मैं और मेरा हिंदी प्रेम
जीतेन्द्र चौधरी
(मध्य एशिया में प्रवासी पत्रकार जीतेन्द्र चौधरी की डायरी से)
लोग मुझसे पूछते है कि आपको हिन्दी से इतना प्रेम क्यों है? अपने देश मे ही जब लोग हिन्दी को लात मारकर अंग्रेजी मे बोलना अपना शान समझते है, हिन्दी मे बोलने वाले को पिछड़ा समझा जाता है । अंग्रेज़ी में बोलने वाले को ज्यादा सम्मान दिया जाता है, फिर आप क्यो हिन्दी के झन्डे गाड़ने के चक्कर मे रहते हैं ।
दरअसल मै भी दूसरे लोगों की तरह से ही था, हिन्दी मे पढाई तो जरूर की थी, लेकिन अगर कोई हिन्दी मे लिखने को बोलता था तो नानी याद आ जाती थी। हिन्दी लिखते लिखते अंग्रेजी पर आ जाता था । लेकिन मेरे को हिन्दी से सच्चा प्रेम तब हुआ जब मैने यूरोपीय देशों के लोगों और चीनी भाषियों का भाषा प्रेम देखा। जर्मनी और फ्रान्स में अंग्रे़ज़ी जानने वाले तो बहुत मिलेंगे लेकिन शायद ही आप उनको अंग्रेज़ी में बात करने पर राजी करा पायें. यही हाल लगभर यूरोप के बाकी देशों का है, मै मानता हूँ कि स्थितियाँ बदल रही है लेकिन अभी भी उनको अपनी भाषा दूसरी सभी भाषाओ से ज्यादा प्यारी है। एक फ्रांसीसी से मैने पूछा कि तुम्हे अंग्रेज़ी तो आती है फिर क्यों फ्रेंच मे बात करते हो, तो बोला कि मुझे गर्व है कि मै फ्रांसीसी हूँ,मुझे अपने देश और संस्कृति से प्यार है, इसलिये मै फ्रेन्च मे बात करता हूँ, और अंग्रेज़ी का इस्तेमाल सिर्फ तभी करता हूँ जब अत्यंत जरूरी हो । यकायक मुझे लगा क्या हम हिन्दुस्तानी अपने देश या संस्कृति से प्यार नही करते।
मै आपको अपना एक अनुभव बताता हूँ, मै लन्दन के एक म्यूजियम मे अपने मित्र के साथ टहल रहा था, किसी एक कलाकृति पर नजर डालते ही मैने अपने मित्र से कलाकृति के मुत्तालिक अंग्रेज़ी में कुछ पूछा, मित्र ने तो जवाब नही दिया लेकिन बगल मे एक बुजुर्ग फिरंगी खड़ा था, उसने ठेठ हिन्दी मे जवाब दिया, मै तो हैरान, हमने एक दूसरे को अपना परिचय दिया, इन फिरंगी महाशय की पैदाइश हिन्दुस्तान की थी,ये पता चलते ही कि मै उत्तर प्रदेश से हूँ, उस फिरंगी ने बाकायदा भोजपुरी मे बोलना शुरु कर दिया,हद तो तब हो गयी जब उसने मेरे से ठेठ भोजपुरी मे कुछ पूछा और मैने जवाब देने के लिये बगलें झाँकते हुए अंग्रे़ज़ी का प्रयोग किया.उस दिन बहुत शर्म आयी कि हम अपनी भाषा होते हुए भी अंग्रेज़ी को अपना सबकुछ मानते है । आखिर क्यों?
कुछ दक्षिण भारतीय भाइयो का यह मानना है कि हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा है, हालांकि मै उनकी बात से सहमत नही हूँ, फिर भी मै उनकी मजबूरी समझता हूँ कि वे हिन्दी मे लिख पढ नही सकते, इसलिये अंग्रेज़ी मे बोलते है, लेकिन कम से कम अपने उत्तर भारत मे तो हिन्दी को उसका पूरा सम्मान मिलना चाहिये । अब सुनिये मेरा हिन्दुस्तान के दौरे का वाक्या. मै दिल्ली से रूड़की जा रहा था, ट्रेन मे एक जनाब से मुलाकात हो गयी, किसी कालेज मे प्रोफेसर थे, मै नाम नही बताऊंगा, रास्ते भर मेरे से बतियाते रहे, मेरा परिचय जानकर कि मै अप्रवासी हूँ अंग्रेज़ी मे शुरु हो गये, मैने उनके सारे जवाब हिन्दी मे ही दिये, लेकिन वो थे कि अंग्रेजी से नीचे ही नही उतर रहे थे। लगातार उनकी बकझक सुनकर मैने आखिर पूछ ही लिया, क्या आपको हिन्दी मे बोलने मे शर्म आती है, वे खींसे निपोरने लगे, और बातों ही बातो मे मान लिया कि हिन्दी मे बोलने मे शर्म आती है,अंग्रेजी मे बोलना ही भद्रता की निशानी है। मैने जब उनको बताया कि दुनिया जहान के लोग अपनी अपनी भाषा से प्यार करते है,हम भारतीय क्यों नही करते। जब आप प्रोफेसर होकर ऐसी बात सोचते है तो आपके छात्रों का क्या होगा…..जनाब के पास कोई जवाब नही था। हम क्यों ऐसा करते हैं कि अच्छी अंग्रे़ज़ी बोलने वाले के पीछे लग लेते है, और हिन्दी बोलने वाले को किनारे बिठाते है।सरकार भी हिन्दी दिवस मनाकर अपनी खानापूर्ति करती है और समझती है कि हिन्दी का सम्मान हो गया.हम लोग बोलते है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि हिन्दी को उचित स्थान नही मिला, यह हमारी गलती है, कि हम क्यो नही हिन्दी को अपनाते। क्यों नही अपने बच्चों को हिन्दी मे बोलने के लिये प्रोत्साहित करते । कंही हम सभी तो हिन्दी के इस बदहाली के लिये जिम्मेदार नही है? आपका इस बारे मे क्या कहना है । (25 जनवरी 2005)
मैं हिंदी में क्यों लिखता हूँ
ब्लागर हिन्दी मे क्यों लिखते है?
अमां यार क्यों ना लिखे, पढे हिन्दी मे है, सारी ज़िन्दगी हिन्दी सुनकर गुजारी है। हँसे, गाए,रोये हिन्दी मे है, गुस्से मे लोगो को गालियां हिन्दी मे दी है, बास पर बड़्बड़ाये हिन्दी मे है। हिन्दी गीत, हिन्दी फ़िल्मे देख देखकर समय काटा है, क्यों ना लिखे हिन्दी? मेरा हिन्दी प्रेम तो वैसे ही बहुत पुराना है, इसलिये उस बारे मे बताकर समय व्यर्थ नही करूंगा। हिन्दी मे लिखने के लिये सबके अपने अपने कारण होंगे, क्योंकि हम सभी अंग्रेजी मे भी लिखने की क्षमता रखते है, फ़िर भी हमने हिन्दी ही चुनी। मेरे तो निम्नलिखित कारण है:
हिन्दुस्तान को छोड़ते समय लगा था, शायद हिन्दी पीछे छूट गयी और अब तो बस अंग्रेजी से ही गुजारा चलाना होगा, लेकिन कुवैत मे आकर देखा कि पूरा का पूरा हिन्दुस्तान, या ये कहो को पूरा का पूरा साउथ एशिया(अविभाजित हिन्दुस्तान) एकजुट होकर, साथ साथ रह रहा है। सबके सुख दु:ख, खुशी गम, तीज त्योहार, सभी तो एक सा है।सभी लोगो हिन्दी/उर्दु बोलते है, जो लोगो को एक दूसरे से जोड़ती है। क्या इन्डियन,क्या पाकिस्तानी और क्या बांग्लादेशी, सब एक है। मज़हब अलग अलग है तो क्या बोली तो एक है।
इन्टरनैट पर हिन्दी पिछड़ी हुई है, इसमे कोई शक नही, हम हिन्दी ब्लागर, वैब पर हिन्दी मे लिखकर, उसे मरने से बचा रहे है।हम किसी पर कोई उपकार नही कर रहे है, बल्कि हम एक विशिष्ट पाठक वर्ग ढूंढ रहे है, जो सिर्फ़ हिन्दी मे ही सोचता है, हिन्दी बोलना,सुनना,देखना चाहता है और हिन्दी मे ही पढना चाहता है, लेकिन इन्टरनैट पर उसे हिन्दी दिखती ही नहीं ।
मै शुरु-शुरु मे सिर्फ़ अंग्रेज़ी के ब्लाग पढता था, लेकिन बाद मे पढना कम करदिये, क्योंकि अब मुझे हिन्दी मे ही अच्छा पढने को मिल जाता है। सीधी-सीधी बात है, यदि मेरे सामने हिन्दी और अंग्रेजी की इन्डिया टूडे सामने पड़ी हो तो मै हिन्दी वाली पहले उठाऊँगा।
हिन्दी बोलकर और हिन्दी मे लिखकर मुझे संतुष्टि होती है, एक दिन ब्लाग नही लिखता हूँ तो लगता है, कंही कुछ छूट रहा है। लेखन का ऐसा बुखार चढा है कि दोस्तो यारों को ब्लाग पढाकर ही दम लेता हूँ। और तो और, बहुत सारे कुवैती और मेरे कुछ पाकिस्तानी दोस्त जो हिन्दी नही पढ पाते, लेकिन समझ लेते है, वे भी रोजाना किसी ना किसी को पकड़कर हिन्दी ब्लाग पढवाते है। उनके द्वारा दिनोदिन की जाने वाली तारीफ़ बताती है कि हिन्दी चिट्ठाकारी दिन पर दिन जवां होती जा रही है।
दरअसल हिन्दी पढने वाले पढना तो चाहते है, लेकिन फ़ोन्ट वगैरहा के झमेले से डरते है। फ़िर क्या है कि अभी इन्डिया मे इन्टरनैट सिर्फ़ मनोरंजन,इमेल, चैट या जरुरी जानकारी के लिये प्रयोग होता है। अभी इन्टरनैट लोगो की जीवन शैली मे रचा बसा नही है, जैसा पश्चिम मे है, जिस दिन वो सब होगा, भारतवासी हिन्दी मे साइट ढूंढना शुरु करेंगे। सीधी सी बात है, यदि दाल रोटी सामने मिलगी तो बर्गर पिज्जा ज्यादा दिन नही तक पसन्द नही आयेगी।
मेरा अपना एक अनुभव है कि लोग बाग सेक्स, यौन और दूसरे कई अपशब्द ढूँढते हुए, ना जाने कितनी साइटो को कूदते फ़ांदते मेरी साइट पर आते है। लेकिन एक बार मेरी साइट या दूसरे ब्लागर की साइट पर लिखे लेख पढने के बाद, हिन्दी चिट्ठाकारों की साइट को बुकमार्क करने के लिये मजबूर हो जाते है। अब ये तो नही कहूँगा कि ये शब्द ढूंढने वाले ठरकी है। लेकिन एक बात तो है, बुरी बात का प्रचार प्रसार जल्दी होता है। इसलिये मेरे ब्लाग को शायद कम ही लोग जानते होंगे, ठरकी और देसी बाबा को जानने वाले हजारों मिल जायेंगे।
अब बात करते हैं दूसरी भाषाओं की, इन्टरनैट पर किसी भी भाषा का विकास तभी सम्भव है, जब उसका ज्यादा से ज्यादा कन्टेन्ट उपलब्ध हो, अच्छा बुरा, कुछ भी। हर तरह का कन्टेन्ट होना चाहिये। आप फ़ारसी भाषा देखिये, चीनी और जापानी भाषाएँ देखिये, यूरोपियन भाषायें देखिये, हर भाषा मे आपको इतनी साइट मिल जायेगी कि कन्टेन्ट की कमी नही है। और हिन्दी, अभी तो शुरुवात है, हम तो अभी अभी फ़ोन्ट शोन्ट के पंगे से बाहर निकले है, थोड़ा समय लगेगा।
आज हम जो हिन्दी लिख रहे है, निश्चय ही, आने वाले समय मे इस हिन्दी पर शोध होगा। लोग प्रोजेक्ट बनायेंगे और कार्यशालाए आयोजित करेंगे। हम ना रहेंगे, तुम ना रहोगे, हमारा लिखा जरुर रहेगा। आज भले ही हमे कुछ गिनती के लोग पढ रहे हो, लेकिन एक दिन आयेगा, जब लोग हमे याद करेंगे और हमारे हिन्दी के योगदान को सराहेंगे। बस यही कहना चाहता हूँ। (6 अक्टूबर 2005)
