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इन दिनों |
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हिन्दी पत्रकारिता का बढ़ता दायरा और चुनौतियाँ सरमन नगेले
हिन्दी पत्रकार की छवि अब झोला छाप निरीह कवि की नहीं है बल्कि अब वह ज्यादा स्मार्ट है और उसमें किसी भी हाल में स्टोरी ''जुगाड़''' लेने की हिम्मत है। हिन्दी समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों और न्यूज पोर्टलों की ही पहुँच देश में ही नहीं विदेशों में भी सबसे ज्यादा है वे ही सबसे अधिक पढ़े और देखे जाते हैं और इनकी ही प्रचार व दर्शक संख्या सबसे अधिक है। इस तरह हिन्दी पत्रकारिता का पूरा चेहरा ही अब चमकने लगा है।
बतौर बानगी कुछेक हिन्दी भाषी समाचार पत्र दैनिक भास्कर, न्यूज चैनल एनडीटीवी, आजतक, नेट संस्करण बेव दुनिया और एमपीपोस्ट सरीखे हिन्दी के प्रखर समाचार पत्रों ने अपनी आवाज बुलन्द करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लगभग आधी सदी पहले भारतीय संविधान सभा ने मूलभूत अधिकारों पर बहस की। इनमें से एक धारा 19 जो अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी से संबंधित है। पत्रकारिता का पवित्र पेशा इसी धारा की परिधि के अन्तर्गत आता है।
आज जिस प्रकार से व्यवसा-यिकता पत्रकारिता को अपने आगोश में ले रही है उससे जनसंचार माध्यमों का वास्तविक स्वरूप प्रभावित हो रहा है। किसी दौर में सिर्फ और सिर्फ मिशन थी पत्रकारिता। इसी रूप में उनका जन्म भी हुआ। कालान्तर में इसने वक्त की जरूरतों को अंगीकार करते हुए व्यवसायिक स्वरूप का वरण किया जबकि जरूरत थी मिशन और स्वरूप में जनहितकारी संतुलन की। आज पत्रकारिता के सामने उसी साख, पेशे की पवित्रता तथा समाज के प्रति उसके दायित्व की सबसे बड़ी चुनौती है।
पत्रकारों के सामने खासकर प्रादेशिक और जिला स्तर के अखबारों और उनसे जुड़े पत्रकारों के सामने यह भी खतरा हमेशा बना रहता है कि जब भी उनकी लेखनी से जो भी वर्ग प्रभावित होता है उस वर्ग की नाराजगी के गंभीर नतीजे पत्रकारों को भुगतने होते हैं। पत्रकारों की लेखनी से तिलमिलाने वाले अफसर, अपराधी और राजनीतिज्ञ अवसर मिलते ही अखबार और उससे जुड़े पत्रकार का दिमाग ठिकाने लगाने का भरपूर प्रयास करते हैं। इन तमाम खतरों के बावजूद ईमानदारी से सच लिखने वाले समाचार पत्र और पत्रकारों की कमी नहीं है। गोपनीयता का कानून भी पत्रकारिता की राह का सबसे बड़ा अवरोध बनता है। पत्रकारिता का संकट केवल यही नहीं है कि मीडिया में राजनीति पर सबसे ज्यादा ध्यान और स्थान दिया जाता है। बल्कि बड़ा खतरा यह है कि समाचार माध्यम कहीं राजनीति की सीढ़ी, कहीं राजनैतिक दलों और नेताओं के पैरोकार, कहीं उनके औजार और हथियार भी बन रहे हैं।
पत्रकारिता और साहित्य के बीच घनिष्ठ एवं अंतरंग संबंध है। ये एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं तथा एक-दूसरे के प्रेरक और पूरक बनकर देश और समाजहित के विविध कार्यों में अपना महत्वपूर्ण योग देते रहे हैं।
पत्रकार और साहित्यकार दोनों ही शब्द ब्रह्म के आराधक होते हैं तथा अपनी लेखनी का सही सार्थक प्रयोग करते हुए समाज के हित संपादन का गुरूतर दायित्व सम्हालते हैं।
हिन्दी पत्रकारिता के जन्म ही नहीं, बल्कि उसकी नींच निर्माण का ऐतिहासिक कार्य भी कलकत्ता से ही आरंभ हुआ। स्मरणीय है कि यह कार्य उस युग में हुआ था, जब कदम-कदम पर अनेक विष-बाधाएं उपस्थित थीं। पत्रकारों को एक ओर सरकारी दमन-नीति से लड़ना पड़ता था, दूसरी ओर हिन्दी-भाषी समाज की कूप-मण्डूकता से उन्हें जूझना पड़ता था। लड़ाई बड़ी कठोर थी। बंग भूमि को जहाँ हिन्दीका प्रथम समाचार पत्र प्रकाशित करने का गौरव प्राप्त हुआ, वहीं हिन्दी का सर्वप्रथम दैनिक समाचार पत्र समाचार सुध वर्षण भी सन् 1854 में कलकत्ता में ही प्रकाशित हुआ था। पत्रकारिता तो वैसे भी स्वयं करने, सीखने और कौशल अर्जित करने की कला है। पत्रकार तभी तक पत्रकार है जब तक वह जन सामान्य से जुड़ाव बरकरार रखता है। पत्रकार द्वारा लिखे गए और अखबार के जरिये पाठक के समक्ष परोसे गए शब्दों के बारे मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि किसी भी स्तरीय दैनिक समाचार पत्र के प्रत्येक अंक में औसतन 40-50 हजार शब्द होते हैं।
पाठक को यह विश्वास होना चाहिए कि छपा हुआ हर शब्द ईमानदारी से लिखा गया है और उसके पीछे कोई दुराग्रह नहीं है।
''यह हिन्दी पत्रकारिता है जो चाहती है अन्तर्मन से खुद का और सबका भी सुधार, यह हिन्दी पत्रका-रिता है हिन्दी पत्रकारिता''।
संपादक एफ- 45/2, साउथ टी.टी. नगर, भोपाल
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