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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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कविता

 

राम दरश मिश्र की कविताएं

 

संवाद

गाड़ी में मैं हूँ

और मेरे सामने एक अपरिचित बच्चा है

चारों ओर शोर है

लेकिन हम दोनों ख़ामोश हैं

और रह-रहकर आपस में देख लेते हैं

शोर बहता रहा, बहता रहा

और हम यात्रा के अंत तक

यों ही बैठे रह गये

बाहर से चुप रहे

लेकिन आँखों-आँखों में

एक-दूसरे से कितना कुछ कह गये

 

कपड़े

धोबी ने मैल निकालकर

फैला दिये हैं अनंत उजले कपड़े

एक साथ उजली धूप में

खो गयी है

इन कपड़ों की अलग-अलग पहचान

फिर जब ये अपने-अपने घर जायेंगे

तो अंधेरे में भर जायेंगे

अपने-अपने मालिकों की मैल और गंध से

धीरे-धीरे

इनके रंध्रों में बसी

धूप की उष्मा छन जायेगी

 

भवन

मिट्टी का मांस गलाकर ईंटें बनीं

उसके कलेजे को तोड़कर सीमेंट

उसकी ममता के रस में उगे हुए

पेंड़ो को काटकर शहतीरें और किवाड़ बनीं

इन सबको जोड़कर

उसी के बेघर बेटों के काले-काले हाथों

यह भवन बनवाया गया -

आकाश की हँसी पीता हुआ

गर्वोन्नत भवन

अब

मिट्टी को

इसमें झाँकने से डर लगता है ।

 

फूल

दोस्त,

तुम फूल की बात बहुत करते हो

किंतु फूल को जानतो भी हो ?

तुम्हारे लिए तो फूल

बटन-होल में सजाने की चीज़ है

काश,

ऊपर-ऊपर देखने वाली तुम्हारी आँखें

देख पातीं कि फूल

रूप-रस-गंध के लिए

धरती की अंधेरी परतों में जूझने वाला

एक नन्हा-सा बीज है ।

 

झरबेरी

तुम्हारे छोटे-छोटे, प्यारे से दीखते

फूलों पर मेरी दृष्टि अटकी थी

कि तुम्हारे काँटों ने फिर उलझा दिया मेरा दामन

झरबेरी !

कब से चल रहा है यह अनवरत संवाद

है तुम्हें कुछ याद ?

रामदरश मिश्र

दिल्ली

 

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