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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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प्रवासी कविता

 

 

यु.एस.ए. से रेखा मैत्र की कविताएं

 

दूसरा टुकड़ा

खीरे की मानिन्द थी ज़िन्दगी

ढेर सी कड़्वाहट इसमें घुली थी

मैंने जिन्दगी का एक टुकड़ा काट लिया

दूसरे टुकड़े से उसे घिस दिया

सारी तिक्तता निकाल ली

अब बाकी बची है

बस मिठास

पता है?

वह दूसरा टुकड़ा तुम थे !

 

 

 उमस

 तुम्हारी आँखॊं में

ठहरे हुए ये आँसू

जल से भरे बादलों से हैं

बहा डालो इन्हे

वरना माहौल में

घुटन भर जायेगी

 

 

आधा-अधूरा दरख्त

अजीब सा एक

दरख्त देखा आज

आधा कटा , फ़िर भी

खड़ा बेआवाज

जरूर इसे कटने में

तकलीफ़  हुई है

यकीनन बाकी को

बचाने में कहीं

रूह दुखी है

फ़िर भी

अपने बचे खुचे हिस्से से

देता है पनाह

यानी यातना सह्कर

जीने का प्रत्यक्ष गवाह

लगा है , दरख्त से पूछूँ-

"क्या तुम नारी हो?"

 

 

पैबन्द

कपड़ों में पैबन्द लगाने का

चलन पसन्द था मुझे

पर, सम्बन्धों में थिगली लगाना

 नहीं भाता

 

उसी जगह से फ़टते हैं

कपड़े फ़िर बार-बार

 

ठीक वहीं से सीवन उघड़ती है

रिश्ते की भी हर बार

 

रोज रोज की मरम्मत के बावजूद

कुछ समय के बाद

फ़ट ही जाते हैं

 

सारी की सारी ऊष्मा

सम्बन्धों की

उन्हीं सुराखों से

रिसती चली जाती है  

 

दर्द

सोचती हूँ

इन कांधों में इतना दर्द

कहाँ से आकर जमा हो गया है?

मैंने तो कभी  इनका

सिरहाना तक तुम्हें नहीं दिया

 

लगता है

दे पाने का अहसास

कतरा कतरा

रिसते-रिसते

इस तरह इकट्ठा हो गया है ! 

 

Rekha Maitra

12920 Summit Ridge Ter

Germantown

MD 20874

USA

 

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