ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार-वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

माह के छंदकार

 

 

ओम प्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की ग़ज़लें

 

एक

माना कि ख़ुद को ठीक से पहचानता नहीं

पर ये पता है आदमी हूँ, देवता नहीं ।

 

तन को सँभालने का सलीक़ा तो है मुझे

मन को सँभालने का तरीक़ा पता मुझे ।

 

ख़ुशबू मेरे पड़ोस में आकर, पलट गई

मुझसे बहार ने कहा, मेरी ख़ता नहीं ।

 

मैं दोस्तों के गाँव में रहता तो हूँ मगर

मुद्दत से दोस्तों से मेरा वास्ता नहीं ।

 

चलता रहा हूँ राह के काँटों से खेलता

फूलों के दांव-पेंच कभी देखता नहीं ।

 

माना तेरे नसीब में मंज़िल नहीं पराग

पर लौटने का भी तो कोई रास्ता नहीं ।

 

दो

मेरी आहों में असर आया है

बाद मुद्दत वो इधर आया है ।

 

ये उजाला है उसी की रौनक

लोग कहते हैं सहर आया है ।

 

हर किसी की जुबां पे छाले हैं

मीठे बोलों में जहर आया है ।

 

हैं अंधेरे तो अभी भी, लेकिन

रास्ता कुछ तो नज़र आया है ।

 

मंज़िलें दूर रहीं तो क्या ग़म

पास दर पास सफ़र आया है ।

 

दर्द शैतान सा जो लिपटा था

कुछ शराफ़त पे उतर आया है ।

 

तीन

बात ऐसी तो नहीं कि न बोली जाए

पर सरेआम तो ये गाँठ न खोली जाए ।

 

आपका कोई नहीं हूँ मैं, ये सच है, लेकिन

प्रीति रिश्तों के तराजू पे न तोली जाए ।

 

आग पीहर में है, ससुराल में ओले आँधी

कौन से गाँव में दुल्हन की ये डोली जाए ।

 

श्रेय देना है जो कुल राम के चरणों को ही

अन्य पाषाण शिला भी तो टटोली जाए ।

 

शाप तो आपने दुनिया को बहुत दे डाले

अब किसी घर तो ये वरदान की झोली जाए ।

 

ज़िंदगी नीम के पानी की नदी है, उसमें

शरबती चाँदनी किस रीति से घोली जाए ।

 

छाँव तो राह में मिलनी है न मंज़िल पे पराग

क्यों न फिर धूप की आराम से ढोली जाए ।

 

चार

कल कि जब धूप और छाया में न अंतर होगा

चैन से सांस भी लेना यहाँ दूभर होगा ।

 

और कुछ देर चलो प्यार से बातें कर लें

फिर न ये वक्त, न माहौल, न मंज़र होगा ।

 

आज तूफ़ान से बचने की कोई राह तो है

कल न तदबीर चलेगी, न मुकद्दर होगा ।

 

आज काँटे भी मेहरबान हैं फूलों की तरह

कल दुआओं का असर शाप से बदतर होगा ।

 

आज हर जाम में जज़्बात की मय है साक़ी

कल ये मयख़ाना किसी मौलवी का घर होगा ।

 

उसका शैतान न होना तो सही है, लेकिन

आदमी देवता हो जाए, तो पत्थर होगा ।

 

ऐ पराग, आज अँधेरे को न रुसवा करना

कल उजाला भी ढली उम्र सा, जर्जर होगा ।

 

पाँच

कुछ रोज़ से हवा में ये चर्चा है शहर में

शायर कोई पराम भी रहता है शहर में ।

 

गीतों में उसके दर्द है, ग़ज़लों में मुहब्बत

हर छंद में मकरंद सा ढलता है शहर में ।

 

शीशे के गीत गाता है पत्थर के सदन में

शबनम के जाम शोलों को देता है शहर में ।

 

दुश्मन न कोई दोस्त, न महफ़िल कोई अपनी

उसका सभी से प्यार का रिश्ता है शहर में ।

 

पूछा किसी ने हाल न उसका,  तो क्या हुआ

ऐसा तो सब के साथ ही होता है शहर में ।

 

आँचल में जो सजाओगे, मोती सा बिकेगा

वरना पराग अश्क सा सस्ता है शहर में ।

ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग'

विद्या विहार, के सी 119

कविनगर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार- वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com