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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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चीन की चिट्ठी

 

     

  चीन में कितना भारत?


राजनन्दन

 

चीन के साथ भारत का बहुत पुराना पारस्परिक संबंध  है। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार ने चीनीयों के मन में भारत के प्रति श्रद्धा भाव तो बहुत पहले हीं भर दिया था, चीनी बौद्ध साधुओं एवं अन्य चीनी यात्रियों की भारत यात्रा ने उन्हे भारतीय संस्कृति एवं भाषाओं को और भी नजदीक से जानने समझने का मौका दिया।

 

चीन में भारतीय भाषाओं खासकर संस्कृत एवं पाली के कई विद्वान हुए हैं। संस्कृत के महाकवि कालीदास की अमर कृति अभिज्ञानशकुंतलम, विक्रमोर्वशीय के साथ-साथ बाल्मिकी कृत महाकाव्य रामायण का भी चीनी भाषा में अनुवाद हो चुका है।

 

आधुनिक चीन के केन्द्रीय राजधानी बीजिंग स्थित पेइचींग विश्वविद्यालय में भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी की पढाई होती है। चाइना इंटरनेशनल रेडियो का हिन्दी में एक अति आधुनिक वेबसाइट hindi.cri.cn है। इस बेवसाइट को हिन्दी के अलावे भारत की अन्य भाषाओं तमिल,बंगाली एवं उर्दू में भी देखा पढा जा सकता है।

 

भारत के साथ बढते व्यापार संबंधों के कारण आधुनिक चीन के लगभग सभी मुख्य व्यापारिक शहरों में भारतीयों की उपस्थिति है। उनके व्यापार कार्यालय है। कहीं-कहीं पर भारतीयों के व्यापार संगठन भी है। भारतीय रहन-सहन से संबंधित वस्तुओं की दुकानें एवं भारतीय भोजनालय है।

 

चीन चूँकि एक बहुत बड़ा देश है और भारतीय यहाँ छिट-फुट रुप से अलग-अलग शहरों में व्यापारिक उद्देश्यों से बसे हुए हैं, इसलिए अभी तक किसी बड़े भारतीय सामाजिक संगठन का नाम सामने नही आया है। मगर दिन-प्रतिदिन भारतीयों की बढ्ती हुई संख्या भविष्य में यहाँ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी अवश्य हीं एक शुभ-संकेत है।

 

चीन में अभी तक  भारतीयों के आपस में मिलने-जुलने एवं पर्व-त्योहारों जैसे सांस्कृतिक गतिबिधियों का मुख्य केन्द्र विशेष रुप से कोई पाँच सितारा होटल या कोई भारतीय रेस्तरां हीं होता है जहाँ होली, दिवाली, नवरात्र जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों के मौके पर दूर-दूर से आकर भारी संख्या में भारतीय जमा होते हैं एवं देर रात तक अपने त्योहार व आपसी परिचय के आदान-प्रदान का आनंद उठाते हैं। ऐसे अवसरों पर हिन्दी के नये, पुराने व रिमिक्स गानों से लेकर पंजाब के मस्ती भरे धुनों एवं भोजपुरी के रसपूर्ण गीतों तक की लय पर मिलकर सभी एक साथ थिरकते हैं। झूमते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। अपने देश से दूर एक परदेश में यहाँ प्रांतीयता का भाव नही रहता। सभी भारतीय यहाँ अपने लगते हैं। अपनी संस्कृति और अपने लोगों से मिलकर भारत की राष्ट्रीय एकता, समानता एवं भारतीयता का आभास यहाँ कुछ ज्यादा हीं होता है।  

 

राजनन्दन

हांगजाऊ, चीन

 

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