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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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राजकाज

 

 

 

इराक को बाँटने का अमेरिकी प्रयास शुरु!


तनवीर ज़ाफरी

 

राक के हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। बुश प्रशासन भली-भांति यह समझ चुका है कि वियतनाम-अमेरिका युद्ध के बाद यदि अमेरिका को कहीं अपमानित या लज्जित होना पड़ा है तो वह है अमेरिका का मिशन इराक। पूरी दुनिया में मिशन इराक ने अमेरिकी साख को गहरा आघात पहुँचाया है। इराक मुद्दे को लेकर बुश प्रशासन के विरुद्ध न सिंर्फ अमेरिकी जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है बल्कि मिशन इराक में साथ देने वाले अमेरिका के सहयोगी देश भी अब एक-एक कर अपनी सेनाओं को वहाँ से वापस बुलाने लगे हैं। उधर अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा (हाऊस ऑंफ रिप्रेंजेन्टेटिव्स) ने भी सदन में एक विधेयक पारित किया है जिसके तहत उसने इराक युद्ध हेतु और अधिक धन मुहैया कराए जाने पर सशर्त रोक लगा दी है। डेमोक्रेट्स सांसदों का इस विषय में यह कहना है कि जब तक अमेरिकी सैनिकों की इराक से वापसी की समय सीमा निर्धारित नहीं हो जाती तब तक इराक युद्ध हेतु और अधिक धन मुहैया नहीं कराया जा सकता।

 

उपरोक्त हालात से यह बात तो सांफ जाहिर हो रही है कि कम से कम इराक मुद्दे को लेकर अमेरिका में डेमोक्रेट एवं रिपब्लिकन पूरी तरह से आमने-सामने आ चुके हैं। ऐसे में बुश प्रशासन की पूरी कोशिश है कि इराक में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के दौरान ही यथाशीघ्र सम्भव कुछ ऐसे कारनामे कर दिखाए जाएं जो आने वाले समय में इराक के लोगों के लिए एक बड़ा सिरदर्द साबित हों। इस अघोषित विघटनकारी योजना पर अमल करने का काम भी अमेरिकी सेना द्वारा शुरु किया जा चुका है। इराक पर गृहयुद्ध का खतरा मंडराने की चिंता में डूबे रहने वाले अमेरिका ने इराक को विभाजित करने की दिशा में जो रचनात्मक कदम उठाने शुरु किए हैं उनके तहत अब अमेरिकी सैनिकों द्वारा जातिगत आधार पर इराकियों  की बस्तियों को दीवार के माध्यम से अलग करने का प्रयास किया जा रहा है।

 

सद्दाम हुसैन की फाँसी के बाद नि:सन्देह इराक के हालात तुलनात्मक दृष्टि से पहले से और अधिक खराब हुए हैं। परन्तु इसके बावजूद इराक के नागरिक किसी भी कीमत पर अपने देश को विभाजित होते हुए नहीं देखना चाहते। परन्तु बुश प्रशासन इराकी नागरिकों की इच्छाओं का सम्मान करने के बजाए दूरगामी गुप्त एवं अघोषित अमेरिकी रणनीति पर अमल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। और अमेरिकी रणनीति आमतौर पर यही कहती है कि दुश्मन देश को कमजोर किया जाए, उसके टुकड़े कर दिए जाएं और यदि इनमें से कुछ भी न हो सके तो कम से कम जातिवाद व वर्गवाद की खाई को तो इतना गहरा कर ही दिया जाए कि भविष्य में कम से कम नफरत की उस खाई को पाट पाना तो बिल्कुल ही सम्भव न हो सके।

 

इराक की राजधानी बंगदाद के निकट अदमिया नामक कस्बे में अमेरिकी सैनिकों द्वारा दिन-रात काम कर इस कस्बे को चारों ओर से लगभग 15 फीट ऊँची दीवार से घेरने का काम किया जा रहा है। इस प्रकार की जेल रूपी दीवारें शिया व सुन्नी बाहुल्य क्षेत्रों में अलग-अलग बनाई जा रही हैं। अदमिया में बनने वाली दीवार की लंबाई तो लगभग 5 किलोमीटर है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इराक के शिया, सुन्नी व कुर्द सभी जातियों के लोग अमेरिका द्वारा इराकी समाज को जातिगत आधार पर विभाजित करने के इस दुष्प्रयास का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। परन्तु अमेरिकी सेना द्वारा इराक में शिया समुदाय के लोगों को तो एक ओर यह समझाया जा रहा है कि यह दीवार उनकी अपनी रक्षा हेतु बनाई जा रही है। ठीक इसी तरह दूसरी ओर सुन्नी आबादी में भी यही प्रचारित किया जाता है कि उन्हें शिया चरमपंथियों के हमले से सुरक्षित रखने हेतु इस दीवार का निर्माण किया जा रहा है।

                                                      

परन्तु वास्तविकता तो इससे अलग हटकर कुछ और ही है। 10 अप्रैल से अदमिया में 5 किलोमीटर लम्बी दीवार बनाने का जो सिलसिला अमेरिका ने शुरु किया है उससे अदमिया के पूरे बंगदाद से कट जाने की सम्भावना है। इतना ही नहीं बल्कि इस इलाक़े के रहने वाले लोग तो यहां तक मानते हैं कि यह दीवार हिंसा व नंफरत में तो सहायक हो सकती है हिंसा कम करने में तो हरगिज नहीं। इराकी अवाम इस दीवार को हिंसा जैसी समस्या से निपटने के तथाकथित अमेरिकी समाधान के बजाए और अधिक समस्या खड़ी करने की अमेरिकी कोशिश बता रहे हैं। तमाम इराकी तो इस दीवार को इराकियों  के लिए जेल की दीवार जैसा बता रहे हैं तथा समाज को विभाजित करने जैसी इस प्रक्रिया को वे इराकियों को संजा दिए जाने से कम और कुछ नहीं मानते।

 

शिया-सुन्नी समाज को इराक में दीवारों के माध्यम से विभाजित करने का अमेरिकी प्रयास अदमिया में पहली बार नहीं किया जा रहा है। बल्कि इससे पहले भी अमेरिकी सुरक्षा बलों द्वारा बगदाद के कई क्षेत्रों में इसी प्रकार की छोटी-छोटी कई दीवारें बनाई जा चुकी हैं। परन्तु इसके बावजूद इराक में हिंसक घटनाएं कम होने के बजाए और भी बढ़ती जा रही हैं। प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका द्वारा इराक जैसे देश को जातियों के आधार पर दीवारें खड़ी कर उन्हें विभाजित किए जाने का प्रयास किया जाना वास्तव में इराक में शांति स्थापित करने हेतु उठाया जाने वाला कदम है अथवा यह किसी दूरगामी अमेरिकी रणनीति का एक अहम हिस्सा है? जब इराक में सत्ता व विपक्ष के शिया व सुन्नी समुदायों के अधिकांश प्रमुख नेताओं का यह मानना है कि अमेरिका द्वारा बनाई जाने वाली यह दीवारें शिया व सुन्नी समुदाय के मध्य हिंसा में कमी लाने के बजाए इन दोनों ही समुदायों में नंफरत को और अधिक बढ़ावा देंगी। इन इराकी नेताओं का मानना है कि शिया-सुन्नी बस्तियों के आधार पर नफरत की दीवार हरगिंज नहीं खड़ी की जानी चाहिए। फिर आखिर इराक में बैठे अमेरिकी रणनीतिकारों को इस बात का क्या अधिकार है कि वे इराकी लोगों को विशेषकर इराकी नेताओं को विश्वास में लिए बिना इराकियों की छाती पर नफरत की दीवार का निर्माण करने लग जाएं

 

जहाँ तक इराक में दिन-प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हालात का प्रश्न है तो इराक की इस दुर्गति के लिए इराक के शिया-सुन्नी व कुर्द आदि सभी समुदाय के लोग केवल अमेरिका को ही दोषी मानते हैं। हालाकि अमेरिका ने इराकी आवाम को यह समझाने का प्रयास ंजरूर किया था कि अमेरिका सद्दाम जैसे तानाशाह को सत्ता से अपदस्थ कर इराक में लोकतंत्र की स्थापना करवाना चाहता है तथा यहां किसी तानाशाह के बजाए इराकियों  की अपनी लोकतांत्रिक हुकूमत देखना चाहता है। परन्तु इराक में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप करने हेतु उसके द्वारा सद्दाम पर लगाए गए सामूहिक विनाश के हथियारों के भण्डारण के आरोप से लेकर दुजैल नरसंहार के सिलसिले में उसे फांसी पर लटकाए जाने तक के घटनाक्रम में इराकियों  द्वारा सभी अमेरिकी चालों व हथकण्डों को बड़ी सूक्ष्मता से देखा व परखा जा चुका है। यही वजह है कि अब अमेरिकी सेना की इराक में मौजूदगी किसी भी इराकी को फूटी आँख भी अच्छी नहीं लग रही है। शिया समुदाय में अत्यन्त लोकप्रियता रखने वाले भूमिगत नेता मुक्तदा अल सद्र, जोकि इन दिनों अपने आक्रामक तेवर छोड़कर काफी नर्म पड़े दिखाई दे रहे हैं, ने वर्तमान इराकी सरकार से अपने सभी मंत्रियों के त्यागपत्र दिलवा दिए हैं। वे भी इन दिनों केवल अमेरिकी सेना की इराक से वापसी हेतु ही प्रयासरत हैं। गत् दिनों इराकी संसद में मुक्तदा अल सदर का वह बयान पढ़कर सुनाया गया जिसमें उन्होंने अमेरिकी सेना की इराक से वापसी की तिथि तय न हो पाने के लिए राष्ट्रपति बुश की कटु आलोचना की है। सद्र का मानना है कि अमेरिकी सेनाओं के इराक से चले जाने के बावजूद इराक के हालात इससे अधिक खराब नहीं हो सकते जितने कि गत् 4 वर्षों में अमेरिकी सेना की इराक में मौजूदगी के दौरान हुए हैं।

 

बहरहाल बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण हालात का सामना कर रही इराकी अवाम को इस समय बड़ी ही विकट एवं विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। उधर अमेरिका अपनी चिर-परिचित रणनीति के तहत इराकियों  को जाति एवं वर्ग के आधार पर विभाजित करने के अपने सभी प्रयासों को पूरा करना चाहता है। अमेरिका की 'दीवार नीति' उसके इसी दुष्प्रयासों का एक महत्वपूर्ण अंग है। निश्चित रूप से इराकी अवाम के लिए यह कठिन परीक्षा की घड़ी है कि आंखिर वे अपने आपको अमेरिकी हथकण्डों से बचाते हुए किस प्रकार इराक व इराकियों को संगठित रख सकेंगे।                                                                                                                                                           

 

तनवीर ज़ाफरी

 

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