ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार-वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

हिंदी-विश्व

 

 

सुदुर देश में हिन्दी का मह्त्व


उमेश ताम्बी

 

हिन्दी हम भारतीयों कि राष्ट्रभाषा है और अनेक भारतीयों ने इसे मातृभाषा के रूप में भी स्वीकार किया हैं। विश्व में हिन्दी चंद भाषाओं में से एक है ,जिसमे उच्चारण के अनुसार शब्द लिखे और पढ़े जा सकते है , इसी कारण हिन्दी जानने वालों को अन्य भाषा के शब्दों के उच्चारण करने मे असुविधा नही होती।  जहाँ हिन्दी में मात्राओं और अक्षरों का अत्यंत मह्त्व है  उदारणार्थ -

"वह पिता है" - " वह पीता है" -" वह पीटा है"-

"वह चिता है"-" वह चीता है"-" वह चिंटा है"

वहीं हिन्दी भाषा का मह्त्व विश्व की अनेक प्रचलित भाषा की तुलना मे कोई कम नही है |  संपन्न शब्कोश से परिपूर्ण हिन्दी भाषा का प्रसार अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नही हो पाया यह एक विडंबना ही तो है !

 

आमतौर पर अनिवासीय भारतीय जब मातृभूमि से बाहर सुदुर देश मे व्यवसाय, अध्ययन, धर्नाजन इत्यादि हेतु प्रस्थापित होने लगते हैं तब समय परस्थिति अनुसार उनका रीति-रिवाज़, घर-परिवार, साहित्य-भाषा और संस्कृति से संबंध क्षीण होने लगता हैं, मानो ग्रीष्म तु में नदी का जल सूख कर उसे दो तटों में अलग करने का असफ़ल प्रयास कर रहा हो हालाँकि वर्षा तु के आगमन से नदी जलमग्न हो जाती है और सर्वत्र हरीयाली खुशहाली बिखराती है दोनों तट भी जुड कर एक हो जाते हैं इसी तरह यदि हिन्दी भाषी जनसमुदाय परिवार जो दूर देशों मे बस रहें हैं हिन्दी का प्रयोग आपस की बोलचाल, वार्तालाप एवं -मेल आदि के लिये करने लगे तो संभव है की ये प्रयास सेतु-बंध का रूप ले जिससे नदी भी ना सूखे और उस पर निर्मित सेतु निरंतर आवागमन के लिये उपयोगी सिद्ध हो सके।

 

बहुत से भारतीयों का भ्रम है की अगर बच्चों से घ्रर में हिन्दी में बात की जाय तो वे अमेरिकी स्कूलों में पिछड़ जायेंगे या बुद्धू कहलायएगें वैज्ञानिक ढंग से किये गये सर्वेक्षणों मे यह पाया गया है की एक से अधिक भाषा जानने वाले विघार्थी सशक्त विचारक होते है और अध्यन में उनकी मातृभाषा का ज्ञान बाधक नहीं बल्की सार्थक सिद्ध होता है। विदेशों में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दिलवाना कठिन कार्य है, इसकी सफ़लता मे परिवारजनों का योगदान अत्यंत आवश्यक एवं अनिवार्य है। प्राय ये देखा गया है की विदेशों मे नयी पीढ़ी को इस भाषा का ज्ञान हिन्दी सिनेमा या हिन्दी- अंगरेज़ी मिश्रित टीवी मनोरंजन द्वारा ही मिलता है जो अस्थायी और अपर्याप्त है, मानो वर्षा का पानी भूमि पर बरस कर समुद्र के खारे पानी में बह कर मिल रहा हो। हिन्दी का उपयुक्त संचार करने के लिये यथा संभव बोलचाल में प्रयोग करें, हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखें और सीखायें जिससे एक ओर हमारा युवा वर्ग अपनी राष्ट्रभाषा मे निपुण हो सके और दूसरी ओर हम स्वंय विरासत में प्राप्त इस संपदा का उपभोग कर सकें।

 

इस युग में समय का सदउपयोग अत्यंत अनिवार्य है साथ ही साथ मन पसंद कार्यों के लिये समय निकालना भी आवश्यक है, आजकल हिन्दी सीखने और सिखाने के प्रचुर साधन इन्टरनेट मे सामान्य क़ीमतों पर अथवा मुफ़्त मे उपल्ब्ध है।

 

विभिन्न हिन्दी पत्र - पत्रिकायें, चिठ्ठे ( ब्लॉग ), कविताओं के फ़ोरम जैसे माध्यम, बीते हुये युग की याद दिलाते है और पराग, चंपक, अमर चित्र कथा, धर्मयुग, सरिता-मुक्ता जैसी पत्रिकाऐं आँखों के सामने मंड़राने लगती है ! ऐसा लगता