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माह के छंदकार |
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ओम प्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' की ग़ज़लें
एक माना कि ख़ुद को ठीक से पहचानता नहीं पर ये पता है आदमी हूँ, देवता नहीं ।
तन को सँभालने का सलीक़ा तो है मुझे मन को सँभालने का तरीक़ा पता मुझे ।
ख़ुशबू मेरे पड़ोस में आकर, पलट गई मुझसे बहार ने कहा, मेरी ख़ता नहीं ।
मैं दोस्तों के गाँव में रहता तो हूँ मगर मुद्दत से दोस्तों से मेरा वास्ता नहीं ।
चलता रहा हूँ राह के काँटों से खेलता फूलों के दांव-पेंच कभी देखता नहीं ।
माना तेरे नसीब में मंज़िल नहीं पराग पर लौटने का भी तो कोई रास्ता नहीं ।
दो मेरी आहों में असर आया है बाद मुद्दत वो इधर आया है ।
ये उजाला है उसी की रौनक लोग कहते हैं सहर आया है ।
हर किसी की जुबां पे छाले हैं मीठे बोलों में जहर आया है ।
हैं अंधेरे तो अभी भी, लेकिन रास्ता कुछ तो नज़र आया है ।
मंज़िलें दूर रहीं तो क्या ग़म पास दर पास सफ़र आया है ।
दर्द शैतान सा जो लिपटा था कुछ शराफ़त पे उतर आया है ।
तीन बात ऐसी तो नहीं कि न बोली जाए पर सरेआम तो ये गाँठ न खोली जाए ।
आपका कोई नहीं हूँ मैं, ये सच है, लेकिन प्रीति रिश्तों के तराजू पे न तोली जाए ।
आग पीहर में है, ससुराल में ओले आँधी कौन से गाँव में दुल्हन की ये डोली जाए ।
श्रेय देना है जो कुल राम के चरणों को ही अन्य पाषाण शिला भी तो टटोली जाए ।
शाप तो आपने दुनिया को बहुत दे डाले अब किसी घर तो ये वरदान की झोली जाए ।
ज़िंदगी नीम के पानी की नदी है, उसमें शरबती चाँदनी किस रीति से घोली जाए ।
छाँव तो राह में मिलनी है न मंज़िल पे पराग क्यों न फिर धूप की आराम से ढोली जाए ।
चार कल कि जब धूप और छाया में न अंतर होगा चैन से सांस भी लेना यहाँ दूभर होगा ।
और कुछ देर चलो प्यार से बातें कर लें फिर न ये वक्त, न माहौल, न मंज़र होगा ।
आज तूफ़ान से बचने की कोई राह तो है कल न तदबीर चलेगी, न मुकद्दर होगा ।
आज काँटे भी मेहरबान हैं फूलों की तरह कल दुआओं का असर शाप से बदतर होगा ।
आज हर जाम में जज़्बात की मय है साक़ी कल ये मयख़ाना किसी मौलवी का घर होगा ।
उसका शैतान न होना तो सही है, लेकिन आदमी देवता हो जाए, तो पत्थर होगा ।
ऐ पराग, आज अँधेरे को न रुसवा करना कल उजाला भी ढली उम्र सा, जर्जर होगा ।
पाँच कुछ रोज़ से हवा में ये चर्चा है शहर में शायर कोई पराम भी रहता है शहर में ।
गीतों में उसके दर्द है, ग़ज़लों में मुहब्बत हर छंद में मकरंद सा ढलता है शहर में ।
शीशे के गीत गाता है पत्थर के सदन में शबनम के जाम शोलों को देता है शहर में ।
दुश्मन न कोई दोस्त, न महफ़िल कोई अपनी उसका सभी से प्यार का रिश्ता है शहर में ।
पूछा किसी ने हाल न उसका, तो क्या हुआ ऐसा तो सब के साथ ही होता है शहर में ।
आँचल में जो सजाओगे, मोती सा बिकेगा वरना पराग अश्क सा सस्ता है शहर में ।
विद्या विहार, के सी 119 कविनगर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश
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