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संस्कार |
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एक नये समीक्षक को सलाह जार्ज बर्नार्ड शॉ
- पहला भाग - (उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक नाट्य समीक्षा से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में 'ऐडवाइस टु ए यंग क्रिटिक' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा - एक नये समीक्षक को सलाह । हम इसे साहित्य हिंत में संपूर्णतः प्रकाशित कर रहे हैं । प्रस्तुत है इस महान कृति का पहला भाग - संपादक।) --------o-------- 29 फिट्ज्राय स्क्वायर, डब्ल्यू 30 अप्रैल,1894
प्रिय महोदय,
आपकी चिट्ठी अभी-अभी मिली। लोगों ने थियेटर से इसे मेरे पास नहीं भेजा, वे तो आशा करते हैं कि मैं हर रोज थियेटर वालों को सलाम किया करूँ।
नाट्यशास्त्र समीक्षक बनने का कोई निश्चित नियम नहीं होता । इसे एक संयोग ही समझिये। उदाहरण के लिए, मुझे कभी इस प्रकार का कोई प्रस्ताव नहीं मिला । यदि ऐसा प्रस्ताव मिला होता तो पिछले अठारह वर्षों में मैं कभी भी सहर्ष स्वीकार कर लेता। लेकिन, यदि कहीं कोई सुयोग होता है तो यह एक पत्रकार के साथ। किसी पद के रिक्त होने पर संपादक पत्रकार के लिए उस व्यक्ति की ओर अभिमुख होते हैं जो पहले से इस क्षेत्र में कुछ रुचि ले रहे हैं, जिनमें लिखने की क्षमता हो तथा जो इसके तौर-तरीके से अवगत हों। अगर आप किसी अखबार के लिए एक ‘रिपोर्टर’ या स्तम्भ-लेखक हों और थियेटर में रुचि रखते हों तो किसी आपातस्थिति में आपकी ओर ध्यान आकर्षित हो सकता है। इससे संपादक को यह पता चल सकता है कि आपका इस ओर झुकाव है। तब यदि किसी नाट्य-समीक्षक की मृत्यु हो जाये या यदि वह किसी दूसरे अखबार में चला जाये या पत्रकारिता की वृति ही वह छोड़ दे, तो आप उसके उत्तराधिकारी बन सकते हैं, बशर्ते आपने इस क्षेत्र में उचित क्षमता दिखाई हो । यही नियमित रास्ता है। लेकिन, न आप अपने किसी दोस्त की, जो पत्रकारिता शुरु कर रहा हो या जो सम्पादक बन गया हो, इस बात के लिए राजी कर सकते हैं कि वह आपको तुरंत एक अवसर दे। लेकिन, इसे मात्र भाग्य की बात समझिये और जब भाग्य साथ दे दे, तो रही उसके उपयोग करने की बात। याद रखें, एक समीक्षक होने के लिए केवल यही आवश्यक नहीं कि आप उसके विशेषज्ञ हों, आपमें साहित्यिक रुझान, प्रशिक्षित समीक्षण रूझान, विश्लेषण और तुलनात्मक विश्लेषण की क्षमता आदि भी होनी चाहिए। अपने को ‘द वर्ल्ड’ के स्टाफ में स्थान पाने के योग्य बनने के लिए मुझे एक साल तक किताबों के सर्वेक्षक, तस्वीरों के समीक्षक, राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों के विवेचक और संगीत समीक्षक के रूप में बहुत काम करना पड़ा है इसलिए कि उस दिन या और कभी जब आपने मेरे बारे में पहली बार सुना हो, आपकी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि जो ख्याति मुझे आज मिली है वह सस्ती है। मैं 1876 में लन्दन आया और तब से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता रहा हूँ। ‘प्लेगोअर्स क्लब’ में मेरा मंच अनुष्ठान अब पूरा होने को आया । इसके लिए बड़ी विपन्न स्थिति में मैं पन्द्रह वर्षों तक प्रयास करता रहा था। मैं आपको यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि आपकी राह में कई प्रकार की बड़ी और भ्रामक कठिनाइयाँ आ सकती हैं । कहीं ऐसा न हो कि इससे आप हतोत्साहित और कटु हो जाएँ। लंदन में हर कोई चालीस वर्ष में यह काम प्रारम्भ करता है और वयस्क होने पर उसके पीछे बीस वर्ष उसक जीवन के लिए व्यर्थ बिताया हुआ समय नहीं होते और न तो आपको या किसी और को इस तरह बीस वर्षों की साधना से घबराना चाहिए।
मैं अब भी यह मानता हूँ कि वह व्यक्ति जो आगे के सबसे निचले स्थान पर नाट्य अनुष्ठान के लिए प्रतीक्षा करता है, पागल है। निचले स्थान की प्रथम पंक्ति में प्रतीक्षा करना तो कुछ है भी; पर मैं इसे भी बहुत ठीक नहीं मानता। फिर भी आपको मैं अपना विचार बता रहा हूँ। अगर आप सोत्साह यह मुसीबत झेलने को तैयार हैं तो मुझे क्यों आपत्ति होगी ?
अगर आप मुझे क्षमा करें तो मैं कहूँगा, भले ही आप मुझ पर श्री इर्विग, डब्ल्यू ट्री तथा ‘नयी धारा’ से सम्बन्धित सभी मान्यताओं का उत्तरदायित्व डालें, यह सत्य नहीं है। आपके मस्तिष्क में समाचार-पत्रों के वैसे स्तम्भ-लेखकों के विचार भरे हैं, जिन्हें मेरी विचारधारा का जरा भी ज्ञान नहीं है। वैसा कुछ भी नहीं है जो मुझे ‘न्यू स्कूल’, ‘न्यू ड्रामा’ और इसी तरह के अन्य बकवासों की तरह अप्रिय लगे। मुझे इससे काफी पीड़ा होती है, क्योंकि लोग मेरे शुद्ध नाट्य-उद्धरणों के बारे में भी अनुमान लगा लेते है कि वे मेरे तथाकथित राजनैतिक विचारों के ही क्षेपक हैं। फिर भी अगर मेरे नाटक में इस तरह के क्षेपक कहीं मिल जाएँ तो उस पर आप लोगों को इतना उत्तेजित नहीं होना चाहिए। गैलरी में बैठे ‘फेबियन’ मेरे नाटक से आनन्द उठाते रहे। मुझे आज खुशी है कि अब भी गैलरी इसका आनन्द उठाती है जबकि आज उसमें फेबियन उपस्थित नहीं होते । फिर शाही परिवार के निरे काल्पनिक संदर्भ के कारण उनकी उदासीनता से आपका धैर्य क्यों डगमगा जाता है ? जनप्रिय सैन्य नाटक राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत होते हैं, लेकिन क्या शाही परिवार ने ऐसे नाटकों का आनन्द लेने में कहीं कोई व्यवधान उपस्थित किया है? मुझे संदेह नहीं है कि हम दोनों वैसे नाटकों के प्रथम प्रस्तुतीकरण में साथ-साथ रहे हैं जो मेरे राजनैतिक विचारों से, अत्यधिक विरोधी तत्वों से भरे हैं । मुझे विश्वास है कि आपने मुझे इस बात पर अभिनेता या साथ बैठे दर्शक को भी कभी कुछ टोकते नहीं पाया है। जिन नाटकों को मैं पसन्द नहीं करता, उन्हें मैं देखने भी नहीं जाता।
अन्य में, आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैंने आपके सामने वैसे सिपाही का चित्र का प्रस्तुत करने का भरसक प्रयत्न किया है जिसे पता हो कि उसका वास्तविक काम क्या है मेरी हार्दिक इच्छा है कि मुझे वैसे दर्शक मिले जो अनुभवी और भुक्तभोगी हों-जो जानते हों कि युद्ध के लिए अकड़े घोड़े की सवारी करना क्या होता है, युद्ध के दौरान भोजन के लिए सेना रसद- विभाग पर विश्वास करना क्या होता है, दो-दो, तीन-तीन दिन तक आग से घिरा होना क्या होना है। तब वे मेरे ‘चॉकलेट’ आदि को उस अनुपात में ‘मूर्खतापूर्ण परिहास’ के रूप में न लेंगे, जिस अनुपात में बहुत से दर्शकों ने लिया है।
आपका विश्वासी जी. बर्नार्ड शॉ
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