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राजकाज |
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उत्तर प्रदेश : धराशायी हुई मन्दिर-मस्जिद राजनीति निर्मल रानी भारतीय राजनीति में जातीय समीकरण को लेकर गठित होने वाले देश के सबसे पहले राजनैतिक दल बहुजन समाज पार्टी ने 1995 में जब पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता का मुँह देखा था तथा मायावती देश के इस सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव ने इस राजनैतिक घटनाक्रम को 'भारतीय लोकतंत्र का एक चमत्कार' होने की संज्ञा दी थी। आज वही चमत्कार धरातलीय वास्तविकता का रूप धारण कर चुका है। बहुजन समाज के बाद 'सर्वजन समाज' का घोष करने वाली मायावती ने अपने राजनैतिक संगठन बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाकर 14 वर्षों में पहली बार उत्तर प्रदेश को पूर्ण बहुमत वाली स्थिर सरकार दिए जाने का करिश्मा कर दिखाया है।
हालांकि चुनाव विशेषकों द्वारा इन परिणामों को लेकर अलग-अलग तरह के विशेषण किए जा रहे हैं। कुछ विशेषकों का मानना है कि मुलायम सिंह यादव के कथित गुंडाराज को समाप्त करने के पक्ष में ऐसे नतीजे सामने आए हैं। जबकि कुछ विशेषक इसे आमतौर पर पड़ने वाले सत्ता विरोधी मत के रूप में देख रहे हैं। कुछ विशेषक इन परिणामों को इस नंजरिए से भी देख रहे हैं कि चूंकि बहुजन समाज पार्टी ही उत्तर प्रदेश की जनता के समक्ष समाजवादी पार्टी का एकमात्र विकल्प नंजर आ रही थी इसलिए प्रदेश की जनता ने कांग्रेस व भाजपा के पक्ष में वोट देकर अपने मतों को विभाजित करने के बजाए बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में ही मतदान करना बेहतर समझा। जाहिर है कांग्रेस अथवा भाजपा को यदि कुछ सीटें और मिल जातीं तो उत्तर प्रदेश में गठबंधन सरकार की संभावनाएं बढ़ सकती थीं। और यह स्थिति स्थिर सरकार चलाने के लिए कदापि बेहतर नहीं होती। बहुजन समाज पार्टी के पूर्ण बहुमत में आने के विषय में यह भी कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में उच्च जाति विशेषकर ब्राह्मणों व मुसलमानों के बसपा की ओर झुकाव के फलस्वरूप ऐसे चुनाव नतीजे मुमकिन हो सके हैं।
उपरोक्त सभी राजनैतिक परिस्थितियों के अतिरिक्त इन विधानसभा चुनावों के संबंध में विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा की गई जबरदस्त राजनैतिक तैयारियों व रणनीतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है। समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव व उनके विशेष सहयोगी अमर सिंह ने सत्ता में बने रहने के लिए जो हथकण्डे अपनाए थे उनमें अमिताभ बच्चन सहित उनके परिवार के लोगों के ग्लैमर को मतों के रूप में भुनाना, चुनाव से ठीक पूर्व सरकारी खंजाने पर बोझ डालने वाली तमाम लोकलुभावनी घोषणाएं करना तथा अपने विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं से निपटने के लिए ओछे दर्जे के हथकंडे अपनाना व समाजवादी पार्टी की छत्रछाया में पनपने वाले असामाजिक तत्वों की भरपूर पैरवी करना व उन्हें प्रोत्सहित करना तथा पारम्परिक रूप से मुसलमानों का एकमात्र हितैषी बनकर मुस्लिम समुदाय से मतों की दरकार करना आदि शामिल था।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी अपने दो दशक पूर्व के गढ़ उत्तर प्रदेश में सोनिया, राहुल व प्रियंका के साथ चुनाव मैदान में कूदकर उत्तर प्रदेश में नेहरु-गाँधी परिवार के वर्तमान जनाधार को आजमाने का जोखिम उठा रही थी। कांग्रेस को भी यह विश्वास था कि राहुल गाँधी के सार्वजनिक रूप से सड़कों पर उतरने से जहां कुछ सीटों में बढ़ोतरी होगी, वहीं प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में मत प्रतिशत की भी अच्छी खासी वृद्धि होगी। परन्तु कांग्रेस को भी उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप कुछ विशेष हासिल नहीं हुआ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति के इस दंगल में भारतीय जनता पार्टी भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का जबरदस्त और खतरनाक खेल खेल रही थी। गत दो वर्षों से गुप्त रूप से उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके सहयोगी संगठनों द्वारा देखी जा रही थी। भाजपा की उत्तर प्रदेश चुनाव संबंधी रणनीतियों में उत्तर प्रदेश से ही संबंध रखने वाले राजनाथ सिंह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना, प्रदेश में साम्प्रदायिकता का जहर बोने वाली तथा साम्प्रदायिक दंगे भड़काने वाली विवादित सीडी तैयार कराकर इन्हें अपनी चुनाव सामग्री में शामिल करना, सांसद आदित्यनाथ योगी व फायर ब्रांड नेता उमा भारती जैसे भाजपा विरोधी तेवर रखने वाले हिन्दुत्ववादी नेताओं को नियंत्रण में रखकर हिन्दुत्ववादी मतों को विभाजित होने से रोकना, मन्दिर बनाए जाने के अपने घिसे पिटे संकल्प को जनता के मध्य पुन: दोहराना तथा 6 दिसंबर 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के भाजपाई हीरो समझे जाने वाले कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करना जैसी बातें शामिल थीं।
वहीं इन सभी सत्ता के दावेदार समझे जाने वाले राष्ट्रीय दलों की थोथी साबित हो चुकी रणनीतियों से अलग बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने अपनी पारम्परिक दलित राजनीति से अलग हटकर जिस नई 'सोशल इंजीनियरिंग' की संरचना की, वह निश्चित रूप से सभी राजनैतिक दलों से अलग हटकर थी। दलित राजनीति की राह पर चलकर मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री तो जरूर बनीं परन्तु हर बार उन्हें किसी न किसी राजनैतिक दल से गठबंधन करने के बाद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी नसीब हो सकी। राष्ट्रीय राजनीति में भी उन्हें अपेक्षित सफलता न मिल पाने का कारण भी सिंर्फ यही था कि उनकी पार्टी केवल दलित समाज के हितों की ही बात किया करती थी। परन्तु समय रहते मायावती को इस बात का बंखूबी अहसास हो गया कि दलित राजनीति देश में उन्हें एक बड़े नेता के रूप में तो स्थापित कर सकती है और दलित समाज ने यह कर भी दिखाया। परन्तु केवल दलित राजनीति के दम पर वह उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पूर्ण बहुमत के साथ कब्जा बिल्कुल नहीं कर सकती थीं। जाहिर है जब वह केवल दलित समाज को साथ लेकर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर सकीं फिर आंखिर केवल दलित समाज उन्हें देश का नेतृत्व कैसे दिलवा सकता है? अपनी इसी रणनीति को आधार बनाकर गत् तीन वर्षों से मायावती ने उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग का नया खेल खेलना शुरु किया। बहुजन समाज के बजाए सर्वजन समाज की बातें होने लगीं। पूरे प्रदेश में ब्राह्मण समाज व मुस्लिम समाज के सम्मेलन तीन वर्षों तक लगातार आयोजित किए गए जिसमें मायावती ने जनता को यह समझाने का सफल प्रयास किया कि मंदिर या मस्जिद के सपने दिखाने वाले लोगों के द्वारा सत्ता के लिए प्रदेश की जनता को ठगने का प्रयास किया जाता रहा है। वह प्रदेश की जनता को सामाजिक एकता व समरसता का वह पाठ पढ़ा पाने में भी सफल रहीं जो कभी कांग्रेस पार्टी पढ़ाया करती थी। मायावती ने अपनी इस नई सर्वजन समाज रणनीति के द्वारा भारतीय जनता पार्टी की आश्चर्यजनक रूप से उत्तर प्रदेश में वह दुर्गति कर डाली जिसकी भाजपा या संघ परिवार कभी उम्मीद भी नहीं कर सकता था।
बहरहाल चौदह वर्षों बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन होना तथा उत्तर प्रदेश में सक्रिय साम्प्रदायिक शक्तियों को प्रदेश के मतदाताओं द्वारा मुँह तोड़ जवाब दिया जाना न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक सुखद घटना है। अब देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश का सर्वजन समाज जिन उम्मीदों को लेकर मायावती की बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा है, स्वयं मायावती उनकी उन उम्मीदों पर कहाँ तक खरी उतर पाती हैं। और दूसरे यह भी देखना होगा कि अपनी इस नई सोशल इंजीनियरिंग को वह राष्ट्रीय स्तर पर आजमाने का प्रयास करती हैं या नहीं और यदि वह सर्वजन समाज के इस फार्मूले का प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर करती हैं तो उन्हें उत्तर प्रदेश जैसी सफलता भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर भी मिल सकेगी या नहीं।
1630/11, महावीर नगर, अम्बाला शहर, हरियाणा
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