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हिंदी-विश्व |
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हिंदी की मूरति प्रेम जनमेजय
(वेस्टइंडीज में हिंदी शिक्षा पर आत्मीय मूल्याँकन) तुलसी ने प्रभु के लिए लिखा है, 'जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी'। आजकल हिन्दी भी प्रभु की मूरति हो गई है और अनेक रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर रही है । किसी के लिए हिन्दी विवशता है, किसी के लिए नौकरी, किसी के लिए अपनी अस्मिता की पहचान का प्रतीक, किसी के लिए अपनी अभिव्यक्ति को रचनात्मक एवं सौंदर्यपूर्ण आकार देने का माध्यम और किसी के लिए राजनीति के अखाड़े में दंगल करने का यंत्रा और मंत्रा । अपनी-अपनी भावना के अनुरूप कुछ हिन्दी के चरणों में नतमस्तक हैं और कुछ के चरणों में हिन्दी नतमस्तक है । जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे इस माता का ऐसे ही उपयोग और तिरस्कार समान भाव से करते हैं जैसे संयुक्त परिवार में रहने वाला विवाहित पुत्रा अवसरानुसार एवं निर्देशानुसार करता है तथा जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं रही है वे अपनी विदेशी हो चुकी मां का सम्मान ऐसे ही करते हैं जैसे हम विदेशी हिन्दी विद्वानों का करते हैं ।
हिन्दी का भी भूमंडलीकरण हो गया है । हिन्दी मात्रा अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक भाषा ही नहीं है अपितु वह बाजार को विवश कर रही है कि वह उसकी ताकत को स्वीकारे । कभी भाषा और पानी कुछ कोस बाद बदल जाते थे परन्तु आज हालात यह हैं कि हर कदम पर बोतल में बंद एक ही स्वाद से युक्त तथाकथित मिनरल जल मिलता है और दिल्ली जैसे नगर के किसी भी कोने में एक साथ हिन्दी के अनेक रूप कानों में रस घोलने लगते हैं। दूरदर्शन पर ही लगता है कि जैसे प्रत्येक चैनल की हिन्दी अपना ही इस्टाईल मार रही है । विज्ञापनों की भाषा, समाचारों की भाषा, धारावहिकों की भाषा और हिन्दी फिल्मों से अपनी रोजी - रोटी ( ! ) चलाने वाले बेचारे हीरो हिरोईन की कब्जीयुक्त हिन्दी-भाषा ने आपके कानों में अनेक प्रकार के रस घोले ही होंगें । वैसे तो आपके पब्लिक स्कूली होनहार की अध्यापिका या अध्यापक आपसे हिन्दी में बात करके अपना स्तर नहीं गिरायेगी गिरायेगा और अगर उसने गिरा भी लिया तो जो हिन्दी उनके श्रीमुख से निकलेगी उसे सुन आप ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि हिन्दी का जो होना है हो, भाषा के कारण इनका स्तर न गिरे । सरल आसान आम आदमी की भाषा आदि के नाम पर हिन्दी से जो बलात्कार हो रहा है उसे एक अच्छे नागरिक की तरह आप नज़र अंदाज कर ही रहे होंगें । 'चैनली हिन्दी समाचारों' में भाषा की सरलता के नाम पर जो अंग्रेज़ी का कुमिश्रण होता है उसे देखकर तो यही लगता है बेचारी हिन्दी बहुत गरीब है जिसके पास शब्द नहीं हैं और समर्थ अंग्रेज़ी कितनी उदार है कि वह हिन्दी को शब्द दे रही है । मैंनें अनेक हिन्दी समाचारों में 'आसान हिन्दी' के नामपर अंग्रेज़ी शब्दों का जो मिश्रण देखा है उससे तो अनेक बार भ्रम होने लगता है कि यह समाचार हिन्दी के हैं या अंग्रेज़ी के । फिर मेरा देसी मन मुझे डांटता है कि रे जड़ तूने कभी अंग्रेज़ी के समाचारों में हिन्दी के वाक्यों को सुना है जो ऐसी शंका करता है । अंग्रेज़ों ने हमपर शासन किया था कि हमने उनपर ! आज जो वे अपने माल को बेचने के लिए तेरी तुच्छ हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं, तेरी हिन्दी को अपनी अंग्रेज़ी से समृद्ध कर रहे हैं तो तूं उनका अहसान मान और नतमस्तक हो जा । अंग्रेज़ी बोलने में जो गौरव है वो हिन्दी बोलने में कहाँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ते समय मैंनें अक्सर अनुभव किया कि विद्यार्थी हिन्दी और उसके पढ़ाने वाले को बहुत फालतू-सी वस्तु समझते हैं ।
अत: आज से चार वर्ष पूर्व जब मुझसे कहा गया कि मैं सुदूर, सहस्त्रों मील लांघकर, वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाने जाउँ तो मेरा चौकना स्वाभाविक था । मैं वेस्ट इंडीज को क्रिकेट की शब्दावली में जानता था और त्रिनिडाड का नाम मैंनें 1996 में होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर 'गगनांचल ' के विशेषांक की तैयारी के लिए सामग्री संकलित करते हुए कुछ जाना था । कुछ - कुछ जाना कि वहाँ 46 प्रतिशत जनसंख्या भारतीय मूल के लोगों की है, जाना कि वहाँ भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के लिए भूख है । उस देश के बारे में उत्सुकता जागी और धीरे-धीरे समय के आवरण ने उसे ढंक दिया । परन्तु तीन वर्ष बाद ही जब वहाँ जाने का अवसर मिला तो अनेक उत्सुकताओं ने प्रच्छन्न प्रश्नों से घेर लिया । शब्द किसी भी स्थल का खाका तो खींच सकते हैं और उन शब्दों से हम किसी भी स्थल को शब्द-शिल्पी की दृष्टि से जान सकते हैं परन्तु उसे अपने अनुभव का हिस्सा तो हम उसे अनुभूत करके ही बना सकते हैं ।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्ष के प्रथम माह, 13 जनवरी, 1999, में जब मैं त्रिनिडाड के लिए चला तो एक लम्बी हवाई-यात्रा के सुखद अनुभव पाने की कल्पना से अधिक भरा हुआ था और अपनों से दूर एक अनजान देश जाने की आशंका से कम । वहाँ जाकर हिन्दी ही तो पढ़ानी थी जिसे मैं पिछले 27 वर्षों से पढ़ाता रहा हूँ और एक ऐसे देश में ही तो रहना था जहाँ 46 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं । इसमें आशंका का क्या प्रश्न ! परन्तु अनेक बार जो चीजें सरल लगती हैं वही बहुत कठिन होती है । पहली बार अनुभव हुआ कि आप अपनों से जितना दूर जाते हैं उतना ही उनके करीब हो जाते हैं । पहली बार जाना कि अपने देश की मिट्टी गंध क्या होती है । मैंनें अपने इस अनुभव को अपने एक लेख में लिखा भी है कि संतों का कहना है कि पहला प्यार, पहला भ्रष्टाचार, पहली रचना, पहला पति/पत्नी, अर्थात् जो भी पहला हो वह सदा याद रहता है । सन् 1999 से के आरम्भ में मेरे जीवन में बहुत कुछ पहला- पहला घट गया । यह पहला अवसर था कि मैंनें हजारों किलोमीटर की हवाई यात्रा की और पहली बार त्रिनिडाड पहुंच गया । यह पहला अवसर था कि मैं स्वदेश, स्वजन, स्वपत्नी, स्वमित्रों आदि ‘स्वों’ से दूर एक लम्बे अंतराल के लिए भीड में भी अकेला रहने को विवश हुआ । ऐसी 'पहली' उर्वर-भूमि उपस्थित हो तो त्रिनिडाड जैसे देश से पहली नजर में प्यार होना स्वाभाविक ही है । प्रथम- प्रेम दृष्टि में ऐसी धुंध उत्पन्न करता है कि दूर दृष्टि धुँधला जाती है और सावन के अंधे सा व्यक्ति सब कुछ हरा ही देखता है । भारत से बाहर निकलते ही मन हिंदी और हिंदुस्तान के लिए भावुक हो जाता है । विदेश में कोई भारतीय चेहरा दिखाई दे तो मन उसे लपककर पकडना चाहता है और यदि 'एतराज' न हो तो गले भी लगाना चाहता है । टूटी-फूटी ही सही, हिंदी सुनने को मिल जाए तो मन गदगद हो जाता है । ऐसी ही भावुकता ने मेरे मन मे भी जन्म ले लिया । (ऐसे जन्म देने के लिए अपनी धरती बहुत उपजाउ है ।) त्रिनिडाड हवाई अड्डे पर मुझे भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के अतिरिक्त वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय के डीन श्री विष्णुदत्त सिंह भी लेने आए थे । मैंने जब यह नाम सुना तो लगा कोई अपना मिल गया । कार में बैठा तो 'बैजू बावरा' फिल्म के गीत, 'तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा' ने किया । मन झूम उठा । मैंनें सोचा कि यह एक भारतीय के स्वागत का त्रिनिडाडीय तरीका हो सकता है - गाने का टेप लगा दिया ।
त्रिनिडाड पहुँचने पर मुझे लगा कि मेरे सामने अनेक चुनौतियाँ हैं । यहाँ हिन्दी पढ़ाना ऐसा नहीं है जैसे मैं भारत में, एक बन बनाऐ ढर्रे पर, पढ़ाता रहा हूँ । अनेक विसंगतियों से भरा है यहाँ का भारतीय समाज । यहाँ के निवासी चाहे भारतीय मूल के हैं : रोटी, करेली, बैंगन, निमकहराम, चोखा, आदि दैनिक व्यवहार में हिन्दी के शब्द हैं, परन्तु हिन्दी उनके दैनिक व्यवहार की भाषा नहीं है । हिन्दी के शब्द एफएम स्टेशनों के द्वारा हिन्दी फिल्मों के गीतों के रूप में चौबीसों घंटे हवा में तैरते हैं परन्तु उनके अर्थ समझने वाले एक प्रतिशत लोग भी नहीं हैं । हर त्यौहार पर मन्दिरों में लोग बढ़ी श्रद्धा से भजन गाते हैं, भारतीय संगीत प्रत्येक कार्यक्रम का अभिन्न अंग है और उसकी धुन उनके हृदयों का स्पर्श अवश्य करती है परन्तु अर्थ उन तक पहुँच नहीं पाते हैं । पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों से भारत से हिन्दी के अध्यापक विश्वविद्यालय निहरेस्ट में हिन्दी पढ़ाने आ रहे हैं परन्तु हिन्दी के कदम आगे नहीं बढ़ रहे हैं । हिन्दी के अनेक ऐसे छात्रा हैं जो हिन्दी के प्रति अपनी असीम भूख के कारण एक ही पाठयक्रम को बार- बार पढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके लिए उच्च शिक्षा का पाठयक्रम ही नहीं है । निश्चित पाठयक्रम पर आधारित हिन्दी की नियमित शिक्षा मात्र वेस्ट इडीज विश्वविद्यालय में दी जाती है और यह शिक्षा भी प्राथमिक-स्तर की है । अतिथि आचार्यों ने पाठयक्रमों में बदलाव के प्रयत्न किए पर वह सम्भव नहीं हुए । तुलसी और कबीर के प्रशंसकों के इस देश में इनके साहित्य की शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं । किसी भी भाषा के शिक्षण के लिए उस भाषा का माध्यम के रूप में प्रयोग होना चाहिये परन्तु यहाँ अंग्रेज़ी की बैसाखी की आवश्यकता है । अनेक वर्षों तक हिन्दी का अध्ययन करने के पश्चात् भी ट, ठ, ड आदि का उच्चारण एवं ड़ के स्थान पर र का उच्चारण आदि अनेक समस्याएं थी जो अपना समाधान चाहती थीं ।
कुछ महीनों में मुझे समझ आ गया कि इनकी हिन्दी का विद्वान् बनने में कोई रुचि नहीं है, ये तो बस थोड़ी-सी हिन्दी और थोड़ा हिन्दू धर्म और संस्कृति से संतुष्ट होने वाले जीव हैं । मुझे समझ आ गया कि परम्परागत रूप से मात्रा हिन्दी पढ़ाना ही मेरा धर्म नहीं होगा अपितु भाषा और संस्कृति के दूत के रूप में मुझे कार्य करना होगा । आधुनिक कम्प्यूटर तकनीक का प्रयोग करना होगा । इनके विकास के लिए साहित्य की अहम् भूमिका को पाठयक्रम का हिस्सा बनाना होगा । तुलसी-साहित्य के माध्यम से, भक्ति से साहित्य की ओर उन्मुख कर भाषा के सार्थक रूप से इनका परिचय कराना होगा । भाषा के व्यावहारिक पक्ष पर बल देना होगा ।
मैंनें पाया कि मन्दिरों, रेडियो, वैवाहिक अवसरों और त्योहारों पर हिन्दी के शब्द चाहे सुनाई देते हैं परन्तु हिन्दी बोलने के अवसर न के बराबर हैं । हिन्दी जानने वाला भी हिन्दी बोलने मे संकोच करता है । ज़ोर देने पर, टूटे-फूटे एक दो वाक्य हिन्दी के बोलने के बाद भारतवंशी अंग्रेज़ी पर उतर आते हैं । हिन्दी सब जगह है पर कहीं नहीं है । हिन्दी बोलने वालों के लिए कोई वातावरण नहीं है । आवश्यकता ने एक प्रयोग करवाया, बातचीत सभा का । मई 1999 को अपने अच्छे मित्रा और शिष्य राजन महाराज के सहयोग से 'बातचीत सभा ' का प्रयोग कर डाला। थोड़ी बहुत हिन्दी से लेकर अच्छी हिन्दी जानने वाले प्रत्येक शनिवार शाम का दो - तीन घंटे के लिए एकत्रित होंगे और कैसी भी हिन्दी में कुछ भी बोलेंगे । शर्त यही थी की जो भी बोलेंगें केवल हिन्दी में बोलेंगे । सभी के लिए यह नया और आकर्षक प्रयोग था और वे उत्साही भी थे । 30 के लगभग हिन्दी प्रेमी आए, 16 से 50 वर्ष तक की आयु के । साढ़े पांच बजे आरम्भ हुई सभा बातचीत के अभाव में साढ़े छह बज तक बहुत कठिनाई से खिंचकर समाप्त हो गई । मुझे लगा प्रयोग असफल रहा और कोई नहीं आएगा परन्तु अगले शनिवार 35 लोग आए । हमारी सभा बहुत ही अनौपचारिक रहती, कहानियाँ चुटकले, फिल्मी गीतों के अर्थ, छोटी-छोटी कविताओं तथा मेरी पत्नी के चाय पकौड़े और विभिन्न भारतीय व्यंजनों के कंधे चढ़ी ये बातचीत सभा लगभग दो वर्ष तक चलती रही और सिल्विया मूदी ने अपने सेंटर फॉर लर्निंग लैंग्वेज तथा राजन महाराज जैसे अनेक हिन्दी अध्यापकों ने इसका प्रयोग अपने-अपने क्षेत्रों में किया । इसी प्रकार एक मिनट में आप हिन्दी के कितने शब्द बोल लेते हैं जैसी प्रतियोगिताओं ने हिन्दी को नये रूप में सिखाया । उच्चायोग द्वारा त्रिनिडाड हिन्दी सेवियों को सम्मानित करने के शुभारम्भ ने हिन्दी प्रेमियों में अतिरिक्त उत्साह भरा ।
हिन्दी दिवस को भारतीय उच्चयोग के परिसर के अतिरिक्त रवि महाराज के हिन्दू प्रचार केन्द्र तथा प्रोफेसर हरिशंकर आदेश के भारतीय विद्या संस्थान में आयोजित करना एक अच्छी शुरुआत रही । त्रिनिडाड में हिन्दी की एक मात्रा संस्था 'हिन्दी निधि' है जो चंका सीताराम की अध्यक्षता में सक्रिय है परन्तु प्रो0 हरिशंकर आदेश का भारतीय विद्या संस्थान और रविजी का हिन्दू प्रचार केंद्र हिन्दी के प्रचार - प्रसार में बहुत सक्रिय हैं । प्रो0 आदेश त्रिनिडाड क्या पूरे कैरेबियाई देशों का एक मात्र ऐसा साहित्यिक व्यक्तित्व जो संगीत में भी पारंगत है । उनके लिखे अनेक हिन्दी गीत और भजन त्रिनिडाड और टुबैगो के आकाश मे गूँजते हैं । भारतीय विद्या भवन अनेक स्तरों पर हिन्दी के अध्ययन अध्यापन के पाठयक्रम चलाता है । रवि महाराज ने मेरे साथ मिलकर मई 2002 में त्रिनिडाड में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर योजना बनाई थी कि उन्हीं दिनों आरम्भ हुए 'शक्ति' एफएम चैनल पर प्रति रविवार दस मिनट के हिन्दी में समाचार प्रसारित किए जाएं परन्तु कुछ कारणों से वह योजना सफल नहीं हो पाई । भारतीय उच्चायुक्त विरेन्द्र गुप्ता ने त्रिनिडाड वासियों का हिन्दी फिल्मों गीतो और भजनों के प्रति प्रेम और उन्हें समझ न पाने की विवशता को देखते हुए सौ लोकप्रिय गीतों के अनुवाद उच्चायोग द्वारा प्रकाशित करने की योजना बनाई है ।
सूरीनाम, फिजी, गुयाना, जमैइका, मॉरिशस, त्रिनिडाड और टुबैगो आदि ऐसे देश हैं जहाँ रहने वाले भारतवंशियों का चरित्र बहुत कुछ एक जैसा है । आर्थिक परिस्थितियों की विवशता में अपनों से दूर गए इन भारतवंशियों ने इन देशों में एक ऐसे लघु भारत का निर्माण किया है तथा भाषा और संस्कृति को जो जिंदा रखा है, इसके कारण इन पर गर्व होता है । बाहर से देखने पर इनमें एक यह समानता दिखाई देती है । परन्तु जैसे वेस्ट इंडीज क्रिकेट शब्दावली में एक है परन्तु अर्थव्यवस्था की और राजनैतिक व्यवस्था भिन्न है वेसे कैरेबियाई देशों में भारतीय संस्कृति, धर्म और हिन्दी के प्रति भूख तो एक जैसी है पर ग्रहण और प्रस्तुति के स्तर पर भिन्नताएं भी है । हिन्दी की जो स्थिति गुयाना में है वो सूरीनाम में नहीं और जो सूरीनाम में है वो त्रिनिडाड में नहीं । कैरेबियाई देशों में हिन्दी का स्वर मुख्य रूप से सूरीनाम, गुयाना, जमैइका और त्रिनिडाड टेबैगो में तो सुनाई देता है ही साथ ही गुऑडलूप, बारबोडॉस, कुरासॉव जैसे अनेक छोटे द्वीपों में भी सुनाई देता है । पर एक बात इन सभी देशों में समान रूप से पाई जाती है, भाषा और संस्कृति के प्रति अनन्य भूख और सम्मान का भाव । यहाँ हिन्दी बोलने वाला शर्मिंदा नहीं होता है अपितु गर्व से सर उठता है । हिन्दी के अतिथि आचार्य के के रूप में सम्मान और प्रतिष्ठा मुझे अपेक्षा से अधिक मिली है ।
इस क्षेत्र में हिन्दी व्यावसायिक दृष्टि से भी अपनी भूमिका निभा रही है, परन्तु इसकी मात्रा बहुत कम है । हिन्दी के प्रति भूख के कारण हिन्दी अध्यापको की पर्याप्त मांग है, परन्तु यह मांग हिन्दी-अध्यापन को दिशाहीन भी कर रही है । मात्र दो-तीन वर्ष तक हिन्दी का अध्ययन करने वाला विद्यार्थी हिन्दी का अध्यापक बन जाता है और बिना किसी उचित प्रशिक्षण के पढाना आरम्भ कर देता है । अधिकांक्ष हिन्दी अध्यापक बिना किसी नियमित पाठयक्रम तथा पाठय पुस्तक के पढ़ा रहे हैं । अधिकांश उपलब्ध पाठय-पुस्तकें भारतीय परिवेश को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं, स्थानीय चरित्र के अनुरूप पाठय-पुस्तकों को तैयार करवाया जाना बहुत ही आवश्यक है । उच्चारण पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अत: इस क्षेत्र के हिन्दी अध्यापकों के लिए समुचित प्रशिक्षण के साथ-साथ नियमित पाठयक्रम की अत्यधिक आवश्यकता है। आवश्यकता है इन क्षेत्रों में हिन्दी के कार्यक्रमों को दिशा देने की । कैरेबियाई क्षेत्रों में होने वाले सम्मेलन इस क्षेत्र में काम करने वालों का उत्साह बढ़ाते हैं परन्तु आवश्यकता इस बात की भी है कि इन सम्मेलनों को मेलो का रूप देकर ही समापन न किया जाए अपितु उसे सार्थक दिशा दी जाए ।
73 साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार नई दिल्ली - 110063
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