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कविता |
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डॉ. कमल कुमार की पांच कविताएं
घर लौटी लड़की : 1
धकियाई गई बेघर लड़कियाँ लौट आई हैं दरवाजों-खिड़कियों में उग गई आँखों की चिंगारियों को झेलती खड़ी हैं निष्कवच।
बेआवाज़ खटखटाती हैं दरवाजा नहीं भी खुल सकते कपाट। घर की परिभाषा की भूल-भुलैया में खोई लड़कियाँ चकोरों में धँसी नहीं ढूँढ़ पाती रास्ता।
कोनों में सिकुड़े कागज-सी टिकी हैं। पहिए निकाली गाड़ी पर उन्हें बहुत दूर जाना है।
घर लौटी लड़की :2 बेघर बेइज्ज्त लौटी है लड़की पीड़ा से टीसती अकेली समय पर देगा घाव घावों के निशान भी। बुरे सपने-सा भूल जाओ उसे कहा गया।
पर सपना फैला है खुली आँखों में भयानक यंत्रणा का। धमकियों से सुखाई गई लड़की कैसे देखेंगी सपना भीगे आसमान में इंद्रधनुष का खिले फूल पर डोलती तितली का नीले आसमान से उतरती सुनहली धूप का ?
बेआवाज़ लतियाई जा रही लड़की सपनों से डरी खुली आँखों में सोती है।
घर लौटी लड़की :3 कुछ नहीं बदला था यहाँ बार-बार उसी रास्तों से गुजरती है पर उसके लिए सब बदल गया है रास्ते बंद हो गए हैं।
बदशक्ल हो गए हैं चेहरे उपेक्षा से वक्र पिता का चेहरा नीची नम आँखों से देखती निरीह डरी-सहमी माँ का चेहरा बेबस पर दयार्द्र चिंतित है लोग क्या कहेंगे।
उसे लड़नी है लड़ाई अब पहले अपने खिलाफ़ फिर माँ और पिता के खिलाफ़ जो लाचारी में बीमार हैं बार-बार धकेलते हैं अँधियारे गलियारों में। भीतरी-बाहरी कोहराम से अलग वह सोचती खड़ी है अगला कदम....
घर लौटी लड़की :4 वह घर लौटी है घर से लौट गया है वसंत वह लौटी है बाहर ठहर गई है धूप । ठहर गए सहेलियों के ठहाके बारिश रुक गई है कीचड़ में धँसी कागज की किश्ती। उसे चाहिए प्रवाह, आकाश बादल की छाँह और एक इंद्रधनुष भीतर की नमी में पनप सके जीवन के विश्वास का बीज।
घर लौटी लड़की :5 बैठक में टँगे शादी के बाद के चित्र को दीवार से उतारकर उसने अलमारी के दराज में बंद कर दिया खाली जगह पर ठहर गया है समय। घर के दरवाजों, दीवरों, दीवारों, छतों पर चक्कर लगाता समय बाहर निकलने का रास्ता तलाशता है आसान नहीं होता घरों की खंदकों को लाँघना । पर तो भी सोच एक दरवाजा है उसे वहाँ तक तो जाना ही है।
डी-38, प्रेस एन्कलेव साकेत नई दिल्ली - 110017
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