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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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हिंदी-विश्व

 

 

गयाना में भारतीय संस्कृति और हिन्दी


नारायण कुमार

 

क्षिण अमरीका में छोटे-छोटे 365 द्वीपों को मिलाकर बने गयाना में 50 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इस देश मी राजधानी जार्ज टाउन सहित डेमरारा, बरबीस और एसीक्यूबो तीनों राज्यों में भारतीय तीज-त्यौहार, पूजा-पाठ बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। आज भी होली और दीपावली उनके राष्ट्रीय त्यौहार हैं तथा रामचरितामानस और गीता उनके समादृत धर्म-ग्रन्ध हैं। देश के रेडियो एवं टेलीविज़न पर हिन्दी गीतों के कार्यक्रम होते हैं तथा सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्में निरन्तर प्रदर्शित की जाती हैं। यद्यपि गयाना की नई पीढी़ के लिए हिन्दी बोलचाल की भाषा नहीं है, लेकिन रामचरितामानस, सत्यार्थ प्रकाश, गीता आदि भी वे पढ़ते-समझते हैं।

 

विश्व-विख्यात नाविक कोसम्बस ने 1498 में दक्षिण अमरीका के इस उत्तर-पूर्वी तट को देखा था जिसे बाद में संसार स्वर्ण द्वीप (एल-टोराटो) के रूप में जानने लगा । चूंकि इस क्षेत्र में काफी नदियाँ थीं और अपार जल-भंडार था इसलिए इसे गाइना कहा जाने लगा जो एक अमरीइंडियान शब्द हैं, जिसका अर्थ होता है- अनेक जलराशियों का देश। यह वाइना से निकला हुआ शब्द है जो आज भी अमरीइडियन लोगों के बीच पानी का पर्याय है। इस स्वर्ण द्वीप की तलाश में कोलम्बस के बाद भी अनेक नाविक आए लेकिन उन्हें लेकिन उन्हें हमेशा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अब तक उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार 1593 में सर वाल्टर रैले एलिजाबेय साम्राज्य के विस्तार के लिए इस क्षेत्र में आए थे और उन्होंने अपने अनुभवों को डिस्कवरी ऑफ लार्ज, रिच एंड ब्यूटीफल एंपायर ऑफ गयाना नाम से प्रकाशित कराया। बाद में अंग्रेजी के अनेक साहित्यकारों ने गयाना की समृद्धि और सौंदर्य का वर्णन अपनी रचनाओं में किया। इन रचनाकारों में शेक्सपियर, मिल्टन, हडसन तथा कॉनन डॉयल के नाम उल्लेखनीय हैं। 83,000 वर्गमील के इस भूभाग में 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ तक स्पेन, डच, फेंच तथा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के आपसी संघर्ष चलते रहे। अंततः 1803 में ब्रिटेन ने इस क्षेत्र के एक बड़े भाग पर स्थायी तौर से अपना अधिकार जमा लिया तथा 1814 में ब्रिटिश गयाना उपनिवेश की स्थापना हुई । उस समय तक ब्रिटिश गयाना के गन्ने के खेतों में अफ्रीकी नीग्रो काम करते थे, जो दास प्रथा के अंतर्गत गयाना आए थे। उनके नारकीय जीवन की कहानी मानवता के इतिहास में एक शर्मनाक घटना बन चुकी थी। दास-प्रथा की निर्ममता एवं क्रूरता के प्रति ब्रिटेन में विरोध उभरा तथा 1834 में ब्रिटिश सरकार ने दास-प्रथा को समाप्त करने की घोषणा कर दी।

 

दास प्रथा की समाप्ति की घोषणा के बाद गयाना के बागान-मलिकों के समक्ष मजदूरों की समस्या पैदा हो गई क्योंकि नीग्रों लोग अपने को स्वतंत्र समझने लगे। उसी समय एप्रेंटिसशिप प्रावधान लागू किया गया जिसके तहत 1838 तक नीग्रो मजदूरों को दास बनकर काम करना पड़ा । इस बीच बागान मालिकों ने वेस्टइंडीज तथा मडेइरा से संविदा के आधार पर मजदूर मंगवाना शुरू किया जो गयाना के खेतों में सफल नहीं रहे। अंततः इस उपनिवेश के बीडेन-हूप तथा ब्रीडस्टेन नामक बागानों के मालिक जॉन ग्लैंडर्स एंड कंपनी को भारत से गयाना के मजदूरों को भेजने की संभावनाओं के बारे में पूछा। उस फर्म ने गलैडस्टोन को लिखा कि हम नहीं सोचते कि वेस्टइंडीज में यहाँ से मजदूरों को भेजने में कोई कठिनाई पैदा होगी क्योंकि यहाँ के लोगों को तो यह मालूम ही नहीं होगा कि वे कहाँ जा रहे हैं तथा उन्हें कितनी लंबी यात्रा कैम हॉनहाउस को 23 फरवरी 1837 को तथा ब्रिटेन के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर द कॉलोनिज लार्ड ग्लेनेलज को मार्च 1837 में पत्र भेजकर भारत से मजूदरों के आयात की अनुमति ले ली।

 

कलकत्ता की फर्म ने ग्लैडस्टोन को जो उत्तर भेजा उससे जाहिर होता है कि मजदूरों को यह साफ-साफ नहीं बताया जाता कि वे कहाँ और कितनी दूर जा रहे हैं। लेकिन इतना सच है जो लोग भारत से बाहर जा रहे थे वे अपने मन में बेहतर भविष्य का सपना संजोए हुए थे और इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करने को तैयार थे। इन अज्ञात महापुरुषों की अंतहीन यातना की यात्रा 1838 की मकरसंक्रांति या पोंगल के दिन 13 जनवरी को शुरू हुई जबकि व्हिटबी नामक जहाज कलकत्ता से 149 श्रमिकों को लेकर चला। ठीक उसके 16 दिन बाद 29 जनवरी को 165 श्रमिकों को लेकर हेसपरस नामक जहाज बिदा हुआ । 414 यात्रियों में से 18 की मृत्यु यात्रा के दौरान हो गई थी। अतः शेष 396 मजदूरों को लेकर दोनों जहाज 5 मई, 1838 को गयाना पहुँचे । इन मजदूरों में 150 की भर्ती छोटा नागपुर के आदिवासी इलाके से की गई थी जिन्हें अंग्रेज हिल कुली कहते थे तथा बाकी मजदूर बर्दवान और बांकुरा जिलों से आए थे। इस प्रकार यह सुविदित है कि भारत और गयाना के बीच संबंधों की शुरूआत आज से 150 साल पहले हुई थी जबकि व्हिटबी और हेसपरस नामक दो जहाजों से लगभग 400 शर्तबंद मजदूर दक्षिण अमरीका के इस डेमरारा टापू में आए थे । उस समय यह द्वीप ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के अधीन था तथा दास प्रथा की समाप्ति के बाद अपने गन्ने के बागानोंके लिए सस्ती दर पर श्रमिकों की तलाश करते-करते उन्होंने भारत से मजदूरों का निर्यात किया था । ये शर्तबंद मजदूर पाँच वर्ष के करार पर गयाना आये थे तथा यहाँ के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। बाद में शर्तबंद मजदूर मंगवाने की प्रथा के खिलाफ़ भारत में जोरदार प्रतिक्रिया हुई । गांधी, बालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय आदि भारतीय नेताओं ने इस अमानवीय प्रथा का घोर विरोध किया जिसके फवस्वरूप 1917 में ब्रिटिश सरकार को मजबूर होकर शर्तबंद मजदूरों के निर्यात की निर्मम एवं शर्मनाक प्रथा को बंद करने की घोषणा करनी पड़ी।

 

1838 से 1917 के बीच आये मजदूर अपने साथ भारतीय रीति-रिवाज, परंपरा, धर्म, भाषा और संस्कृति लाए जो आज भी गयाना में जीवित है। यही कारण है कि भारतीय भोजन, भारतीय त्यौहार जन्मोत्सव, विवाह, श्राद्ध आदि की भारतीय प्रथा तथा विशेष अवसरों पर भारतीय पोशाक आज गयाना के जीवन के अभिन्न अंग बन गये हैं। दापावली, होली, ईद जैसे भारतीय त्यौहारों को गयाना का राष्ट्रीय त्यौहार माना जाता है जो देश भर में अत्यंत हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाये जाते हैं। गयाना के प्राय सभी राजकीय उत्सवों पर गीता, कुरान तथा बाइबिल के अंशों का पाठ होता है तथा भारतीय नृत्य एवं संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है।

 

इन संबंधों को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में अनेक धर्म-प्रचारकों तथा सामाजिक कार्यक्रर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे लोगों में भारत के महान क्रांतिकारी तथा समाज-सुधारक भाई परमानंद तथा महात्मा गांधी के सहयोगी दीनबंधु सी.एफ. एंट्रयूज के नाम उल्लेखनीय हैं। भाई परमानंद ने वर्तमान शताब्दी के दूसरे दशक के प्रारंभ में गयाना में आर्य समाज मंदिर की स्थापना की तथा यहाँ के भारतीय समुदाय को हिंदी एवं संस्कृत की शिक्षा देने की व्यवस्था करवाई। इसी प्रकार दीनबंधु सी.एफ. एंड्यूज ने गयाना आकर यहाँ के भारतीयों की समस्या का अध्ययन किया तथा उनके सामाजिक जीवन में सुधार लाने की सिफारिश की। इसके बाद से भारत से धर्म-प्रचारकों, मिशनरियों तथा समाज-सेवियों के आवागमन का क्रम चलता रहा जिसके परिणाम स्वरूप गयाना में भारत की छवि एक संघर्षशील राष्ट्र के रूप में उभरी तथा गयाना वासियों ने भारतीय संवतंत्रता संग्राम को खुले शब्दों में अपना नैतिक समर्थन प्रदान किया। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो पराधीन गयाना के गाँव-गाँव में भारतीय स्वतंत्रता समारोह हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया गया, जिसमें न सिर्फ गयाना में रहने वाले भारत मूल के लोगों ने बल्कि यहाँ की सभी जातियों और नस्लों के लोगों ने हिस्सा लिया जो गयाना तथा भारत की जनता के बीच बढ़ते हुए आत्मीय संबंधों का एक अभूतपूर्व उदाहरण था।

 

 जैसा कि सर्वविदित है, भारत की आजादी का उद्देश्य भारत तक ही सीमित नहीं था। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू आदि नेताओं ने अपने संघर्ष को विस्तृत आयाम दिया था, जिसमें संसार से उपनिवेशवाद को समाप्त करना, समानता और विश्व शांति कायम करना और नस्लवाद को समाप्त करना आदि भी शामिल था। जाहिर है कि भारत ने गयाना की आजादी को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया। यही कारण है कि गयाना के स्वतंत्रता संग्राम के नेता डॉ. छेदी जगन तथा उनके सहयोगी श्री बर्नहम जब भारत गए तो वहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनके सम्मान में आयोजित एक समारोह में गयाना की आजादी की लड़ाई में तथा आजादी के बाद स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इसके विकास में भारत के पूर्ण समर्थन एवं सहयोग का आश्वासन दिया।

 

गयाना की स्वतंत्रता से पहले से ही भारत सरकार गयाना में हिंदी तथा संस्कृति की पढ़ाई के लिए अध्यापक भेजती थी जो गयाना के गाँवों में जाकर हिंदी तथा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते रहे और जिन्होंने भारत और गयाना के द्विपक्षीय संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाया । आज भी गयाना के लोग भारतीय संस्ककृति के प्रचार-प्रसार में इन अध्यापकों का नाम आदर के साथ स्मरण करते हैं । इसी तरह मई 1966 में गयाना की आजादी से एक साल पहले ही भारत ने यहाँ अपना राजनयिक आयोग खोला जिसने दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। पिछले 22 वर्षों में भारत और गयाना राष्ट्रमंडल, गुटनिरपेक्ष आंदोलन तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में मिल-जुल कर काम कर रहे हैं। रंगभेद, गुटनिरपेक्षता, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता एवं विश्व शांति के मामले में दोनों देशों के विचार एक जैसे हैं। गयाना में भारत के महान नेता महात्मा गांधी की स्मृति में राजधानी के एक महत्वपूर्ण बगीचे में बापू की प्रतिमा स्थापित की है, जहाँ हर रोज सैकड़ों लोग उनके दर्शन को पहुँचते है। गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रति गयाना के पूर्ण समर्थन के प्रमाण में जार्जटाउन के ऐतिहासिक केथेडल के सामन मार्शल टीटो, नासिर, नक्रूमा और जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमाएँ लगी हैं, जो शहर का एक आर्कषक दर्शनीय स्थल बन गया है।

 

भारत और गयाना के बीच सास्कृतिक अदान-प्रदान को जारी रखने के लिए 30 दिसंबर 1974 को दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित सांस्कृतिक समझौते के अनुसार हर वर्ष गयाना के छात्रों को मेडिकल, इंजीनियरिंग या एग्रिकल्चरल कॉलेजों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति तथा संगीत छात्रवृत्ति भी दी जाती है।

 

भारतीय आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग कार्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार हर वर्ष गयाना के 15 कार्मिको को लघु उद्योग, वस्त्र इंजीनियरिंग, वित्तीय एवं कार्मिक प्रबंध, विदेश-व्यापार आदि के तकनीकी प्रशिक्षण के लिए छात्रवृत्ति तथा आने-जाने का विमान किराया देती है। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत पिछले 20 वर्षों में चमड़ा-उद्योग, रेल, सड़क-निर्माण, कृषि तथा जन-संचार के विशेषज्ञों ने गयाना आकर इन क्षेत्रों के विकास के बारे में सरकार को समुचित सुझाव दिये हैं। सरकारी दायरे के अलावा भी गयाना में अनेक भारतीय डाक्टर, इंजीनियर तथा तकनीकी विशेषज्ञ काम कर रहे हैं। इसी प्रकार भारत से प्रशिक्षित डॉक्टरों तथा अन्य तकनीकी विशेषज्ञों की भी संख्या गयाना में कम नहीं है। हालांकि इनमें अनेक अब गयाना छोड़कर दूसरे देशों में चले गये हैं।

 

भारत एवं  संबंधों के इतिहास में गयाना की राजधानी जार्ज टाउन में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की 1973 में स्थापना को एक युगांतरकारी कदम माना जाता है। इस केंद्र  में पिछले 20 वर्षों से गयाना के लोग भारतीय नृत्य-संगीत तथा हिंदी भाषा की शिक्षा लेर हे हैं। वाद्य-यंत्रों में तबलाके अतिरिक्त अब शहनाई और बाँसुरी की कक्षा भी शूरू हो गयी हैं। भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के छात्र-छात्राओं ने गयाना में प्रशिक्षण प्राप्त करके अपनी कला का प्रसार पूरे लैटिन अमरीका में किया है। केंद्र प्रतिभाशाली छात्रों में फिलिप मेकक्लिनटॉक का नाम अग्रगण्य है जिनकी मृत्यु 1986 में हो गयी । उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की छात्रवृत्ति पर दिल्ली जाकर कत्थक केंद्र में बिरजू महाराज से कत्थक केंद्र में बिरजू महाराज से कत्थक की शिक्षा प्राप्त की थी तथा भारत से लौटकर जार्जटाउन के राष्ट्रीय नृत्य विद्यालय में गयानावासियों को कत्थक सिखाना शुरू किया। आज भी उनकी छात्राएं दक्षतापूर्वक कत्थक नृत्य कर रही हैं। फिलिप के दूसरे सुयोग्य साथी मुमताज अली भी इस समय गयाना में कत्थक-नृ्त्य के सबसे प्रतिभाशाली कलाकार माने जाते हैं। नृत्य के क्षेत्र में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र जार्जटाउन से प्रशिक्षित मार्लिन बोस, नादिरा एवं इंद्राणी आज गयाना से बाहर भी कत्थक नृत्य का शानदार प्रदर्शन  कर भारत एवं की गरिमा को बढ़ा रही है।  

 

गयाना में हिंदीगीत, भजन, ग़ज़ल आदि काफी लोकप्रिय है। हर गाँव तथा शहरों की हर गलियों में आप टेप पर बजते हिंदी गीतों का आनंद ले सकते हैं। मंदिरों में हिन्दी भजनों एवं संस्कृत श्लोकों का उच्चारण 5 वर्ष के शिशु से 100 वर्ष के वृद्ध तक इतनी शुद्धता से करते हैं कि भारतीय राष्ट्रिकों को उनके सामने सामान्यतः चुप्पी साधनी होती है। गयाना की नई पीढ़ी के लोगों में हिंदी पढ़ने का उत्साह है लेकिन वे हिंदी बोल नहीं पाते । गीतों एवं भजनो के कैसेट सुनकर या रोमन में लिखकर उन्हें याद करते हैं। देश भर में भारत की अनुकूल तथा प्रतिकूल छवि प्रस्तुत करने में हिंदी फिल्मों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। गयाना के गैरे भारतीय मूल के लोग भी बड़ी संख्या में हिंदी फिल्में देखते हैं। यहाँ कई सिनेमा घर ऐसे हैं, जहाँ साल भर सिर्फ हिंदी फिल्में दिखायी जाती है। गयाना में सूनने के स्तर तक हिंदी को जीवित रखने में हिंदी फिल्मों की भूमिका काफी सराहनीय रही है।

 

गयाना में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए तथा हिंदी के अध्ययन-अध्यापन के लिए पिछले अनेक वर्षों से जो सघन प्रयास चल रहे थे उसमें गयाना हिन्दी प्रचार सभा, महात्मा गांधी संस्थान आर्य प्रतिनिधि सभा एवं अन्य स्वैच्छिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज से 25-30 वर्ष पहले तथा गयाना में हिंदी का एक छोटा सा मुद्रणालय भी था जिसमें इस संस्थाओं द्वारा छोटी-मोटी पत्रिकाएं, निमंत्रण-पत्र आदि प्रकाशित एवं मुद्रित किए जाते थे। बाद में गयाना विश्वविद्यालय तथा गयाना के कुछ हाई स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई प्रारम्भ हुई। इनके अतिरिक्त गयाना स्थित भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में भी हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था है। भारतीय उच्चायोग एवं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र के पुस्त्कालयों में हिंदी की पुस्तकें उपलब्ध हैं लेकिन रोजगार और व्यावसाय में हिंदी की भूमिका नगण्य रहने के कारण वहां हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन में निरन्तर कमी आ रही है। हिंदी को वे मातृभाषा तो नहीं लेकिन अपनी मातृभूमि की भाषा मानते हैं तथा जब वेनीग्रो जाति के साथ अपनी तुलना करते हैं तो वहाँ की नई पीढ़ी को अपनी अस्मिता के लिए यह आवश्यक प्रतीक होता है कि वे अपने मूल देश की भाषा हिन्दी का ज्ञान अर्जित करें। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर गयाना की पंडित कौसिल, सनातन धर्म सभा, आर्य प्रतिनिधि सभा आदि संस्थाओं ने अपने मन्दिरों में हिन्दी कक्षाओं को चलाने की व्यवस्था की है। भारत सरकार एवं भारत की हिन्दी प्रेमी संस्थाओं का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इन संस्थाओं को हिन्दी पुस्त्कें एवं अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराकर उस देश में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाएँ । इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय हैं कि गयाना से प्रति वर्ष कुछ छात्र हिन्दी सीखने के लिए भारत आते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संचालित केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में उन्हें हिन्दी की शिक्षा प्रदान की जाती है। मेरे विचार में यह आवश्यक है कि गयाना, त्रिनिडाड,सूरीनाम आदि से आने वाले छात्रों के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जाए जिससे वे अपने देश पहुँचकर हिन्दी अध्यापकों को भी प्रशिक्षित कर सकें। आज मारीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिडाड,गयाना में हिन्दी प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाने के लिए वहाँ ऐसे लोगों को भारत से भेजने की आवश्यकता है जो पूर्ण मनोभाव,समर्पण एवं प्रतिबद्धता के साथ हिन्दी भाषा एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर सकें। गयाना में भारतीय संस्कृति की परम्परा पूर्ण तथा जीवन्त है। भारतीय भाषा और साहित्य की इस फुलवारी को भारत से गए श्रमिकों ने अपने खून और पसीने से सींचा है तथा गंगाजल से पवित्र किया है। अतः उनके मन में भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के प्रति अगाध स्नेह एवं श्रद्धा विद्यमान है जो हमारे दोनों देशों के सम्बन्धों को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि गयाना में हिंदी के प्रचार-प्रसार एवं अध्ययन-अध्यापन की गति को तेज किया जाए तथा दोनों देशों के साहित्यकार, विचारक, संगीतकार, नाटककार एवं अभिनेता आदि तक दूसरे देश की यात्रा करें और दोनों देशों की जनता के बीच सौहार्द्र एवं सद्भावन बढ़ाएँ।

 

नारायण कुमार

बी-30, मानस अपार्टमेंट

मयूर विहार फ़ेज 1, दिल्ली 110091

 

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