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वातायन |
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जेल जीवन की एक झलक डॉ. राहुल
साहित्य की विविध विधाओं में सार्थक सृजनरत कामतानाथ की पहचान एक सशक्त कथाशिल्पी के रुप में विशेष है । अपने समकालीन-समव्यस्क कथाकारों से पृथक प्लेटफार्म पर उन्होंने अपनी कथाओं का सृजन किया है, जिनमें वर्गीय चेतना और क्रांतिकारी प्रभाव हैं । इनके पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘एक और हिन्दुस्तान’ का नया संस्ककरण हाल ही में प्रकाशित हुआ है, जिसमें जेल-जीवन का तल्ख अक्स पेश किया गया है जो जेल का मिथ, मानव अपराधियों को दी जाने वाली यातनाओं का चित्रण करता है । जेल एक ऐसा स्थान है, जहाँ अपराधी सहज जीवन नहीं बिता सकता । इसके अनेक मनोवैज्ञानिक और मानसिक कारण हैं और यही कारण हैं जिनसे भय खाता हुआ कोई भी शख्स अपराध-बोध से मुक्त रहना चाहता है ।
इस कृति से गुजरते हुए जेल-जीवन से संबंधित वे महान सार्थक सृजन भी सहज ही मस्तिष्क में कौंधते हैं, जिन्हें संसार ने स्य पर पहचाना, समझा और अपनाया । अज्ञेय ने ‘शेखरः एक जीवनी’ का ताना-बाना जेल में ही बुना था, जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है । सुनते हैं, बहादुरशाह जफर ने भी ब्रिटिश कालीन भारतीय जेल पोर्ट ब्लेयर में दुख के दिन गुजारते हुए अपनी मार्मिक शायरी के कुछ अंश रचे थे । कुछ अन्य कृतियां भी हैं, जिन्हें प्रबुद्ध पाठक जानते हैं। कामतानाथ ने प्रस्तुत उपन्यास में सांकेतिक शैली में इस सत्य को बड़ी निपुणता से उजागर किया है ।
कथाकार कामतानाथ ने अपने इस लघु उपन्यास में अभिव्यक्ति और अनुभूति की समानांतर सृजन-क्षमता और निपुणता का परिचय देते हुए प्रशंसनीय कार्य किया है । इस उपन्यास में कथ्य और देशकाल का सुषमित समन्वय हुआ है, साथ ही, सांकेतिकता, संवेदनशीलता और प्रभावान्विति के तत्वों का मौलिक निरुपण इसे जीवंतता प्रदान करता है । लघु कलेवर में आधुनिक बोध को औपन्यासिक रुप देने में लेखक ने अपनी लेखन-शक्ति का समुचित उपयोग किया है, पर इसे शिल्प विकास के एक पक्ष का ही विवेचन कहा जाएगा । इससे पृथक लेखक का कार्य इस दृष्टि से प्रथम व प्रशंसनीय है कि उन्होंने एक अपरिपक्व अल्पायु प्राप्त लघु विधा पर इतनी सुंदर कृति की रचना कर इस श्रृंखला में एक नई कड़ी जोड़ी और हिन्दी कथा-साहित्य को समृद्ध किया । इसका अपना ऐतिहासिक मूल्य-महत्व निश्चित रहेगा ।
संवाद-शैली में रचित इस उपन्यास की सर्वोपारि विशेषता यह है कि पाठक कम से कम समय में इसका अधिक से अधिक आस्वादन करने के लिए उत्सुक होता है । यों प्रबुद्ध पाठक पूर्व में आस्वादन कर चुके होंगे, लेकिन इस बार नवीनता यह है कि यह अपनी आकर्षक साज-सज्जा और कथात्मक टटकेपन से ताजगी लिये है । अतः पाठक पहली बार में इस उत्सुकता से परितृप्त हो जाता है, लेकिन पूर्व परितृप्ति पाने के लिए वह इस का ‘कैजुअल’ पाठक बने बिना नहीं रह सकता । इस तरह के कई अन्य उपन्यास भी लिखे गए हैं । दृष्टांततः अज्ञेय का दूसरा उपन्यास ‘नदी के द्वीप’, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और कुछ अन्य उपन्यास - जिनकी चर्चा प्रासंगिक होते हुए अप्रासंगिक होगी । अस्तु-कथा-सृजन के क्षेत्र में यह औपन्यासिक क्षंखला कितनी लोकप्रिय है, इस पर कुछ कहना उचित न होगा ।
कहना असंगत न होगा कि इसमें पात्र-चरित्र के रुप में कहीं-न-कहीं लेखक स्वयं विद्यमान है और अपने जिए-भोगे को व्यक्त कर रहा है, उससे पाठक को रू-ब-रू करा रहा है । सीमित पात्रों का स्वाबाविक विकास ‘अश्क’ के सृजन-कौशल की याद दिलाता है । रशीद और मित्तर के चरित्र में भव्यता का भाव और त्याग-आत्म बलिदान का अमर संदेश है । पुलिस सब-इंस्पेक्टर की क्रुरता, सुप्रिटेंडेंट की निर्ममता, इसके आगे कोई मायने नहीं रखती, क्योंकि उसका अपने साथियों से पढ़कर कोई दूसरा नजदीकी संबंधी नहीं । जेल की यातना का दिलकश चित्रण पेश है- मैंने रोटियाँ उठाईं । काफी बड़ी-बड़ी, पतली, सुखी हुई रोटियां थीं, जिनमें गर्द ही दर्द भरी थी । मैंने उन्हें आपस में रगड़कर झाड़ा । काफी गर्द और मोटा-सा आटा उनसे झड़ा । इसी प्रकार अन्यत्र भी दारुण दंश के दृश्य दर्शनीय हैं । उपन्यास को पढ़ते हुए समकालीन समाज के बाहरी और भीतरी रंगों का भी बोध होता है । बड़ी सधी शैली और अत्यंत सहज भाषा में संवाद और चरित्रांकन की दृष्टि से यह उपन्यास काफी सफल है । अतः पाठक महसूस करेंगे कि उन्होंने एक सार्थक कृति को पढ़ने में अपना मूल्यवान समय लगाया है ।
इसी तरह से पिछले दिनों कामतानाथ की व्यंग्य कहानियों का एक संग्रह ‘सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ’ प्रकाशित हुआ है । कामतानाथ छवि मध्यवर्गीय जीवन का पारदर्शी किंतु गंभीर चित्रण करने वाले कथाकार की रही है, लेकिन बीच-बीच में उन्होंने कुछ व्यंग्य कथाओं की भी रचना की है । उनका अलग से संग्रह प्रकाशित न हो पाने के कारण इस ओर सुधी पाठकों और आलोचकों का ध्यान नहीं गया है । ‘सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ’ संग्रह के प्रकाशन से कामतानाथ के लेखन के इस आयाम को पाठक सहज ही देख सकेंगे । कामतानाथ के साहित्य को करीब से जानने वाले जानते हैं कि 1960 के आसपास ‘सारिका’ में प्रकाशित उनकी कहानी ‘देवी’ एक तरह से व्यंग्य कहानी ही थी । कामतानाथ की रचनाओं में व्यंग्यधर्मिता और सहज विनोद की प्रवृत्ति सर्वत्र देखी और महसूस की जा सकती है । अलग से उनका रेखांकन करने की जरुरत शायद नहीं है, लेकिन अब जब कामतानाथ ने उस तरह की अपनी कहानियों का अलग से संग्रह प्रकाशित करा ही दिया है तो पाठक सहज रुप से उनकी व्यंग्यधर्मिता का भी आनंद ले सकते हैं ।
n कृति: एक और हिंदुस्तान n लेखक: कामतानाथ n प्रकाशक: भावना प्रकाशन, 26 ए, पटपड़गंज, दिल्ली-91 n मूल्यः 150 रुपए
n कृति:सोवियत संघ का पतन क्यों हुआ n लेखक: कामतानाथ n प्रकाशक: भावना प्रकाशन, दिल्ली n मूल्यः 200 रुपए
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