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कहानी |
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तलाश जारी है जया जादवानी उनका खयाल था, जीवन फिर एक बार खूबसूरत मोड़ ले लेगा, अगर वे सिर्फ एक बार साहस करके इस संकट के पार छलाँग लगा लें। उस बाढ़ के बाद समतल बहती नदी की तरह, जो अपने सारे किनारे एकबारगी तोड़ देती है और पीछे रह जाते हैं, बिखरी हुई रेत के छोटे-बड़े ढूहों की तरह छोटे-बड़े एतराज, चटखे हुए सीप और शंख और जिसे देखने के बाद यह बता सकना मुश्किल होता है कि इसका वास्तविक स्वरूप कौन-सा है - बाढ़ से पहले, बाढ़ के वक्त या बाद में।
और फिर वे उस नदी की तरह उफनते रहे - किनारे तोड़ डालने की निहायत ही बचकानी जिद के साथ, यह माने बगैर कि नदी की खूबसूरती होती ही किनारों की वजह से है। न सिर्फ यह बल्कि यह उसके अस्तित्व की एकमात्र वजह होते हैं। और फिर जैसा कि अक्सर होता है किनारे जल्द ही टूट जाते हैं। उनमें खुद को बनाए रखने की वह जिद, वह ललक, वह कूवत होती ही नहीं, जो अमूमन किसी अस्तित्व के टिके रहने की खास शर्त होती है। लेकिन इसके बाद फिर वह नदी भी नदी नहीं रहती - फिर तो वह पानी का महज फैलाव भर रह जाती है जिसे कोई भी नाम दिया जा सकता है।
फिर उन्होंने आम पंछियों की तरह घोंसला बनाना शुरू किया - चिड़िया के एक जोड़े की तरह जो जंगल का सबसे खूबसूरत वृक्ष चुनते हैं - घना, छायादार और फलदार, एक घोंसले के लिए। और घोंसले का क्या है यह तभी तक बना रह सकता है जब तक कोई आँधी उस समूचे वृक्ष को न हिलाकर रख दे। पर तब तक न वे आँधी की सच्चाई से वाकिफ़ थे, न घोंसले की नश्वरता से।
और आखिरकार जब वह बन गया, उन्होंने तन कर इस तरह सारी दुनिया को देखा कि जो दिखाना था हमें, दिखा चुके। तुम जो कर सकते हो, कर लो।
दुनिया बोलती रही वे सारे शब्द, जिनके मायने चाहे डिक्शनरी में हों या वक्त का आबोहवा में। उनकी न अब उतनी जरूरत होती है, न अब वे उतने विचारणीय होते हैं।
फिर भी कारोबार तो सबसे अधिक शब्दों का ही चलता है - सुबह से शाम तक। फिर रात की वीरान काली चादर पर वे चमकदार सिक्कों की तरह खनकते हैं - जिनका सारा वज़ूद बस एक खनक के बाद ख़त्म हो जाता है और उसके बाद दिखाई देने लगती हैं वे जगहें जो दो शब्दों के बीच होती हैं - खाली और वीरान। और किसी को नहीं मालूम, उन्हें कैसे भरा जाता है ? तब फिर शब्द जोर-जोर से बोले जाते हैं। पर खाली जगहें तो फिर भी खाली रहती है।
उन्हें भी नहीं पता था, उन खाली जगहों को भरने का राज और वे वीरान रातों में अपने चोंच में कुछ शब्दों को दबाए शतरंज की गोटियों की तरह ज़िन्दगी को अलग-अलग खानों में रखकर देख लेते कि कहाँ किस वक्त वे सामने वाले को मात दे दें। और अनन्त सम्भावनाओं से भरा जीवन बिसात की तरह उनके सामने बिछा रहता।
इसी कोशिश में वे वीरानियाँ लगातार बढ़ती गई और उनकी चहचहाहट गुर्राहट में बदल गई। हालाँकि वे दो से दस हो गए - दस हजार। जंगल के कितने वृक्षों पर उन्होंने कब्जा कर लिया और सबसे घने छायादार-फलदार वृक्ष की ख़ातिर वे औरों से हर वक्त लड़ते रहते । चूँकि उस वृक्ष पर पहला घोंसला उनका था और हमेशा उनका ही रहना चाहिए। पहला घोंसला – पहला हक। जबकि उस वृक्ष की जड़ें तमाम मानवीय कारणों से सड़ रही थीं और ज़मीन पर उनकी पकड़ निरन्तर ढीली पड़ती जा रही थी पर इससे किसी को कोई मतलब नहीं था। उन्होंने अन्य तमाम सुन्दर वृक्षों में दे दिया जिनकी खातिर वे दूसरों से हर वक्त जंगली जानवर की तरह लड़ते- अपने नाखून- अपने दाँते-अपनी आँतों में छिपाए।
और फिर सारी जद्देजहद बस इसी के लिए होने लगी। जब वे लड़ते-मासूम पंछी व जानवर इधर से उधर शरण की खोज में भटकते । बाद में जब ये लड़ाइयाँ उग्र रूप ले लेतीं - वे इन मासूमों को अपने सामने रखते और खुद पीछे हो लेते।
जब वे मर-खप जाते, उनके स्मारक इधर-उधर फालतू जगहों पर बनाए जाते और उन्हें शहीदों का दर्जा दिया जाता ।
और वह मासूम चिड़िया, जिसने इस घोंसले से अपने जीवन की शुरुआत की थी - वह ख्वाब कब का काफ़ूर हो चुका था और अब उसे यह घोंसला रास नहीं आ रहा था।
फिर वह फुर्र से उड़ चली - किसी और पंछी की चाह में - किसी और पंछी के डेरे में। पर डेरे तो फिर भी डेरे होते हैं - उनमें वही ऊब, वही तनाव, वही बन्दिशें, वही साजो-सामान होती है, जिनसे किसी भी ज़िन्दगी के मुकम्मल होने की उम्मीद जुड़ी होती है, पर जो किसी को भी बाँधे रखने में असमर्थ होता है। सो उसकी भी उड़ान जारी है - मनचाही जगह - मनचाहे साथी के लिए - और-साथियों को भी घर नहीं साम्राज्य चाहिए - आकाश नहीं, सरहदें चाहिए - जिन्हें अपना कहा जा सके, जिन पर गर्व किया जा सके। सो दोनों की तलाश जारी है - एक की घर के लिए - दूसरे की साम्राज्य के लिए।
कस्तूरबा नगर, जरहाभाठा बिलासपुर, छत्तीसगढ़ - 495001
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