीवन-भर साधारण आदमी की वेदना-व्यथा, अभिमान-अहंकार को भोगता हुआ न समाप्त होने वाली सड़क पर आगे वढ़ गया । वह मरना नहीं है फिर-फिर जीने की शक्ति पाने का मार्ग है, जीवन का विस्तार है। और भवानी भाई तो मरने में विश्वास ही नहीं करते थे। वह तो धुएँ और धूल के शहर में भी आदिम सुंगध के बल पर जीते थे । उनके देहावसान का समाचार पाकर उनके एक परम भक्त जालना के डॉ. शांति लाल जैन ने मुझे उनकी यह कविता लिख भेजी थी मानो अपने महाप्रयाण पर वे स्वयं हमें बता रहे हैं : 

और मैं /विलीन हो गया/जैसे तेज धूप में/

जूही की गंध या जैसे/गहरे किसी गर्त में/छोटे

किसी झरने का छंद /या जैसे सूरज के निकलते-

निकलते/भोर का तारा या जैसे/

नदी की धारा/ समुद्र में/ और तुम हो यह तेज धूम

गहरे गर्त या आवर्त/ और सूरज और समुद्र।

 

निश्चय ही वे कहीं नहीं गये। हम में ही विलीन हो गये हैं। अब हमें उनकी कविता सुनने उनके पास नहीं जाना होगा। जब जी चाहेगा मन का बटन दबाकर सुन लेंगे।

कि अब यही रहेंगे/ यहाँ रहने वालों के साथ सहेंगे

अत्याचार/और ताकत सारी/अत्याचारी के खिलाफ़/

लगायेंगे/ समझेंगे पंछियों के गीत/हवा का क्रोध

आसमान का फैलाव/प्रवाह स्त्रोतों का/यह सब

समझते हुए और थोड़े में रहते हुए/ज़्यादा में

रहने की इच्छा रखने वालों को क्रूर

मन लेकर वन में आने को रोकेंगे हम/ समंदर

अत्याचार का जैसे भी बने/ सोखेंगे हम।

 

विष्णु प्रभाकर

 दिल्ली

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

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