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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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हिदीं-विश्व

 

 

विश्व हिन्दी सम्मेलन-ट्रिनिडाड को याद करते हुए


बच्चू प्रसाद सिंह

 

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सी संदर्भ में मुझे ट्रिनिडाड के विदेश मंत्री श्री राल्फ महाराज के भाषण का वह अंश याद आ रहा है जब उन्होंने कहा कि मैं अपने बचपन में हिंदी जानता और बोलता था और मुझमें शायद तब कुछ कवि-प्रतिभा भी थी। एक दिन मैंने अपनी नानी से कहा था- नानी, तोर बकरी अब हम ना पकड़ी। इस एक कथन के माध्यम से उन्होंने ट्रिनिडाड में हिंदी के समाप्त प्राय होने की कहानी भी सुनादी। गाँव से शहर पहुँच कर हिंदी कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी छूटती गई यही उनका आशय था किन्तु उन्होंने कहा कि हिंदी को हिन्दू के साथ जोड़ना मुनासिब नहीं होगा, दरअसल इस भाषा के माध्यम से प्राप्त ज्ञान हमारे समस्त राष्ट्र का पथ आलोकित करेगा और उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने राजधानी के प्रमुख क्षेत्र में पाँच  एकड़ भूमि आबंटित कर, भारत सरकार के सहयोग से गाँधी सांस्कृतिक संस्थान बनाने का निश्चय किया है और आवश्यकता आज इस बात की है कि हिंदी के अध्येता और विद्वान इस भाषा के प्रचार-प्रसार में सर्वधर्म समभाव का दृष्टिकोण निरन्तर बनाये रखें और जिस हिंदी भाषा के बल पर इस देश में कभी हिन्दू धर्म की रक्षा हुई उसके माध्यम से भविष्य में समग्र राष्ट्र का भी कल्याण निश्चय ही होगा। इस सम्मेलन के आयोजन मात्र से पूरे देश में यह आशा जगी है कि अब तक जो कठिनाइयाँ हिंदी के मार्ग में थीं वे धीरे-धीरे दूर होंगी और हम सभी इस देश में हिंदी को पुनर्जीवित पायेंगे ।

 

इन विशिष्ट विद्वानों, शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों, राजनेता और पत्रकारों के अतिरिक्त एक ऐसे वक्ता भी इस सम्मेलन में आए, ट्रिनिडाड के सर्वाधिक तेजस्वी व्यक्ति, भारतवंशियों के सबल-सक्षम पक्षधर, संसद में विपक्ष के नेता श्री बासुदेव पाण्डे। उन्होंने उस देश में हिंदी के विलुप्त होने के अनेक राजनीतिक सामाजिक कारण बताये और उनकी दृष्टि में हिंदी को मिटा देने का पूरा एक सुनियोजित षड़यंत्र वहाँ  चल रहा है। हिंदी के विरोधी  इस देश में यह कहते है कि जब भारत में ही हिंदी की विशेष उपयोगिता सिद्ध नहीं हो पाई फिर इसके सीखने से हमें ट्रिनिडाड में क्या लाभ होगा । उनका दूसरा तर्क है कि हिंदी की पढ़ाई स्कूलों में प्रारंभ करने पर चीनी और अफ्रीकी मूल के लोग अपनी भाषा की माँग करने लगेंगे और इसके परिणामस्वरूप समाज की एकता भंग होगी। इस प्रकार के तर्क देने वाले लोग हिंदी के प्रचार प्रसार  को समानता और न्यायसंगत अधिकार के हमारे संघर्ष का हिस्सा मानते हैं ओर उनका हित साधन तो उपनिवेशवादी व्यवस्था के अवशेषों को कायम रखने से ही संभव है । हमारा इतिहास हमें बताता है कि आजादी के पहले इस देश में मुट्ठी भर ऐसे लोग थे जिनका हमारी अर्थवस्था पर पूरा अधिकार था, वे ही समाज के अगुआ भी थे । पहले तो हम उनका वर्ण (गौर) देखकर पहचान लेते थे लेकिन अब उनके पदचिन्हों पर चलने वाले सभी वर्ण के चन्द लोगों में यह भावना काम कर रही है कि हम समाज को बांटो और राज करो की नीति का अनुसरण कर अर्थतंत्र पर अपना आधिपत्य बनाए रखें ।

 

इस वर्ग का यही प्रमुख उद्देश्य है कि अफ्रीका मूल के लोगों के साथ भारतवंशियों का मेल मिलाप होने नहीं दें ताकि वे अलग-अलग रहकर कमजोर बने रहें और हम स्थिति का लाभ यथावत् उठाते रहें । श्री पाण्डे ने कहा कि पैसा ओर प्रचार तंत्र दोनों पर उनका कब्जा है अतः किसी भी कार्य में हमारी कठिनाई बड़ जाती है । यह उसी समुदाय का प्रचार है कि इस देश की सारी भूमि पर भारतीयों का कब्जा है और यदि राजनैतिक सत्ता भी उनके हाथ आ गई तो दूसरी जातियाँ कष्ट में पड़ जायेंगी । उद्घाटन के अवसर पर पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार मैंने भारत के उप राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का शुभकामना संदेश पढ़कर सुनाया और उसके बाद आये ट्रिनिडाड के लोकप्रिय नौजवान नेता श्री रवि जी( रवीन्द्र नाथ महाराज) इन्हें भारत के प्रथान मंत्री श्री पी.वी. रनसिंह राव का संदेश सुनाना था । दो चार शब्द बोलने के बात रवि जी भाव विह्वल हो गये और आँखों  में अश्रु की धारा लिये बैठ गये, फिर हमारे प्रधान मंत्री जी का संदेश सुनाया अपने राजदूत प्रो. लक्ष्मणा ने और खोजबीन करने पर मुझे हिंदी निधि के अध्यक्ष श्री सीताराम ने बताया कि रवि जी हमारी निधि के प्राण हैं और पूरी निष्ठा से इस सम्मेलन को सफल बनाने में लगे रहे हैं- आज जब यह असंभव सा दीखता समारोह मूर्तरुप में उनके सामने आया तो उन्हें आश्चर्य हुआ । हर्षातिरेक इसलिए कि कभी हमने यह सोचा भी नहीं था कि भारत जैसे विराट देश की इतनी बड़ी हस्ती यानी प्रधान मंत्री का संदेश कभी हमारे हाथ आयेगा । इसी अपूर्व उपलब्धि  ने रवि जी को चरम आनन्द की स्थिति में पहुँचाया  और वे मंच पर बोल नहीं पाये । इस सम्मेलन के आयोजकों की निष्ठा, तत्परता और आत्मीयता के साथ-साथ कर्तव्य परायणता को देखकर ऐसा लगता था जैसे भारतीय मूल की यह नई पीढ़ी उन सभी अधिकारों को प्राप्र करने में सक्षम है और सफल होगी जिनसे उपनिवेशवादी ताकतों ने इनसे पहले की पीढियों को वंचित रखा। भला ऐसा देश जहाँ हिंदी का पठन पाठन वर्षों से बाधित रहा हो वहाँ अन्तरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन करना क्या साधारण उपलब्धि हो सकती है । सम्मेलन भी ऐसा जहाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री विदेश मंत्री, संसद के अध्यक्ष, विरोधी दल के नेता, संसद सदस्य, पत्रकार, प्राध्यापक, लेखक, विचारक और पन्द्रह देशों के प्रतिनिधि उपस्थित हों और सभी ओर प्रेम तथा भाई-चारे का भाव बराबर बना रहे । आयोजकों ने यह भी व्यवस्था की थी की सभी विदेशी प्रतिनिधि अलग-अलग परिवारों के अतिथि हों ताकि कहीं किसी को कष्ट न रहे ।

 

मुझे और साहित्यकार सांसद शंकर दयाल सिंह को हिंदी निधि के अध्यक्ष श्री च. सीताराम ने अपने घर ठरहाया और श्री यशपाल जैन और श्री राजेन्द्र अवस्थी श्री इदु अमीर के घर ठहरे । प्रो. माजदा असद को तो संसद की अध्यक्षा श्रीमती उषा शिवपाल अपने घर ले गईं और इसी प्रकार भाषा के बहाने भाई-चारे की भाव-भूमि भी सुदृढ़ हुई। भारत के मेहमान जैसे अपने ही घर टिक कर एक नई उभरती पीढ़ को दूर देश मे नई चुनौतियों का सामना करते देख पाये और इसने दो देशों कि अपनेपन को भी सुदृढ़ बनाया । मैंने अपने आतिथेय का नाम बराबर सुना चांका सीताराम। मुझे अचरज हुआ और उनसे पूछने पर पता चला कि दरअसल उनका नाम चन्द्रिका सीताराम है लेकिन पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में भ्रान्त धारणा भी खूब प्रचारित होती है कि यदि इस देश में कोई भारतीय कभी प्रधान मंत्री बना तो पुलिस और सेना बगावत कर देगी। विदेशी शासन ने ही अफ्रीकी मूल के लोगों को उनकी अपनी संस्कृति से काटकर अपने धर्म और अपनी पश्चिमी संस्कृति में सराबोर कर दिये किन्तु बचे रह गये- ये हिन्दुस्तानी जो उनके जाल में न तब फंसे और न अब फंसते दिखाई पड़ते। इसी पृष्ठभूमि में हिंदी को देखना होगा जो राजनीति के अखाड़े में गेंद की तरह उछाली जाती है और बार-बार किये गये वायदों के बावजूद जाति, धर्म, वर्ण और राजनीति के दलदल में फंस-फंस जाती है। लेकिन जब हमारा यह संकल्प है कि हम हिंदी सीखेंगे, पढ़ेंगे, लिखेंगे तो हमें कोई रोक नहीं सकता। मैंने स्वयं अपने गाँव के एक बुजुर्ग से हिंदी सीखी, हिंदी की प्रारम्भिक पुस्तकें मंगाई, फिर पत्राचार पाठ्यक्रम और लिंग्वाफोन का सहारा लिया। आज भी हिन्दू महासभा के अनेक स्कूल हैं उनसे भी अधिक मन्दिर और मस्जिद हैं और अपने को ही हमारे हितों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर स्पष्ट है कि हम हिंदी के प्रचार प्रसार के अपने प्रयास को समानता और वाजिब हकों के अपने संघर्ष के साथ जोड़कर चलायें आखिर हिंदी को भी फ्रेंच,स्पैनिश, लैटिन और ग्रीक की तरह पढ़ाये जाने का हक तो हासिल होना ही चाहिए।

 

श्री वासुदेव पाण्डे के इन विचारों का समर्थन अनेक लोगों ने किया चूंकि वे उस देश कि सर्वश्रेष्ठ जुझारू नेता हैं और उनका मानना है कि उस देश की राजनीतिक शब्दावली में नमक हराम शब्द का अवदान नितांत उनका अपना योगदान है। उन्होंने सम्मेलन के आयोजन को एक शुभ संकेत बताया और कहा कि इस प्रकार के विचार विमर्श द्वारा ही हिंदी के प्रचार प्रसार का मार्ग प्रशस्त करेंगे और हिंदी निधि के पार्यकर्त्ता निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर सांगोपांग चर्चा केबाद कई प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुए जिनमें प्रमुख थे-हिंदी के पठन पाठन की व्यवस्था को ट्रिनिडाड में सुदृढ़ करना, राष्ट्र संघ की मान्यता प्राप्त भाषाओं में हिंदी को स्थान दिलाना तथा 1994 में जब भारतीयों के ट्रिनिडाड आगमन के डेढ़ सौ साल पूरे हों तब हिंदी निधि एक अन्तरर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन करे।

 

इस पूरे सम्मेलन का शुभारंभ और समापन समारोह पूरे स्नेह और सद्भाव के वातावरण में सम्पन्न हुआ । पहलेदिन ही उद्घाटन के अवसर पर इस बात कासंकेत सभीकोमिल गयाथा कि ट्रिनिडाड के लोग भले ही अब हिंदी बोलने में समर्थ सक्षम नहीं हैं किन्तु उनकाभारत प्रेम किसी इसे चांका बनादिया और इसी प्रकार अनेक शब्द अपना मूल रूप छोड़कर कहां पहुँच गये हैं कि उनकी खोज करना भी आसान नहीं रहा फिर भी हमारे सांस्कृतिक नवजागरण और अपनी जड़ों की खोज से एक नई ऊर्जा नई पीढ़ी में उदित हो रही है जो हमें अपनी मंजिल तक पहुंचा देगी। उनके घर में भी जो साज सज्जा थी उसमें अधिकांश भारत का प्रतिनिधित्व था और वैसा ही साज संगीत, भोजन-व्यंजन, वेश भूषा और सबसे ऊपर अतिथि देवो भव की भावना । भावना के साथ-साथ अभी भाषा  भी तो कुछ कुछ बची ही है और आज भी उनकी बोलचाल में चूल्हा, तवा, कलछुल,भात, दाल, चटनी, तरकारीसधान,मचान,करिखा,सतुआ, झाखी, झटहा, हंसुली, आजा, झगड़ा, वासी, पूजा, प्रसाद, लकरपेज, गंदा, ज्ञान, पागल और नमकहराम जैसे शब्द तो आमफहम हैं फिर कुछ लोग अभी भी हिंदी बोल ही लेते हैं। अतः मन्दिर, मस्जिद, ईद, दीवाली, होली, फगवा, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, दुर्गापूजा आदि का सहारा लेकर हि्दी अपनी पुरानी स्थिति को प्राप्त कर लेगी इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं। सम्मेलन के आयोजनक इस बात से बड़े प्रसन्न थे कि भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् ने अपने पाँच  प्रतिनिधि भेजे और उनका मार्ग व्यय भी भारत सरकार ने दिया। यह बात उनको अधिर अच्छी इसलिए बी लगी चूकि विदेशी प्रतिनिधियों में से अधिकांश के मार्ग व्यय का दायित्व हिंदी निधि को वहन करना पड़ा और वे कृतज्ञ थे कि भारत के उप राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने अनपा संदेश और प्रतिनिधि मंडल भेजकर ट्रिनिडाड का मान बढ़ाया।

 

इस अन्तरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के समाप्त हो जाने के बाद मुझसे ट्रिनिडाड के ऐसे सुपठित और ज्ञानी सज्जन मिलने आये जिन्होंने बताया कि इस देश में हिंदी सदियों से संघर्ष करती आई है और अब भी हमारा रास्ता निष्कंटक हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि आज से पचास साल पहले एक मताधिकार आयोग का गठन हुआ था जिसने  यह सिफारिश की थी कि इस मुल्क में जिन्हें अंग्रज़ी का ज्ञान नहीं है उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। यदि यह बात मान ली जाती तो हमारे हिन्दुस्तानी भाई जो अधिकांशतः गांवों में रहते हैं-वे तो वैसे ही अपने अधिकार से वंचित हो जाते किन्तु हमने हिंदी का दामन थामें रखा  चाहे इसे लिए हमें अंग्रेज  शासकों या उनके अंध भक्तों की लाख प्रताड़ना सहनी पड़ी। कदम कदम पर हमें यह  उपेदश दिया गया कि हम अपना धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को भुलाकर उस महासमुद्र में विलीन हो जायें जहां हमारी अपनी पहचान मिट जाये और हम वैसे हीबन जायें जैसा हमारे मालिक हमारे स्वामी हमें बनाना चाहते हैं लेकिन हमारे परखे तो उस माटी की उपज थे जहाँ राम, कृष्ण, अशोक, अकबर, गाँधी और नेहरू पैदा हुए थे और हमारे साथ थे सूर, तुलसी,कबीर, और मीराष हम उन संत महापुरुषों की वाणी को अपना गलहार बनाकर बड़ी से बड़ी विपदा को झेल जाने की शक्ति रखते हैं ौर यही कारण है कि इस मुल्क की आजादी के पूर्व और बाद में भी जो चुनाव हुए उसमें हमने यह दिखा दिया कि हम तमाम जातियों के साथ प्रेम और सौहार्द्रपूर्वक भाई-भाई की तरह रहा जानते हैं यह हमारा कर्तव्य है, किन्तु हम अपनी अस्मिता को मिटने नहीं देंगे और हमारी पहचान की प्रतीक है हमारी भोजपुरी हिंदी। यदि यहीमिट गई, तो हमारा बचना क्या और मिटना क्या। उन्होंने ही बताया कि आजादि के बाद धीरे-धीरे यह बात सभी मानने लगे हैं कि हिंदी को मात्र एक जाति की भाषा के रूम में या राष्ट्रीय, जातीय समरसता के बाधक तत्व के रूप में देखते परखते रहे तो यह एक ऐतिहासिक भूल होगी और यदि हमने राष्ट्र की शक्ति, एकता के सूत्र में इसे स्वीकार किया तो हमारा देश निश्चय ही अधिक सम्पन्न और शक्तिशाली बनेगा। सम्मेलन कराने वाली संस्था हिंदी निधि ने तो यह घोषणा पहले ही कर दी है कि इस देश में रहने वाले तमाम लोग अपने पुरखों के देश की भाषा का ज्ञान अर्जितकरें, हम एक दूसरे की भाषा क भी जाने और सीखें ताकि हमारी आपसी समझदारी बढ़े और कटुता की सभी गांठे कट जायें। सरकार भी इस सच्चाई को स्वीकार करती है और इसीका प्रमाण है कि दिवाली नगर के लिए हमें पन्द्रह एकड़ जमीन दी गई है  और उसे हम ऐसा केन्द्र बना रहे हैं जहां भारतीय संस्कृति की विशिष्टता, उसकी गरिमा और सुवास का आनन्द लेने एक दिन अमरीका और यूरोप के अनेक लोग आयेंगे। हिंदी और हिन्दुस्तानी की महत्ता को दर किनार कर इस देश में कोई बहुत कुछ नहीं कर पाया और इसके प्रमाणस्वरूप उन्होंने हमेंबताया कि इस देएश में जब धर्मान्तरण की लहर चल रही थी तो सभी मिशनरी विफल रहे और कुछ सफलता मिली भी तो कनाडा के मिशन को जिसने धर्मप्रचार के लिए न्दी कासहारा लिया। हमारे हृदयच का द्वार तो हिंदी की दस्तक ही खोल सकती है और हमें पूरी आशा है कि हमारे पुरखों का देश, जहां भारतीय संस्कृति की प्रतिमूर्ति महामान्य डॉ. शंकर दयाल शर्मा और यशस्वी विद्वान महामान्य नरसिंह राव जैसे भारत के कर्णधार विद्यमान हैं वहाँ  से हमें अपनी भाषायी सासंकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कभी बाधा नहीं आयेगी । चूँकि यह मात्र हमारी अपेक्षा ही नहीं बल्कि हमारा अधिकार भी है। हिंदी की अभिवृद्धि, उसका अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में विकास हमारे भारत देश के प्रेम और भाई चारे का संदेश है और हम सभी चाहते है कि वसुधैव कुटुम्बकम् का उदार उदात्त भाव, भारतीय भाषा और संस्कृति संसार के कोने में पहुँचे तथा कलह, कोलाहल से परिव्याप्त आज का मानव संसार सच्चा त्राण पाये और उसके समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।

च्चू प्रसाद सिंह

83/सी, हिमगिरि अपार्टमेंट्स,

पॉकिट-14, कालकाजी एक्सटेंशन,

नई दिल्ली 110019

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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