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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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राजकाज/पड़ोस

 

 

 

नेतृत्व परिवर्तन की राह पर पाकिस्तान


तनवीर ज़ाफरी

                                                 

पाकिस्तान की गिनती वैसे तो दुनिया के जनतांत्रिक देशों में जरूर की जाती है परन्तु उसके बावजूद यह भी सच है कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के अपने 60 वर्षों के इतिहास में यहां लोकतांत्रिक सरकारों का दौर तो कम जबकि फौजी हुकुमरानों का शासन अधिक समय तक रहा है। पाकिस्तान की राजनीति का एक और कड़वा सच यह भी रहा है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेषकर अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के मुद्दे को लेकर पाकिस्तानी फौजी सरबराह जितना विवादों में रहे उतनी विवादित यहां की लोकतांत्रिक सरकारें नहीं रहीं। इसी पाकिस्तान में फौजी तानाशाह द्वारा सत्ता पर काबिंज रहने के लिए इस हद तक चक्रव्यूह रचा जा चुका है कि पाकिस्तान के एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सजा-ए-मौत तक से रूबरु होना पड़ा है।

 

दरअसल पाकिस्तान के संविधान में पाकिस्तानी सेना प्रमुख को इतने अधिकार प्राप्त हैं कि वह देश के राजनैतिक मामलों में अथवा सत्ता के संचालन में सीधे हस्तक्षेप कर सकता है। दूसरे शब्दों में इसे यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तानी सेना जब चाहे तब अपने सेनाध्यक्ष के आदेश पर लोकतांत्रिक तरीक़ों से चुनी गई जनता की प्रतिनिधि सरकार का आनन-फानन में तख्ता पलट सकती है तथा वही फौजी हुकुमरान स्वयं सत्ता पर काबिज हो सकता है। पाकिस्तानी राजनीति में अक्सर होने वाले ऐसे घटनाक्रमों ने न सिंर्फ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की राजनैतिक साख पर बट्टा लगाया बल्कि इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप पाकिस्तानी आवाम का आम जनजीवन तथा उनकी सोच भी प्रभावित होती रही है। जिस प्रकार एक साधारण राजनीतिज्ञ सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद सत्ता की कुर्सी से चिपके ही रहना चाहता है तथा यदि निर्धारित सीमा के भीतर चुनाव कराए जाने की मजबूरी का सवाल न हो तो वह सत्ता की कुर्सी छोड़ना ही नहीं चाहता। ठीक उसी प्रकार फौजी तानाशाहों की सोच भी यही होती है कि किसी भी प्रकार से एक बार उनके हाथों में आई हुई सत्ता कभी वापस न जाने पाए। और एक फौजी तानाशाह अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए सब कुछ कर डालने को तैयार रहता है चाहे वह नियम, कायदे, कानून, मानवता आदि सभी के विरुद्ध क्यों न हो।

 

पाकिस्तान एक बार फिर ऐसे ही कठिन दौर से गुजर रहा है। नवांज शरींफ की लोकतांत्रिक सरकार के समय सेनाध्यक्ष रहे परवेज  मुशर्रफ ने शरीफ का तख्ता पलट कर जब से पाक सत्ता पर एक फौजी तानाशाह के रूप में अपना कब्जा जमाया तब से अब तक जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के विकास के लिए कुछ किया हो या न किया हो परन्तु यह बात तो बिल्कुल सत्य है कि जितने विवादित तानाशाह परवेज मुशर्रफ रहे हैं, उतना विवादित कोई दूसरा फौजी हुकुमरान नहीं रहा। इसमें कोई शक नहीं कि वे कट्टरपंथी विचारधारा तथा इस्लाम के नाम पर फैलाए जाने वाले आतंकवाद के विरोधी प्रतीत होते हैं। परन्तु उनका यह विरोध वास्तविक है या केवल दुनिया को दिखाने के लिए, इस विषय पर कुछ नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान में आम लोगों का यह मानना है कि जनरल मुशर्रफ अमेरिका के दिशा निर्देशों पर काम करने वाले तानाशाह हैं। अमेरिका का बुश प्रशासन भी यह स्वीकार करता है कि जनरल मुशर्ऱफ अमेरिका के विश्वव्यापी आतंकवाद विरोधी मुहिम में उसके खास सहयोगी हैं। अत: अमेरिका की दया दृष्टि मुशर्ऱफ पर बने रहना एक स्वाभाविक सी बात है।

 

पाकिस्तान का परमाणु शक्ति सम्पन्न देश होना भी पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी चिंता का एक प्रमुख कारण है। अमेरिका किसी कीमत पर भी यह नहीं चाहता कि पाकिस्तान स्थित परमाणु केन्द्रों पर वहाँ मौजूद कट्टरपंथी शक्तियों का नियंत्रण हो सके। इसलिए वह जनरल मुशर्ऱफ को समय-समय अपना संरक्षण तथा दिशा निर्देश भी देता रहता है। कहना गलत नहीं होगा कि जनरल मुशर्रफ के शासनकाल में अमेरिका के उच्चस्तरीय नेताओं व अधिकारियों ने पाकिस्तान के जितने दौरे किए हैं, उतने किसी अन्य पाकिस्तानी शासक के दौर में नहीं किए गए। पाकिस्तानी अवाम भी इस बात को बखूबी समझ रही है कि अमेरिकी समर्थन के बल पर ही जनरल मुशर्रफ सत्ता में बने रहने के प्रत्येक हथकंडे अपना रहे हैं।

 

परन्तु ऐसा लगता है कि जरल मुशर्रफ के हाथों से पाकिस्तानी हुकूमत की पकड़ अब ढीली पड़ने लगी है। एक ओर तो पाकिस्तानी अवाम का परवेज मुशर्रफ पर पाकिस्तान में शीघ्र चुनाव कराए जाने का दबाव बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर पाकिस्तान के दो प्रमुख राजनैतिक दलों के पारंपरिक विरोधी नेता नवांज शरीफ व बेनजीर भुट्टो जोकि जनरल मुशर्ऱफ द्वारा पाकिस्तान से निष्कासित किए जा चुके हैं के मध्य मुशर्ऱफ के विरोध के मुद्दे को लेकर सहमति बनने के समाचार सुनाई दे रहे हैं। इसी बीच जैसे-जैसे जनरल मुशर्ऱफ पर पाकिस्तान में आम चुनाव कराने हेतु दबाव बढ़ता जा रहा है तथा उन्हें पाकिस्तानी सत्ता से अपना बोरिया बिस्तर समेटने के दिन करीब आते नंजर आ रहे हैं, वैसे-वैसे इस फौजी  तानाशाह के व्यवहार एवं राजनैतिक व प्रशासनिक फैसलों में भी काफी  बदलाव देखा जा रहा है ।

 

              अभी गत माह पाकिस्तान के एक प्रमुख टीवी चैनल जीओ टीवी को दिए गए जनरल मुशर्ऱफ के एक साक्षात्कार के प्रसारण को लेकर काफी  हंगामा खड़ा हो गया था। लगभग पूरे पाकिस्तान का मीडिया इस विषय पर जनरल मुशर्ऱफ के विरुद्ध लामबंद हो गया था। जीओ टीवी द्वारा मुशर्ऱफ का साक्षात्कार प्रसारित किए जाने के बाद मुशर्ऱफ समर्थक सुरक्षाकर्मियों ने उस टीवी स्टेशन पर हमला बोल दिया था तथा टीवी केंद्र की सम्पत्ति को भारी नुंकसान पहुंचाया था। अभी मुशर्ऱफ के इस तानाशाही कदम को पाकिस्तानी मीडिया व अवाम भुला भी नहीं पाए थे कि गत् 9 मार्च को परवेज  मुशर्ऱफ द्वारा एक और बड़ा तानाशाहीपूर्ण कदम उठाते हुए पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिखार मोहम्मद चौधरी को निलंबित कर दिया गया। परवेज  मुशर्ऱफ का आरोप है कि जस्टिस चौधरी द्वारा मुख्य न्यायाधीश के पद पर बैठकर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया जा रहा था। इफ़्तिखार चौधरी के निलंबन ने तो गोया पाकिस्तान में आग ही लगा कर रख दी है।

 

जस्टिस चौधरी अपने निलंबन के बाद चैन से बैठने के बजाए स्वयं काफी  आक्रामक हो उठे हैं। वे अपने निलंबन के विरुद्ध अपनी बेगुनाही का सुबूत देने के लिए पाकिस्तान की अवाम के मध्य सड़कों पर उतर आए हैं। जस्टिस चौधरी के साथ लगभग पूरे पाकिस्तान का बुद्धिजीवी, वकील तथा अन्य प्रशासनिक वर्ग बहुतायात में खड़ा दिखाई दे रहा है। गत् 12 मई को इतिंफ्तंखार चौधरी के समर्थन में कराची में आयोजित होने वाली एक रैली में तो उस समय हिंसा का एक अजीबो गरीब दृश्य देखने को मिला जबकि हंजारों की संख्या में जस्टिस चौधरी समर्थकों व परवेज  मुशर्ऱफ के समर्थकों के मध्य सड़कों  पर कई घंटों तक खूनी हिंसा का भयानक खेल खेला गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम में 33 लोगों के मारे जाने तथा 200 से अधिक लोगों के घायल होने का समाचार प्राप्त हुआ है।

 

 प्रश्न यह है कि क्या जनरल मुशर्ऱफ के इस प्रकार के तानाशाहीपूर्ण कदम उन्हें सत्ता में बनाए रखने में सहयोगी साबित होंगे या फिर उनका यही आक्रामक व्यवहार उनकी सत्ता से विदाई लेने का प्रमुख कारण बनेगा? जो भी हो लेकिन यह तो बिल्कुल सच है कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के चींफ जस्टिस इफ़्तिखार मोहम्मद चौधरी को बंर्खास्त कर भले ही परवेज  मुशर्ऱफ ने अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने की मुहिम के पक्ष में उठाया गया एक बड़ा कदम क्यों न समझा हो। परन्तु यह भी सच है कि अपने निलंबन के बाद सड़कों पर उतरकर जस्टिस इफ़्तिखार चौधरी ने पाकिस्तान में इस चर्चा को भी बल प्रदान कर दिया है कि भले ही आज वे मुशर्ऱफ की तानाशाही नीतियों का शिकार होते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद से निलंबित क्यों न कर दिए गए हों परन्तु भविष्य में वे परवेज मुशर्ऱफ अथवा किसी अन्य राजनैतिक पाक सरबराह के सशक्त विकल्प के रूप में भी देखे जा सकते हैं।

                                                                                 तनवीर जाफरी

22402, नाहन हाऊस

अम्बाला शहर, हरियाणा

 

 

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